कर्नाटक की कहानी; कांग्रेस का मास्टरस्ट्रोक या बीजेपी के भाग्य खुले……………….

कर्नाटक में कांग्रेस ने कार्यकाल के बीच सीएम बदल दिया। 77 साल के सिद्धारमैया की जगह 64 साल के डीके शिवकुमार लेंगे। कहा जा रहा है कि ये फैसला एक सीक्रेट डील के तहत हुआ। लेकिन बीजेपी को दो तैयार मुद्दे मिल गए- ओबीसी नेता की अनदेखी और दागदार छवि वाले नेता को कुर्सी। आखिर […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शुक्रवार, 29 मई 2026, 06:53 AM 13 मिनट read
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कर्नाटक की कहानी; कांग्रेस का मास्टरस्ट्रोक या बीजेपी के भाग्य खुले……………….
Photo: UB India News Archive

कर्नाटक में कांग्रेस ने कार्यकाल के बीच सीएम बदल दिया। 77 साल के सिद्धारमैया की जगह 64 साल के डीके शिवकुमार लेंगे। कहा जा रहा है कि ये फैसला एक सीक्रेट डील के तहत हुआ। लेकिन बीजेपी को दो तैयार मुद्दे मिल गए- ओबीसी नेता की अनदेखी और दागदार छवि वाले नेता को कुर्सी।

आखिर कांग्रेस ने अचानक क्यों बदला सीएम और चुनाव से 23 महीने पहले हुआ यह फेरबदल कांग्रेस के लिए फायदेमंद होगा या नुकसानदेह? 

बैक-स्टोरीः कर्नाटक में सीएम कुर्सी की खींचतान और एक सीक्रेट डील

मई 2023 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव हुए। सिद्धारमैया की सोशल इंजीनियरिंग और डीके शिवकुमार की मेहनत और इलेक्शन मैनेजमेंट की बदौलत कांग्रेस को बहुमत मिला। 224 में से 135 सीटें। सीएम की कुर्सी पर सिद्धारमैया और डीके दोनों ने दावा किया।

घोषणा के बाद डीके से एक पत्रकार ने पूछा- क्या कर्नाटक में ये सरकार 5 साल चलेगी, सिद्धारमैया के साथ सीएम पद को लेकर विवाद तो नहीं होगा?

डीके ने हल्की मुस्कान के साथ कहा- कर्नाटक में 5 साल तक कांग्रेस सरकार चलेगी। सिद्धारमैया के 5 साल सीएम रहने पर उन्होंने कुछ नहीं कहा।

डीके के जेस्चर से कयास लगने लगे कि कर्नाटक में ढाई-ढाई साल के सीएम पर बात बनी है।

19 मई 2023 को दिल्ली में हुई मीटिंग के बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार।
19 मई 2023 को दिल्ली में हुई मीटिंग के बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार।

कांग्रेस कवर करने वाले सीनियर जर्नलिस्ट आदेश रावल बताते हैं, ‘कांग्रेस आलाकमान की उस मीटिंग में तय किया गया कि सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री बनेंगे। तब डीके चाहते थे कि इस फैसले का ऐलान किया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।’

20 नवंबर 2025 को जब सिद्धारमैया के कार्यकाल के ढाई साल पूरे हुए, तब भी लामबंदियां और बयानबाजियां शुरू हुईं। डीके और उनके समर्थक ‘सीक्रेट डील’ को पूरा करने का दबाव बना रहे थे, जबकि सिद्धारमैया इससे इनकार कर रहे थे। ऐसे में आलाकमान ने दोनों नेताओं को दिल्ली बुलाकर समझाइश दी। इसके बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

नवंबर-दिसंबर 2025 में जब कर्नाटक से उठापट की खबरें आ रहीं थीं, तब एक सुबह सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार साथ में नाश्ता करते हुए।
नवंबर-दिसंबर 2025 में जब कर्नाटक से उठापट की खबरें आ रहीं थीं, तब एक सुबह सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार साथ में नाश्ता करते हुए।

सीएम कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं थे सिद्धारमैया

20 मई 2026 को सिद्धारमैया के 3 साल पूरे हो गए। सीएम बदलने की चर्चा फिर शुरू हुई। कांग्रेस आलाकमान ने सीएम सिद्धारमैया को अचानक दिल्ली तलब किया। कहा गया- आप सुबह 11 बजे तक दिल्ली के इंदिरा भवन (कांग्रेस मुख्यालय) पहुंचे।

5 दशकों से राजनीति करने वाले सिद्धारमैया समझ गए माजरा क्या है। सो उन्होंने इंदिरा भवन जाने से पहले पावर शो किया। दिल्ली के कर्नाटक भवन में अपने वफादारों के साथ ब्रेकफास्ट मीटिंग की।

मेज पर सिद्धारमैया के चारों ओर जी परमेश्वर, सतीश जारकीहोली और एचसी महादेवप्पा जैसे उनके खास मंत्री बैठे थे। कुछ विधायक भी मौजूद थे।

दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाके के कर्नाटक भवन में अपने खास मंत्रियों के साथ नाश्ता करते सिद्धारमैया।
दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाके के कर्नाटक भवन में अपने खास मंत्रियों के साथ नाश्ता करते सिद्धारमैया।

11 बजते ही इंदिरा भवन में हलचल शुरू हो गई। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल, कर्नाटक कांग्रेस प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला, सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार एक-एक करके कांग्रेस मुख्यालय पहुंचे।

बैठक शुरू हुई। पहली बैठक में खड़गे, राहुल, वेणुगोपाल और सुरजेवाला शामिल हुए। 2 घंटे तक ये बातचीत हुई। इसके बाद सिद्धारमैया और डीके को अंदर बुलाया गया। बातचीत हुई और लंच हुआ।

हालांकि राहुल लंच के लिए अपने घर चले गए, जहां उन्होंने सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा से बातचीत की। रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रियंका चाहती थीं कि कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन हो। इसके बाद राहुल फिर इंदिरा भवन पहुंचे।

सीनियर जर्नलिस्ट आदेश रावल के मुताबिक, मीटिंग में सिद्धारमैया को दो ऑफर दिए गए। पहला कि आप राज्यसभा आइए और सेंट्रल लीडरशिप में काम करिए। दूसरा कि आपके बेटे को यतींद्र सिद्धारमैया को कैबिनेट मंत्री बनाया जाए। इस पर सिद्धारमैया ने कहा कि उन्हें परिवार और करीबियों से सलाह-मशवरा करना है। इसके लिए उन्होंने वक्त मांगा।

मीटिंग खत्म होने के बाद कांग्रेस नेताओं ने मीडिया से बात की।
मीटिंग खत्म होने के बाद कांग्रेस नेताओं ने मीडिया से बात की।

शाम पौने 6 बजे वेणुगोपाल, सुरजेवाला, सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार इंदिरा भवन से बाहर निकले। तब मीडिया से बातचीत करते हुए वेणुगोपाल ने कहा- जो अटकलें लगाई जा रही हैं, वे सिर्फ अटकलें हैं। इनमें कोई सच्चाई नहीं है। बैठक में राज्यसभा और विधान परिषद (MLC) चुनावों पर चर्चा हुई।

28 मई को मंत्रियों के साथ नाश्ता, दोपहर में इस्तीफा

28 मई को सिद्धारमैया ने बेंगलुरू में अपने आवास पर ब्रेकफास्ट मीटिंग की, जिसमें डीके शिवकुमार समेत पूरा मंत्रिमंडल शामिल हुआ। यहां सिद्धारमैया ने ऐलान किया कि मैं कुर्सी छोड़ रहा हूं।

संसदीय कार्य मंत्री एचके पाटिल ने बताया कि मीटिंग में डीके शिवकुमार के नाम पर मुहर लगी। वह अगले सीएम होंगे। मीटिंग में डीके ने सिद्धारमैया के पैर छुए। फिर सिद्धारमैया ने उन्हें गले लगा लिया।

सिद्धारमैया ने राज्यपाल थावरचंद गहलोत से मुलाकात के लिए समय मांगा था। लेकिन राज्यपाल पारिवारिक स्वास्थ्य कारणों के चलते बेंगलुरू से बाहर हैं। अभी वे इंदौर में हैं। ऐसे में सिद्धारमैया ने लोकभवन पहुंचकर राज्यपाल के विशेष सचिव प्रभु शंकर को अपना इस्तीफा सौंपा।

लोकभवन में जब सिद्धारमैया इस्तीफा दे रहे थे, तब उनके साथ डीके शिवकुमार, प्रियांक खड़गे और कई मंत्री मौजूद रहे।
लोकभवन में जब सिद्धारमैया इस्तीफा दे रहे थे, तब उनके साथ डीके शिवकुमार, प्रियांक खड़गे और कई मंत्री मौजूद रहे।

नियमों के मुताबिक, राज्यपाल जब राज्य में न हों, तब सीएम लिखित इस्तीफा राजभवन के अधिकारियों को ई-मेल, फैक्स के जरिए या खुद जाकर दे सकते हैं। राज्यपाल बाद में उसे स्वीकार करते हैं। इस्तीफा मंजूर होने तक मौजूदा सीएम ही पद पर रहेंगे।

वहीं, डीके शिवकुमार भी कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे सकते हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि उनकी जगह सतीश जोरकीहोली ले सकते हैं, जो सिद्धारमैया के खास सिपहसलार हैं और अभी कर्नाटक कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हैं।

डीके के सीएम बनने में अभी एक और पेंच है। खबरें हैं कि डीके शिवकुमार का शपथ ग्रहण समारोह सिद्धारमैया के राज्यसभा नामांकन के बाद होगा। राज्यसभा नामांकन की आखिरी तारीख 8 जून है।

चुनाव से 23 महीने पहले सिद्धारमैया से कुर्सी क्यों खाली करवाई गई?

अप्रैल-मई 2028 में कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। 23 महीने पहले सीएम बदलने के पीछे एक्सपर्ट्स 5 बड़ी वजहें बताते हैं…

1. आने वाले चुनावों पर फोकस: राहुल गांधी चाहते हैं कि कर्नाटक में ऐसा नेता हो जो अगले 10-15 साल तक राजनीति कर सके। 2028 में फिर से सरकार बनाए और 2029 में लोकसभा की ज्यादा सीटें जिता सके। 2028 तक सिद्धारमैया करीब 80 साल के हो जाएंगे। ये बात डीके के फेवर में जाती है।

2. वक्त रहते पार्टी की बगावत मैनेज करनाः कांग्रेस आलाकमान जानता है कि ज्यादातर विधायक सिद्धारमैया के साथ हैं। वे कांग्रेस के एकमात्र ओबीसी सीएम भी हैं। ऐसे में पार्टी ये बदलाव बेहद सावधानी से करना चाहती है, ताकि सिद्धारमैया का सम्मान बना रहे और बगावत की स्थिति न बने। अगर कोई बगावत जैसी स्थिति बने, तो उसे समय रहते मैनेज किया जा सके।

3. सिद्धारमैया का एंटी-इन्कम्बेंसी फैक्टरः सिद्धारमैया के दूसरे कार्यकाल में भ्रष्टाचार के भी गंभीर आरोप लगे हैं। मैसूर अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी स्कैम में तो सीधे सिद्धारमैया के परिवार को घेरा जा रहा है। इसके चलते उनके परिवार को 14 प्लॉट छोड़ने पड़े। सिद्धारमैया के खिलाफ एंटी-इन्कमबेंसी फैक्टर एक्टिव हो सकता है। जिसे बीजेपी-JDS भुना सकती है।

4. वोक्कालिगा समुदाय का दबावः डीके कर्नाटक के रसूखदार वोक्कालिगा (15%) समुदाय के सबसे बड़े नेता बनकर उभरे हैं। उनके समर्थकों ने साफ कर दिया था कि अगर डीके को नजरअंदाज किया, तो यह पूरे समुदाय का अपमान माना जाएगा। इससे ओल्ड मैसूर में कांग्रेस का आधार पूरी तरह खिसक सकता था। ओल्ड मैसूर बेल्ट में 61 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 39 कांग्रेस के पास हैं, यानी 64% सीटें। हालांकि यहां की 12 लोकसभा सीटों में से सिर्फ 2 कांग्रेस के पास है।

5. डीके कांग्रेस के संकटमोचकः डीके की छवि कांग्रेस में ‘संकटमोचक’ और ‘फंड मैनेजर’ की है। 2023 के चुनावी हलफनामे के मुताबिक, डीके के पास 1413.7 करोड़ रुपए की संपत्ति है। उनका माइनिंग, रियल एस्टेट, एजुकेशन और ट्रांसपोर्ट का कारोबार है। वो दूसरे राज्यों में भी कांग्रेस के इलेक्शन मैनेजमेंट में माहिर हैं। नवंबर 2025 में उन्होंने कहा था- मेरी कोशिश है कि मैं राज्य में 100 कांग्रेस ऑफिस बनवाऊं।

Vote Vibe के फाउंडर और इलेक्शन एनालिस्ट अमिताभ तिवारी मानते हैं कि लीडरशिप चेंज को लेकर कांग्रेस का इंटेंशन अच्छा है, लेकिन ये दांव उल्टा भी पड़ सकता है।

सिद्धारमैया ने इस्तीफा देने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस की। वे बोले- मैंने बार-बार कहा था कि जब भी आलाकमान कहेगा, मैं इस्तीफा दे दूंगा। इस दौरान डीके शिवकुमार उनके बगल में बैठे रहे।
सिद्धारमैया ने इस्तीफा देने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस की। वे बोले- मैंने बार-बार कहा था कि जब भी आलाकमान कहेगा, मैं इस्तीफा दे दूंगा। इस दौरान डीके शिवकुमार उनके बगल में बैठे रहे।

तो क्या इस उठापटक का फायदा बीजेपी उठा सकती है?

बीजेपी 66 सीटों के साथ अभी कर्नाटक में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। पिछले दो विधानसभा चुनावों में 36%, जबकि 2024 के लोकसभा में 46% वोट मिले। वहीं उसकी साथी JDS के पास 19 सीटें हैं। उसके पास भी करीब 15% वोट शेयर है।

राज्य के लिंगायत (17%) समुदाय में बीजेपी मजबूत है। कद्दावर नेता बीएस येदुरप्पा भी लिंगायत हैं और उनकी इस पर मजबूत पैठ है। एचडी देवगौड़ा की JDS के साथ अलायंस कर बीजेपी ने वोक्कालिगा में भी सेंध लगाई है। दरअसल, देवगौड़ा वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं। उन्हें समुदाय में ‘मण्णिना मगा’ यानी धरतीपुत्र कहा जाता है।

सिद्धारमैया की जगह डीके शिवकुमार के सीएम बनाने से बीजेपी दो नैरेटिव बना सकती है…

1. कांग्रेस में अहिंदा वोटर्स की अनदेखी हो रही

  • बीजेपी नैरेटिव बना सकती है कि कांग्रेस पिछड़ों की विरोधी है और उसने ओबीसी नेता को हटाकर आलाकमान के ‘फंड मैनेजर’ को कुर्सी सौंप दी।
  • कांग्रेस नेता और पूर्व सीएम देवराज उर्स के बाद सिद्धारमैया कर्नाटक में ‘अहिंदा’ समुदाय के सबसे बड़े नेता हैं। अहिंदा में अल्पसंख्यक, पिछड़ा और दलित शामिल हैं, जिनकी आबादी 62% है।
  • अहिंदा नेता लखन जारकीहोली ने भी दावा किया कि सिद्धारमैया के कुर्सी छोड़ने से अहिंदा वोटर्स कांग्रेस से छिटक सकते हैं। अहिंदा के दम पर ही 2013 और 2023 में कांग्रेस को सत्ता मिली।
  • डीके वोक्कालिगा जाति से हैं। अमिताभ तिवारी बताते हैं कि जिस तरह नॉर्थ में यादव वोटर्स हैं, वैसे ही कर्नाटक में वोक्कालिगा। डीके के सीएम बनने से वोक्कालिगा मजबूत होंगे। जबकि पिछड़े और दलित वोटर्स को लगेगा कि उनकी अनदेखी हो रही है, जिससे वे बीजेपी-JDS के साथ हो सकते हैं।

2. डीके पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर घेराबंदी

  • बीजेपी कोशिश करेगी कि डीके के खिलाफ करप्शन का मुद्दा उठाया जाए। 2023 के चुनावी हलफनामे में डीके ने बताया था कि उनके खिलाफ 19 केस हैं, जिनमें ED, CBI और इनकम टैक्स से जुड़े मामले हैं। इन्हीं के चलते वे जेल भी जा चुके हैं।
  • अमिताभ तिवारी भी मानते हैं कि बीजेपी ये मुद्दा उठाएगी और इससे मिडिल क्लास पर असर पड़ेगा, लेकिन क्या कर्नाटक में करप्शन इतना बड़ा मुद्दा है? मेरे हिसाब से तो नहीं।
10 मई को बेंगलुरू पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक में कांग्रेस के भीतर मची खींचतान को लेकर निशाना साधा था।
10 मई को बेंगलुरू पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक में कांग्रेस के भीतर मची खींचतान को लेकर निशाना साधा था।

क्या इस फेरबदल से कांग्रेस को नुकसान होगा?

पॉलिटिकल एनालिस्ट बीएस मूर्ति मानते हैं कि पार्टी को इतिहास से सबक लेना चाहिए। जब कांग्रेस ने लिंगायत नेता वीरेंद्र पाटिल को सीएम पद से हटाया था, तब लिंगायत वोटर्स कांग्रेस से अलग हो गए। उत्तर कर्नाटक में कई चुनावों में कांग्रेस को संघर्ष करना पड़ा। सिद्धारमैया के मामले में भी ऐसा हो सकता है।

आदेश रावल के मुताबिक अभी जातीय समीकरणों का हिसाब लगाना जल्दबाजी होगा। डीके के सामने चुनौती होगी कि वे वोक्कालिगा वोटर्स को एकजुट कर कांग्रेस से जुड़े और अहिंदा वोटर्स को बरकरार रखें।

अमिताभ तिवारी बताते हैं कि कर्नाटक में अभी तक माना जाता था कि बीजेपी लिंगायत, JDS वोक्कालिगा और कांग्रेस अहिंदा सीएम बना सकती है। लेकिन डीके के सीएम बनने से ये नैरेटिव बदल जाएगा।

वोक्कालिगा वोटर्स को लगेगा कि कांग्रेस और JDS दोनों ही उनकी कम्युनिटी से सीएम बना सकते हैं। वहीं लिंगायत अभी भी बीजेपी की ओर देख रही है। ऐसे में अकेले पड़ चुके अहिंदा को बीजेपी साध सकती है। इसके लिए बीजेपी डॉमिनेंट क्लास पॉलिटिक्स करने का टैग हटाएगी, जैसा कि उसने बाकी राज्यों में किया।

इसी जातीय समीकरण को साधने के लिए डीके शिवकुमार के साथ 2-3 डिप्टी सीएम बनाए जा सकते हैं। इसको लेकर दलित समुदाय के जी परमेश्वर और लिंगायत कम्युनिटी के एमबी पाटिल का नाम सबसे आगे चल रहा है।

वहीं इस्तीफा देने के बाद सिद्धारमैया ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसमें उन्होंने राज्यसभा जाने और नेशनल पॉलिटिक्स में एक्टिव होने का ऑफर ठुकरा दिया। कहा कि 50 साल का मेरा पॉलिटिकल करियर है, जो एक खुली किताब है।

सिद्धारमैया ने कहा है कि वे कर्नाटक राजनीति में सक्रिय रहेंगे। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि सिद्धारमैया भीतरखाने कोई दांव न चल दे, जिससे कांग्रेस के लिए मुश्किल हो।

फिलहाल सिद्धारमैया ने भी कोई ऐसा बयान या संकेत नहीं दिया है, जो कांग्रेस के लिए दिक्कतें पैदा करे। हालांकि उनका बगावत का इतिहास रहा है। उन्होंने JDS का साथ छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा। अब भी उनके पास बड़ा वोटबैंक है और दर्जनों विधायक उनके लॉयलिस्ट हैं।

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