20 से ज़्यादा मौत के बाद पता चला कि क़ानून के हिसाब से तो बिल्डिंग बनी ही नहीं थी?

सौ बात की एक बात ये कि दिल्ली के मालवीय नगर के हौज़ रानी में होटेल में आग लग गई तो अधिकारियों को पता चल रहा है कि 6 कमरे बनाने की इजाज़त ली थी और 25 कमरे बना दिए? आग में 20 से ज़्यादा लोग मर गए तब पता चल रहा है कि क़ानून […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 4 जून 2026, 06:23 AM 9 मिनट read
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20 से ज़्यादा मौत के बाद पता चला कि क़ानून के हिसाब से तो बिल्डिंग बनी ही नहीं थी?
Photo: UB India News Archive
सौ बात की एक बात ये कि दिल्ली के मालवीय नगर के हौज़ रानी में होटेल में आग लग गई तो अधिकारियों को पता चल रहा है कि 6 कमरे बनाने की इजाज़त ली थी और 25 कमरे बना दिए? आग में 20 से ज़्यादा लोग मर गए तब पता चल रहा है कि क़ानून के हिसाब से तो बिल्डिंग बनी ही नहीं थी? अभी हफ़्ता भी नहीं हुआ जब साकेत के सैद-उल-अजायब में पूरी बिल्डिंग गिर गई थी और 6 लोगों की जान चली गई क्या तब पता चला था अधिकारियों को कि अवैध निर्माण था? एक तो बहुत से दिल्ली वालों को भी नहीं पता ये हौज़ रानी और सैद-उल-अजायब इलाक़े बाक़ी दिल्ली से अलग हैं क़ानूनी तौर पर भी. सब लोग हौज़ रानी को भी मालवीय नगर कहते हैं जैसे होटेल में लगी आग के बाद कह रहे हैं. सब लोग सैद-उल-अजायब को साकेत कहते हैं, जैस बिल्डिगं गिरने के बाद कह रहे थे. लेकिन बहुत से दिल्ली वाले भी नहीं जानते कि ये लाल डोरा इलाक़े हैं. दिल्ली के पुराने लोग तो शायद जानते हैं, लेकिन बाक़ी लोग ज़्यादा नहीं जानते लाल डोरा के बारे में. और दिल्ली के बाहर के लोग तो शायद बिलकुल भी नहीं जानते. हालांकि ये लाल डोरा जैसे इलाक़े लगभग हर शहर में होते हैं. लेकिन ये समझने और जानने की ज़रूरत है कि ये लाल डोरा इलाक़े होते क्या हैं.
अवैध कॉलोनी और लाल डोरा में फर्क
एक तो अवैध कॉलोनियां होती हैं और एक लाल डोरा इलाक़े होते हैं और दोनों में फ़र्क है. क्योंकि ये तो दिख ही रहा है कि निर्माण अवैध थे. और जांचें तो होती रहेंगी. यहां भी फिर वही होगा कि जांच होगी और जांच के बाद नतीजा क्या आएगा कोई देखेगा ही नहीं. तो लाल डोरा को तो समझ ही लेंगे लेकिन इतना खुल्ले में अवैध बिल्डिंगें खड़ी कैसे हो जाती हैं ये भी तो समझना होगा. इन अधिकारी लोगों को डर क्यों नहीं लगता? हर इलाक़े का ज़िम्मेदार कोई अधिकारी तो होता ही है ना. तो उनको डर क्यों नहीं लगता कि कुछ हो गया तो वो नप जाएंगे? ये कह देना तो आसान है कि सब पैसे खा कर बैठ जाते हैं. ये तो सब देख रहे हैं कि नियम क्या थे और क्या बना दिया, ये तो सब देख रहे हैं कि 6 कमरों की इजाज़त दी गई थी और 25 कमरे बना दिये होटेल में, ये तो सब देख रहे हैं कि फ़ायर विभाग के ये नियम थे और उनका पालन नहीं किया गया, ये बता रहे हैं कि दरवाज़ा एक था दो होने चाहिए थे, रास्ता इतना छोड़ना चाहिए था, ये होना चाहिए था, वो होना चाहिए था वगैरह-वगैरह.
अधिकारियों के लिए क्या नियम होते हैं?
16 साल पुरानी अग्निकांड की वो कहानी
16 साल पहले की बात है. 15 नवंबर 2010 की शाम को पूर्वी दिल्ली में लक्ष्मी नगर के पास ललिता पार्क इलाक़े में एक पांच मंजिला इमारत अचानक ढह गई थी. रात कोई 8:15 बजे इमारत एकदम से गिर गई थी. पत्तों के ढेर की तरह. उसमें क़रीब 200 लोग रहते थे. ज़्यादातर ग़रीब मज़दूर परिवार थे जो दूसरे राज्यों से दिल्ली आए थे काम करने. कुछ छोटे-मोटे दुकानदार भी थे. 70 लोगों की मौत हो गई थी. 70-75 लोग घायल हो गए थे. कई लोग मलबे में दब गए थे. पूरी दिल्ली दहल गई थी एक तरह से. पूरे देश में सुर्ख़ियों में ये हादसा आया था. और वजह वही थी. अवैध निर्माण. इजाज़त जितने कमरों की थी उससे कहीं ज़्यादा कमरे बना दिये थे. और उसके बाद पांचवीं मंजिल बनाई जा रही थी, जो बिलकुल ही बिना इजाज़त की थी.
Flourish Stay B&B
मालवीय नगर के Flourish Stay B&B में कल आग लगी थी.
70 लोगों की मौत की कीमत 21 हजार जुर्माना
निर्माण अवैध भी था और ख़राब क्वॉलिटी का भी था. कोई मेनटेनेंस भी नहीं थी. फ़ायर ब्रिगेड संकरी गलियों में अटक कर रह गई थी. पड़ोसी अपने हाथों से मलबा हटा-हटा कर लोगों को निकालने में लगे थे. मलबे से लोगों के चीख़ने की आवाज़ें आ रही थीं. घंटों तक आवाज़ें आती रहीं लेकिन कई लोगों को बचाया नहीं जा सका था. ख़ौफ़नाक मंज़र हो गया था. ये सब क्यों याद करना ज़रूरी है? क्योंकि यही कहा गया था कि सख़्त से सख़्त सज़ा दी जाएगी. क्या हुआ जांच का? जांच चली 8 साल. 8 साल तक जांच चली. और एक जूनियर इंजीनियर को दोषी पाया गया. 70 लोगों की जान चली गई, 70-75 लोग ऐसे घायल हुए कि उसके बाद उनकी ज़िंदगी बदल गई, और सिर्फ़ एक जूनियर इंजीनियर को दोषी पाया गया था. वो भी आठ साल बाद. और सज़ा क्या हुई उसको? क्या सख़्त से सख़्त सज़ा दी गई जानते हैं? जुर्माना हुआ था. पूरी 21 हज़ार रुपये. 70 लोगों की जान गई. सिर्फ़ एक जूनियर इंजीनियर को इन्होंने ज़िम्मेदार माना कि उसने नियम फ़ॉलो नहीं करवाए. और उसको भी जुर्माना लगाया 21 हज़ार रुपये का. और सुनो. वो जूनियर इंजीनियर तब तक रिटायर हो चुके थे. तो 21 हज़ार रुपये उनसे कैसे वसूले? 1750 रुपये की 12 किस्तों में. 1750 रुपये हर महीने उस इंजीनियर ने जुर्माना भरा एक साल तक. ये हो गई इनकी सख़्त से सख़्त सज़ा. जान की क़ीमत तो छोड़ो, रिश्वत की क़ीमत भी नहीं वसूली गई. ये होती हैं इनको सज़ाएं? तो ये लोग क्यों डरेंगे? किस बात से डरेंगे? कैसे नहीं होंगे अवैध निर्माण? और ये हादसा होने पर अधिकारियों को दिखेत होंगे. बाक़ी तो सबको खुले आम दिखते हैं.
लाल डोरा इलाके किसे कहते हैं?
नगर निगम की वर्क्स कमिटी के पूर्व अध्यक्ष ने दिल्ली के मास्टर प्लान 2041 पर जो चर्चाएं हुईं उनमें DDA को बताया था कि दिल्ली की 55 लाख बिल्डिंगों में नक़्शे जानते हैं कितनी बिल्डिंगों के पास हैं? क़रीब 2 लाख के. 55 लाख बिल्डिंगों में 2 लाख के ही नक़्शे हैं. तो ये कोई ऐसा थोड़े ही है कि इक्का दुक्का जगहों का मामला है. 1700 से ज़्यादा तो कॉलोनियां ही अवैध हैं. 50 लाख लोग रहते हैं उनमें. और 357 लाल डोरा इलाक़े हैं. अब आइए लाल डोरा इलाक़ों पर. तो ये जो लाल डोरा इलाक़े हैं इनको लाल डोरा इलाक़ा बताया था अंग्रेज़ों ने. जब उनका राज होता था. लाल डोरा इलाक़े दिल्ली के पुराने गांवों के आबादी वाले हिस्से को कहते हैं. ये दिल्ली के बीचों बीच पुराने गांव वाले इलाक़े हैं. हौज़ रानी, जहां आग का हादसा हुआ, वो मालवीय नगर से घिरा हुआ पुराना गांव है, लाल डोरा इलाक़ा है. 1908 में ब्रिटिश सरकार ने गांवों की नाप-जोख करवाई थी. गांव में जहां लोग रहते थे, उस हिस्से को नक्शे पर लाल रंग की लाइन से घेर दिया था.
अंग्रेजों से क्या है कनेक्शन
इससे ब्रिटिश अफसर आसानी से टैक्स वसूल कर पाते थे. आबादी वाली जमीन पर लैंड रेवेन्यू नहीं लगता था. नई दिल्ली बनाते समय कई गांवों की खेती की ज़मीन छीन ली गई, लेकिन आबादी वाले यानी लाल डोरा वाले हिस्से को छोड़ दिया गया था. लेकिन फिर आज़ादी के बाद भी ये इलाके शहरी नियमों से बाहर रखे गए थे. पहले लाल डोरा में मकान बनाने के लिए नगर निगम से बिल्डिंग प्लान की मंजूरी नहीं लेनी पड़ती थी. लेकिन अब ऐसा नहीं है, अब कोई गांव शहरी गांव घोषित हो जाता है, तो पुरानी वाली छूट खत्म हो जाती है. लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त ये है कि लाल डोरा इलाक़ो में अब भी बिना किसी नियम क़ानून को देखे बिल्डिंगें बनाई जा रही हैं. 357 ऐसा लाल डोरा गांव हैं दिल्ली में जहां बिल्डिंग बनाने वाले ऐसे बनाते हैं जैसे कि बाक़ी दिल्ली का क़ानून उनके लाल डोरा इलाक़े के अंदर लागू ही नहीं होता. अवैध कॉलोनियों का भी यही हाल है. पूरी की पूरी कॉलोनियां ही अवैध हैं. लेकिन अधिकारी नियम गिनाने तब आते हैं जब कोई हादसा हो जाता है. तो पब्लिक कैसे नहीं मानेगी कि बाक़ी तो वो वसूली के लिए ही आते होंगे? जब 8-8 साल की जांचों के बाद किसी एक अधिकारी को 70 मौतों के लिए सिर्फ़ 21 हज़ार रुपये भरने पड़ेंगे वो भी 1750 की महीने के किस्तों में, तो किसको होगा कोई डर?
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