पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर ऐतिहासिक बदलाव आया है. बदलाव का अंदाज ठीक वैसा ही है, जैसा पहले होता रहा है. इस साल हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत और सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद तृणमूल कांग्रेस में अंदरूनी अस्थिरता साफ दिख रही है. ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली […]
By UB India News • Patna, Bihar गुरुवार, 28 मई 2026, 05:57 AM • 6 मिनट read
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर ऐतिहासिक बदलाव आया है. बदलाव का अंदाज ठीक वैसा ही है, जैसा पहले होता रहा है. इस साल हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत और सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद तृणमूल कांग्रेस में अंदरूनी अस्थिरता साफ दिख रही है. ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) 2011 में वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद 15 साल सत्ता में रही. सत्ता जाते ही वाम दलों को हर तरह से नेस्तनाबूद करने का काम ममता बनर्जी ने किया. अब वाम दलों वाले संकट का सामना उन्हें खुद करना पड़ रहा है. टीएमसी के नेता-कार्यकर्ता धड़ाधड़ साथ छोड़ रहे हैं. जाहिरा तौर पर उनकी मंशा भाजपा से सटने की है. यह अलग बात है कि भाजपा ने अभी अपने दरवाजे नहीं खोले हैं. टीएमसी की हालत तो ऐसी हो गई है कि उम्मीदवार टिकट मिलने के बावजूद मैदान छोड़ कर भाग रहे हैं. पार्टी में भगदड़ मची हुई है. फाल्ता में मतदान के कुछ ही घंटे पहले टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर मैदान छोड़ कर भाग गया.
टीएमसी के नेताओं का धैर्य जवाब दे रहा है
टीएमसी के नेताओं-समर्थकों का धैर्य भी इस हालत में जवाब देने लगा है. आलम यह है कि नंदीग्राम के उपचुनाव में टीएमसी को एक अदद उम्मीदवार के लाले पड़ गए हैं. अभी तक ममता बनर्जी अपना उम्मीदवार तय नहीं कर पा रही हैं. कोई कैंडिडेट बनने के लिए तैयार ही नहीं हो रहा है. ममता ने उनके चुनाव एजेंट रहे सुफियान को उम्मीदवार बनाना चाहा, लेकिन उसने भी भाजापा का मुकाबला करने से मना कर दिया है. नंदीग्राम बंगाल की राजनीति का सबसे संवेदनशील क्षेत्र रहा है. 2007 के भूमि अधिग्रहण आंदोलन से लेकर 2021 और 2026 चुनावों तक यहां की घटनाएं राज्य की सत्ता बदलने वाली साबित हुईं. हालिया विधानसभा चुनाव के बाद टीएमसी को यहां उम्मीदवार ढूंढने में भारी दिक्कत आ रही है. नंदीग्राम ही वह क्षेत्र है, जहां पहली बार ममता बनर्जी को भाजपा के शुभेंदु अधिकारी ने परास्त किया था. नंदीग्राम में टीएमसी को 2026 में भी हार का सामना करना पड़ा है. शुभेंदु अधिकारी तीसरी बार नंदीग्राम से जीते हैं. भवानीपुर से भी उन्होंने ममता को हरा कर जीत हासिल की है.
सुवेंदु अधिकारी के इस्तीफे से नंदीग्राम सीट खाली
2026 चुनावों के बाद सुवेंदु अधिकारी(अब मुख्यमंत्री) ने नंदीग्राम से इस्तीफा दे दिया. वे ममता के गढ़ भवानीपुर सीट का ही प्रतिनिधित्व करेंगे. सुवेंदु अधिकारी का इस्तीफा सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक भी है. वे 2021 में टीएमसी छोड़ कर भाजपा में आए थे और नंदीग्राम से ममता को हरा कर राज्य की राजनीति बदल दी थी. ममता के कमजोर पड़ने का 2021 में मिला यह पहला संकेत था. इस बार तो पूरा माजरा ही बदल गया है. राज्य में राजनीतिक परिदृश्य बदलते ही टीएमसी का संकट शुरू हो गया है. ममता के खिलाफ टीएमसी के नेता खुल कर बोलने लगे हैं. सांगठनिक पदों से सांसद काकोली घोष दस्तीदार का इस्तीफा टीएमसी के लिए सामान्य घटना नहीं है. इसके साथ ही और सांसदों के ममता से नाराज होने की चर्चा शुरू हो गई है. भाजपा सांसद सौमित्र खान की मानें को 20 सांसद और 50 विधायक ममता का साथ छोड़ने की तैयारी में हैं.
TMC की सरकार बनते ही बिखरे थे वाम दल
2011 में ममता बनर्जी की जीत के बाद वाम मोर्चा तेजी से बिखर गया था. क्लबों, पंचायतों, नगर पालिकाओं पर टीएमसी ने कब्जा कर लिया. हजारों नेता-पार्षद-कार्यकर्ता वाम का साथ छोड़ टीएमसी में शामिल हो गए थे. लेफ्ट के पांव उखड़ गए, क्योंकि सत्ता के बिना उनका संगठन टिक नहीं सका. वाम दलों की तरह ही टीएमसी भी मुख्य रूप से सत्ता और स्थानीय प्रभाव पर टिकी थी. आइडियोलॉजी की बजाय पावर, क्लब कल्चर, पंचायतों पर नियंत्रण और सरकारी योजनाओं का फायदा ही टीएमसी की ताकत थी. अब जब सत्ता चली गई, तो बंगाल में वही पैटर्न दोहराया जा रहा है. वाम दलों की तरह ही सत्ता जाते ही टीएमसी के कार्यकर्ता-नेता ममता का साथ छोड़ने लगे हैं.
BJP की सरकार बनने पर TMC टूट रही
2026 में भाजपा की भारी जीत के बाद टीएमसी में टूट के संकेत साफ हैं. टीएमसी के कई नेता भाजपा के संपर्क में बताए जा रहे हैं. पार्टी की बैठकों और कार्यक्रमों से कुछ विधायकों की दूरी से इसका अनुमान लगाया जा सकता है. स्थानीय कार्यकर्ता तो पहले ही पाला बदल चुके हैं या बदलने की तैयारी में हैं. ममता बनर्जी की हार ने पार्टी के मनोबल को तोड़ा है. हार से अंदरूनी कलह शुरू हुआ है. सत्ता जाने के बाद कार्यकर्ताओं में पैदा हुआ डर पार्टी को कमजोर कर रहा है. जहां पहले टीएमसी में शामिल होना फायदेमंद था, वहां अब भाजपा सरकार में जाने की होड़ लगी है. अगर ऐसा ही रहा तो ममता बनर्जी का भी ‘लाल’ वाला हाल हो जाएगा. 2011 में वाम दलों का यही हाल हुआ था. बड़े नेता तो कम भागे, लेकिन कार्यकर्ताओं का पलायन हो गया. क्लबों और पंचायतों पर टीएमसी ने कब्जा कर लिया. टीएमसी के साथ भी अब यही हो रहा है. ममता बनर्जी की टीएमसी भी सत्ता-केंद्रित पार्टी रही है. बिना सत्ता के इसे टिकाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा. ममता की उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए टीएमसी का भविष्य अनिश्चित लग रहा है.
लेफ्ट शासन के 34 साल बाद TMC राज
2011 में लेफ्ट फ्रंट का 34 साल से चला आ रहा शासन टीएमसी के हाथ चला गया था. अपने शासन के 15 साल में ममता बनर्जी ने वामपंथी संगठन को बंगाल में बेजान ही कर दिया था. कई स्थानीय नेता, पार्षद, पंचायत प्रतिनिधि और कार्यकर्ता टीएमसी में शामिल हो गए. हालांकि शीर्ष स्तर के बड़े नेताओं का स्विच कम हुआ. ज्यादातर टॉप लीडर पार्टी में बने रहे, लेकिन मध्य और निचले स्तर पर पलायन काफी हुआ. गौतम देव वाम मोर्चा सरकार में मंत्री रहे. 2011 में हार के बाद वे टीएमसी में चले गए. बाद में वे सिलीगुड़ी के मेयर बने. उत्तर बंगाल में वे टीएमसी का प्रमख चेहरा बने. 2021 में डायमंड हार्बर में सीपीएम से लोकसभा का प्रत्याशी रहे प्रतिकुर्रमान ने 2026 में टीएमसी ज्वाइन कर ली.