तारीख पर तारीख नहीं चलेगी, सुप्रीम कोर्ट ने देश के हाईकोर्ट में लंबित फैसलों पर किया डेडलाइन सेट ……………

सुप्रीम कोर्ट ने देश के हाईकोर्ट में लंबित मामलों और फैसलों में देरी को लेकर बड़ा कदम उठाया है. शीर्ष अदालत ने जल्द इंसाफ देने की कवायद को लेकर अहम और बाध्यकारी दिशा-निर्देश जारी किया है. सर्वोच्च अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि हाईकोर्ट में सुरक्षित फैसले पर अधिकतम 3 महीने में निर्णय […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शुक्रवार, 29 मई 2026, 07:15 AM 5 मिनट read
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तारीख पर तारीख नहीं चलेगी, सुप्रीम कोर्ट ने देश के हाईकोर्ट में लंबित फैसलों पर किया डेडलाइन सेट ……………
Photo: UB India News Archive

सुप्रीम कोर्ट ने देश के हाईकोर्ट में लंबित मामलों और फैसलों में देरी को लेकर बड़ा कदम उठाया है. शीर्ष अदालत ने जल्द इंसाफ देने की कवायद को लेकर अहम और बाध्यकारी दिशा-निर्देश जारी किया है. सर्वोच्च अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि हाईकोर्ट में सुरक्षित फैसले पर अधिकतम 3 महीने में निर्णय सुनाने का आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने जमानत मामलों में फैसला यथासंभव अगले दिन दिया जाएगा. चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने अपने फैसले में ये कहा है.

जमानत को लेकर भी बड़ा आदेश 

पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि हाईकोर्ट में सुरक्षित फैसले अधिकतम 3 महीने के भीतर सुनाए जाएंगे. इसके अलावा जमानत मामलों में फैसला यथासंभव अगले दिन दिया जाएगा और उसी दिन जेल अधिकारियों को भी सूचित किया जाएगा. शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में साथ ही कहा कि जिन जिन मामलों में व्यक्ति हिरासत में है, उसमें अंडरट्रायल को उसी दिन या अधिकतम अगले दिन रिहा करने का निर्देश.

वेबसाइट पर अपलोड करना होगा फैसले का पूरा कारण 

सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही कहा कि अदालत में केवल ऑपरेटिव (मुख्य) हिस्सा तुरंत घोषित किया जाएगा, जबकि विस्तृत कारण  7 दिनों के भीतर अपलोड करना अनिवार्य होगा. फैसले सुरक्षित रखने की तारीख को हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अनिवार्य रूप से दिखाया जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि निर्देशों का पालन नहीं होता, तो मामले को किसी अन्य बेंच को सौंपा जा सकता है. यदि 30 दिनों में कारण अपलोड नहीं किए जाते, तो मामला नई बेंच को ट्रांसफर किया जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की पूरी बात समझिए 

देश की अदालतों में फैसले सुरक्षित रखने के बाद उन्हें सुनाने और ऑनलाइन अपलोड करने में होने वाली अत्यधिक देरी के मामले पर सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले मे कहा है कि अगर फैसला 3 महीने के अंदर नहीं सुनाया जाता है, तो रजिस्ट्रार जनरल उसे चीफ जस्टिस के सामने रखेंगे, और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश 2 हफ्ते का और समय दे सकते हैं. अगर फिर भी इसका पालन नहीं होता है तो केस दूसरी बेंच को दे दिया जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर ऑपरेटिव पार्ट के ऐलान के 15 दिनों के अंदर कारण अपलोड नहीं किए जाते हैं तो इसके लिए एप्लीकेशन दी जा सकती है. अगर 30 दिनों के अंदर अपलोड नहीं किए जाते हैं तो केस वापस लेने और सुनवाई के लिए दूसरी बेंच में ले जाने के लिए एप्लीकेशन दी जा सकती है. बहस खत्म होने के बाद, जजमेंट रिज़र्व की तारीख हाई कोर्ट की वेबसाइट पर दिखेगी.

‘समय पर फैसला सुनना जरूरी है’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि HC प्राथमिक संस्थाएं हैं, जहां हजारों लोग न्याय पाने के लिए आते हैं और समय पर निर्णय सुनाना आवश्यक है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि ये निर्देश किसी भी जज या संस्था पर लांछन लगाने के उद्देश्य से नहीं हैं. झारखंड हाईकोर्ट के फैसलों में देरी होने जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से आदेश दिया गया. किसी कारण से अगर तीन महीने में फैसला नहीं दिया जाता तो पक्षकार के पास आवेदन करने का विकल्प होगा.

हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश 

हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया गया है कि वे इन गाइडलाइंस को अपने-अपने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के सामने रखें. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले मे ये भी कहा है कि जिस मामले में फैसला रिज़र्व है, उस पर फैसला रिजर्व होने के 3 महीने के अंदर सुनाया जाएगा. पर्सनल लिबर्टी वगैरह के मामलों में तेजी से फैसले होंगे. जमानत के मामलो मे ऑर्डर रिजर्व होने के अगले दिन ही फैसला देना होगा. जमानत के आदेश जेल अधिकारियों को बताए जाएंगे.

राज्यों को भी जारी किया गया था नोटिस

अंडरट्रायल कैदी को जमानत के दिन या ज्यादा से ज्यादा अगले दिन रिहा किया जाएगा. ट्रायल कोर्ट को हाईकोर्ट को कंप्लायंस के बारे में बताना होगा. पिछली सुनवाई के दौरान  इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को नोटिस जारी किया था.

एक याचिका पर आया है सुप्रीम कोर्ट का आदेश 

दरअसल एक याचिकाकर्ताओं ने शिकायत की थी कि झारखंड हाईकोर्ट ने उनकी आपराधिक अपीलों पर अंतिम बहस सुनने के बाद 2 से 3 साल से फैसला सुरक्षित रखा हुआ था और फैसला सुनाया नहीं जा रहा था. शिकायत के बाद CJI जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने इस मामले का दायरा बढ़ाते हुए देश के सभी हाईकोर्ट्स से स्टेटस रिपोर्ट मांगी थी कि उनके यहां कितने मामलों में महीनों या सालों से फैसले सुरक्षित रखे गए हैं.

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