114 राफेल विमानों की खरीद सौदे पर ग्रहण लगने की आशंका …………….

फ्रांस के साथ 114 राफेल विमानों की खरीद सौदे पर ग्रहण लगने की आशंका जताई जा रही है. इंडियन एयरफोर्स की एयर स्ट्राइक क्षमता के लिए यह सौदा बेहद अहम है. इस वक्त एयरफोर्स के पास फाइटर जेट्स की भारी कमी है. उसकी स्क्वाड्रन क्षमता घटकर 29 पर आ गई है. जबकि मंजूर क्षमता 42 […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
सोमवार, 18 मई 2026, 05:50 AM 7 मिनट read
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114 राफेल विमानों की खरीद सौदे पर ग्रहण लगने की आशंका …………….
Photo: UB India News Archive
फ्रांस के साथ 114 राफेल विमानों की खरीद सौदे पर ग्रहण लगने की आशंका जताई जा रही है. इंडियन एयरफोर्स की एयर स्ट्राइक क्षमता के लिए यह सौदा बेहद अहम है. इस वक्त एयरफोर्स के पास फाइटर जेट्स की भारी कमी है. उसकी स्क्वाड्रन क्षमता घटकर 29 पर आ गई है. जबकि मंजूर क्षमता 42 स्क्वाड्रन की है. लेकिन, रिपोर्ट आ रही है कि करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये के राफेल सौदे में एक शर्त को लेकर खटास पैदा हो रही है. अपनी इस डिमांड पर भारत के अडिग रहने के कारण यह सौदा उस गति से नहीं बढ़ रहा जिस रफ्तार से इसे बढ़ना चाहिए.

क्या है भारत की डिमांड

दरअसल, भारत चाहता है कि फ्रांस राफेल फाइटर जेट का सोर्स कोड भले न दे लेकिन वह उसे इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट्स यानी आईसीडीएस उपलब्ध करवाए. इससे भारत इन फाइटर जेट्स में ब्रह्मोस जैसे देसी घातक मिसाइलें इंटीग्रेट कर सकेगा. वरना कोड के अभाव में राफेल में फ्रांस निर्मित हथियार ही लगाए जा सकेंगे जो बेहद महंगे होते हैं. भारत का कहना है कि वह जब इन जेट्स से इतनी भारी कीमत चुका रहा है तो उसे इसके ऑपरेशन में पूरी स्वतंत्रता चाहिए. और आईसीडीएस के बिना यह स्वतंत्रता संभव नहीं है. दूसरी तरफ फ्रांस का तर्क है कि अगर वह भारत को इन जेट्स को सोर्स कोड या फिर आईसीडीएस उपलब्ध कराता है तो यह संभव है कि यह जानकारी रूस तक पहुंच जाए. क्योंकि रूस भारत का एक करीबी दोस्त है और साथ ही ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें रूस के साथ मिलकर ही डेवलप की गई है. दूसरी तरफ रूस और फ्रांस के संबंध प्रतिद्वंद्वी के हैं. इस कारण पूरा मामला उलझता हुआ दिख रहा है. भारत की कोशिश है कि वह फ्रांस को इस बात का भरोसा दिलाए कि वह आईसीडीएस को किसी भी कीमत पर रूस के साथ साझा नहीं करेगा.

भारत को राफेल ही क्यों चाहिए?

अब आते हैं मूल सवाल पर कि अगर राफेल सौदा रद्द हो जाता है तो क्या होगा. दरअसल, अगर ऐसा होता है तो यह बहुत बुरी स्थिति होगी. भारत को इस वक्त फाइटर जेट्स की शिद्दत से जरूरत हैं. चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मन को देखते हुए हमें जितने एयर पावर की जरूरत है, हमारे पास उससे बहुत कम जेट्स हैं. दूसरी तरफ भारत के सामने विकल्प बहुत सीमित है. इस संदर्भ में एयरफोर्स चीफ का बयान हमें याद रखना चाहिए कि फाइटर जेट्स कोई वाशिंग मशीन या रेफ्रिजरेटर नहीं हैं जो बाजार गए और खरीद कर लेते आए. इंडियन एयरफोर्स के लिए राफेल एक टेस्ट किया हुआ जेट है. भारत की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए चुनिंदा जेट्स ही यहां सफल हो सकते है. एक तरफ हमारे पास दुनिया के सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र सियाचीन ग्लेशियर है तो दूसरी तरफ राजस्थान में थार का मरूस्थल है. यानी एक तरफ माइनस 20 से 30 डिग्री सेल्सियस की बर्फीली दुनिया तो दूसरी तरफ 50 डिग्री सेल्सियस में आग उगलने वाली दुनिया. ऐसी स्थिति में राफेल भारत के लिए एक सबसे मुफीद जेट साबित हुआ है.

राफेल सौदा रद्द हो जाए तो क्या होगा?

अब आते हैं सवाल पर कि अगर यह सौदा रद्द हो जाए तो क्या होगा? अगर राफेल सौदा रद्द हो जाए तो भारत के सामने 4.5 पीढ़ी के जेट के लिए कोई खास विकल्प नहीं बचता. जो लोग यह समझते हैं कि राफेल के बदले हम पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ जेट खरीद लेंगे तो वे नादान हैं. स्टील्थ जेट की सबसे बड़ी दिक्कत है कि वे भारी हथियार नहीं ले जा सकते. वह दुश्मन के इलाके में चुपके से घुस तो सकते हैं लेकिन वे भारी बमों या मिसाइलों को दागने असमर्थ होते हैं. इसका कारण यह है कि इस जेट में हथियारों को विमान के भीतर रखा जाता है. स्टील्थ जेट की बाहरी बॉडी पर एक खास किस्म का पेंट होता है जो दुश्मन के रडार से आने वाली किरणों को ऑब्जर्ब कर लेता है. यानी किरणें रिफ्लेक्ट होकर दुश्मन तक नहीं पहुंचती और इस तरह दुश्मन को इसके लोकेशन की जानकारी नहीं मिलती है. यानी कहने का मतलब है कि कभी भी राफेल का विकल्प अमेरिकी पांचवीं पीढ़ी के जेट एफ-35 या रूसी एसयू-57 यानी सुखोई-57 नहीं हो सकते. भारत का पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट प्रोग्राम एम्का भी इसे रिप्लेस नहीं कर सकता. मौजूदा वक्त में दुनिया की कोई भी एयरफोर्स केवल स्टील्थ जेट के दम पर जंग के मैदान में सफल नहीं हो सकती. राफेल जैसे भारी भरकम विमान ही किसी एयरफोर्स की रीड़ की हड्डी होते हैं.

तो फिर विकल्प क्या है?

रूस का स्टील्थ जेट एसयू-57. इसके परफॉर्मेंस पर कई सवाल उठ रहे हैं. फोटो- रायटर

तेजस मार्क-2 प्रोग्राम

दूसरा विकल्प भारत का अपना स्वदेशी तेजस मार्क-2 प्रोग्राम है. भारत लंबे समय से अपना खुद का फाइटर जेट बना रहा है. एयरफोर्स के पास तेजस के दो स्क्वाड्रन है. डीआरडीओ और एचएएल ने तेजस के दो एडवांस वर्जन विकसित किए हैं. इसमें एक है तेजस मार्क-1ए. इसका प्रोडक्शन शुरू हो गया है. एयरफोर्स ने एचएएल से 180 तेजस मार्क-1ए जेट खरीदने का सौदा किया है. इस जेट में अमेरिकी जीई कंपनी के एफ 404 इंजन लगाए जाने हैं. लेकिन, इंजन की डिलिवरी में देरी के कारण अभी तक इन जेट्स की डिलिवरी शुरू नहीं हुई है. हालांकि रिपोर्ट है कि एचएएल ने करीब 30 विमान बना लिए हैं. उनका परीक्षण भी हो गया है. बस इंजन की डिलिवरी होते ही ये विमान पूरी तरह रेडी हो जाएंगे और इन्हें एयरफोर्स को सौंप दिया जाएगा.
तेजस श्रेणी का दूसरा विमान तेजस मार्क-2 एक शानदार विमान है. इसको राफेल के बराबर का 4+ पीढ़ी का विमान बताया जाता है. लेकिन इसमें भी अमेरिकी एफ-414 इंजन लगाया जाना है. लेकिन, अमेरिकी कंपनी से इंजन की सप्लाई में ढिलाई के कारण यह प्रोजेक्ट भी सुचारू रूप से नहीं चल रहा है. इस जेट को अब तक उड़ान भर लेना था. फिर एयरफोर्स की जरूरत के हिसाब के इसमें अगले दो-तीन सालों तक जरूरी बदलाव करने की योजना थी. फिर 2029-30 से इसका प्रोडक्शन शुरू करना था. लेकिन, रिपोर्ट के मुताबिक इस जेट का अभी तक ट्रायल उड़ान शुरू नहीं हुआ है. ऐसे में इसके भरोसे रहना ठीक नहीं है, क्योंकि अमेरिकी कंपनी के वादे पर 100 फीसदी भरोसा करना संभव नहीं है.

तो फिर क्या है रास्ता

दरअसल, इस वक्त चीन की सेना पांचवीं पीढ़ी के जेट्स से लैस है. उसके पास फाइटर जेट्स के 60 से 70 स्क्वाड्रन हैं. दूसरी तरफ पाकिस्तान है जो खुद को चीन के पांचवीं पीढ़ी के जेट जे-20 से खुद को अपग्रेड कर रही है. उसके पास भी फाइटर जेट्स के 25+ स्क्वाड्रन हैं. ऐसे में भारत के सामने चौतरफा चुनौती है. इस चुनौतीपूर्ण वक्त में राफेल डील को किसी तरह अंजान तक पहुंचाना बहुत जरूरी है. किसी भी दूसरे विकल्प की ओर बढ़ना इस वक्त भारत के लिए सही नहीं है.
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