बंगाल में आजादी के बाद से ही एक ट्रेंड है। जो पार्टी सत्ता से एकबार बेदखल हुई, वो कभी लौट नहीं सकी। सिर्फ कांग्रेस एक अपवाद है। 2026 का बंगाल चुनाव हारने के बाद TMC भी सबसे मुश्किल दौर में है।
क्या ममता बनर्जी TMC को संकट से निकालकर वापसी कर पाएंगी या उनके हाथ से पार्टी फिसल जाएगी; समझेंगे आज के एक्सप्लेनर में…
ममता की TMC पर कितना बड़ा संकट है?
TMC पर आए संकट को 4 संकेतों से समझिए…
- 27 मई को बंगाल के बारासात से TMC सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। वो TMC के मना करने के बावजूद CM शुभेंदु अधिकारी की एक बैठक में शामिल हुई थीं। इसमें नदिया, उत्तर 24 परगना और हुगली जिलों के 6 TMC विधायक भी शामिल थे।
- काकोली, 1998 में TMC के बनने के समय से ममता के साथ थीं। इससे पहले TMC ने उन्हें लोकसभा में मुख्य सचेतक के पद से हटाकर कल्याण बनर्जी को नियुक्त किया था। तब काकोली ने X पर लिखा, ‘आज मुझे चार दशकों की वफादारी का इनाम मिला है।’
- काकोली के अलावा TMC के पूर्व राज्यसभा सांसद शांतनु सेन, प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती, पूर्व क्रिकेटर से राजनेता बने मनोज तिवारी, फिल्म निर्माता और पूर्व विधायक राज चक्रवर्ती, TMC की असम यूनिट के पूर्व चीफ अभिजीत मजूमदार ने भी पार्टी छोड़ दी है।
- इसके अलावा राज्य की कई नगरपालिकाओं के लगभग 100 TMC पार्षदों ने इस्तीफा दे दिया है। ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी और कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम ने भी इस्तीफा देने की बात कही है।
2. दावा- भाजपा के संपर्क में TMC के 75% सांसद-विधायक
- भाजपा नेता सौमित्र खान ने दावा किया है कि TMC के कुल 28 में से 20 सांसद भाजपा के संपर्क में हैं। अगर भाजपा नेतृत्व चाहे तो अगले कुछ दिनों में TMC पूरी तरह खत्म हो सकती है।
- TMC से निकाले गए नेता रिजू दत्ता ने दावा किया कि 80 में से 50 से ज्यादा विधायक खुद को असली तृणमूल बताने की तैयारी कर रहे हैं। रिजू ने दावा किया है कि आज ये सभी विधायक विधानसभा स्पीकर के पास जाएंगे असली टीएमसी का दावा करेंगे।
- 1 जून को TMC से निकाले गए 2 विधायकों संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी ने कोलकाता में कई TMC विधायकों के साथ मीटिंग की। इसमें ममता के कई करीबी विधायक भी शामिल हुए थे।
- 1 जून को ममता बनर्जी ने फेसबुक पर वीडियो जारी कर कहा कि पुलिस TMC विधायकों और सांसदों को भाजपा में शामिल होने का दबाव बना रही है। नेताओं को डराकर या रिश्वत देकर TMC को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है।
3. 80 में सिर्फ 20 विधायक ही ममता की मीटिंग में पहुंचे
- 30 मई को ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के साथ मारपीट हुई। उन पर चप्पल और अंडे फेंके गए। अभिषेक ने हत्या की कोशिश का आरोप लगाया। अगले दिन ममता ने TMC विधायकों की बैठक बुलाई, इसमें सिर्फ 20 विधायक आए। 60 विधायक नहीं पहुंचे, तो बैठक टाल दी गई।
- TMC प्रवक्ता कुनाल घोष ने कहा कि बैठक पहले से तय थी, लेकिन अभिषेक पर हुए हमले के चलते विधायक इसके विरोध प्रदर्शन के कार्यक्रमों में व्यस्त हो गए।
4. TMC के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर लगातार हमले
- अभिषेक पर हमले के बाद 31 मई को हुगली जिले में TMC नेता कल्याण बनर्जी पर भी हमला हुआ। भीड़ ने उन पर पत्थर फेंके।
- कल्याण बनर्जी ने दावा किया कि चुनाव नतीजों के बाद TMC के 15-20 कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई है और पुलिस-प्रशासन BJP के पक्ष में काम कर रहा है।
- इसके अलावा चुनाव नतीजों के बाद से आसनसोल, कूचबिहार, बिरभूम, बारुईपुर के कई इलाकों में TMC कार्यकर्ताओं और उनके घरों पर हमले की घटनाएं हुईं।
पार्टी को बचाने के लिए ममता बनर्जी क्या कर रहीं?
ममता बनर्जी दो तरह की स्ट्रैटेजी पर काम कर रही हैं, पहली- मजबूत और जुझारू दिखो, दूसरी- पॉलिटिकली रिलेवेंट बने रहो।
चुनाव में हार के बाद पहली बार किसी सीएम ने इस्तीफा देने से मना कर दिया। जानकार बताते हैं कि ममता ने ‘मैं नहीं झुकूंगी’ वाला संदेश देने और कार्यकर्ताओं को एकजुट करने के लिए ऐसा किया।
चुनाव बाद TMC कार्यकर्ताओं के साथ हो रही हिंसा और 30 मई को अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले को भी ममता ने आक्रामक तरीके से उठाया।
TMC इन घटनाओं के विरोध में पूरे राज्य में पॉलिटिकल कैंपेन खड़ा करने की कोशिश कर रही है।
ममता ने 2 जून को कोलकाता के धर्मतला बस स्टैंड के पास प्रोटेस्ट किया। ममता ने एक मेगाफोन से भीड़ को संबोधित करते हुए कहा, ‘हमें मंच बनाने या माइक्रोफोन इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दी गई। लेकिन मैं लड़ूंगी या मर जाऊंगी।’
ममता ने कहा, ‘बंगाल में पुलिस वाले TMC नेताओं को धमका रहे हैं। इस मुश्किल समय में मैं उन्हें अकेला नहीं छोड़ूंगी।’
ममता कई मुद्दों पर INDIA ब्लॉक से अलग लीक पर चलती दिखती थीं। हालांकि चुनाव हारने के बाद उनका नया रुख दिखा। वह नेशनल लेवल पर विपक्ष की राजनीति में TMC की हिस्सेदारी और प्रभाव को कमजोर नहीं होने देना चाहतीं।
चुनाव हारते ही 5 मई को ममता ने कहा, ‘मेरा टारगेट बहुत क्लियर है। मैं INDIA टीम को मजबूत करूंगी… सोनिया जी, राहुल, अरविंद केजरीवाल, हेमंत सोरेन…सभी ने मुझे फोन किया। सभी INDIA गठबंधन के सहयोगी मेरे साथ हैं। आने वाले दिनों में हमारी एकजुटता और मजबूत होगी।’
ममता की कोशिशों के बावजूद क्या वाकई TMC बिखर सकती है?
पश्चिम बंगाल को करीब से समझने वाले एक्सपर्ट्स के बीच राय बंटी हुई है।
पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक प्रभाकर मणि तिवारी का मानना है कि TMC बिखर जाएगी। वो कहते हैं, ‘ममता 2011 में सत्ता में आईं, तो धीरे-धीरे उन्होंने भी CPM को खत्म कर दिया था। बीजेपी भी बंगाल में विपक्ष को खत्म करना चाहती है। बीजेपी की कोशिश रहेगी कि TMC के आधे से ज्यादा विधायक अलग हो जाएं, जिससे उपचुनाव भी न कराना पड़े। हालांकि अगले 2-3 महीने तक TMC में किसी बड़ी टूट की आशंका नहीं है।’
वहीं, वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी मानती हैं कि TMC में कोई बड़ा विभाजन होता नहीं दिख रहा। वो कहती हैं, ‘इसका कोई साफ संकेत नहीं है कि बीजेपी TMC नेताओं को बीजेपी में शामिल होने के लिए उकसा रही है।’
बंगाल बीजेपी के बड़े नेताओं के बयानों से भी लगता है कि बीजेपी बागियों को खुला न्योता नहीं देना चाहती…
- 1 जून को पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने कहा, ‘बंगाल में भाजपा की पॉलिसी है कि हम TMC के किसी भी व्यक्ति को पार्टी में शामिल नहीं करेंगे।
- बंगाल बीजेपी के सीनियर नेता और राज्यसभा सांसद राहुल सिन्हा ने भी ऐसा ही बयान दिया।
- बीजेपी नेता शमिक भट्टाचार्या ने भी कहा, ‘हम ऐसे किसी नेता को शामिल करेंगे, जिस पर किसी तरह का धब्बा या भ्रष्टाचार से जुड़ा कोई आरोप न हो।’
हालांकि जीत के बाद 5 मई को सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि ममता का राजनीतिक निर्वासन शुरू हो गया है। बंगाल में TMC के कई सांसद और कार्यकर्ता उनके साथ जुड़ेंगे। शिखा मुखर्जी कहती हैं कि बीजेपी फिर भी TMC को कमजोर करने के लिए कुछ विधायकों को अपने पाले में जरूर ले सकती है।
क्या बंगाल की सत्ता में टीएमसी वापसी कर पाएगी?
1977 तक बंगाल में कांग्रेस 25 साल शासन में रही। हालांकि, बीच में 1967 से 1972 तक यूनाइटेड फ्रंट भी सत्ता में आई। फिर 34 साल लेफ्ट फ्रंट की सरकार चली। 2011 में सीएम बनीं ममता 2026 तक काबिज रहीं। यानी बंगाल में जो आता है, सालों तक छा जाता है। अब बीजेपी सत्ता में है।
4 वजहों से TMC की भी सत्ता में वापसी मुश्किल लगती है…
1. कैडर बेस नई पार्टी में शिफ्ट हो जाता है
- बंगाल का सोशल स्ट्रक्चर दो हिस्सों में बंटा है। पहला- भद्रलोक यानी जमींदार और शिक्षित मध्यवर्ग। दूसरा- सर्वहारा यानी भूमिहीन किसान और मजदूर।
- कांग्रेस ने भद्रलोक के जरिए पकड़ बनाई। जबकि लेफ्ट फ्रंट ने बहुसंख्यक मजदूरों, किसानों और गरीबों को लामबंद किया।
- लेफ्ट की सरकार के दौरान बंगाल में ‘कैडर राज’ शुरू हुआ। हर गांव, मोहल्ले, बूथ पर पार्टी पहुंची। गांव-शहरों में मौजूद पार्टी के ये दफ्तर सरकार से ज्यादा ताकतवर बन गए।
- 2011 में आई ममता की TMC ने लेफ्ट की इसी मशीनरी को हथिया लिया और लेफ्ट के 1000 से ज्यादा दफ्तरों पर कब्जा कर लिया। अब ये कैडर बेस बीजेपी की तरफ शिफ्ट हो सकता है।

2. दिल्ली बनाम बंगाल का नैरेटिव खत्म
- बंगाल के लोग मानते हैं कि दिल्ली हमें समझती नहीं। लेफ्ट ने इसी भावना को अपना राजनीतिक हथियार बनाया था।
- 1980 CM ज्योति बसु ने दिल्ली पर बंगाल के साथ भेदभाव करने का नैरेटिव मजबूत किया और 34 सालों तक इसका प्रचार किया।
- ममता ने इस नैरेटिव को आगे ले जाकर इसे ‘बंगाली बनाम बाहरी’ में बदला और यह काम भी आया। लेकिन बीजेपी ने अब इस नैरेटिव को पाट दिया है।
3. ममता की जगह सुवेंदु का ‘पर्सनैलिटी कल्ट’
- पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा एक चेहरे के इर्द-गिर्द घूमती है। डॉ. बिधानचंद्र रॉय महात्मा गांधी और नेहरू के पर्सनल डॉक्टर रहे। बिधाननगर, कल्याणी, दुर्गापुर जैसे शहर, IIT खड़गपुर उनकी विरासत हैं। उनके चेहरे पर कांग्रेस ने 14 साल राज किया।
- ज्योति बसु 23 साल से ज्यादा CM रहे। 1996 में मिला PM पद का ऑफर ठुकराया। लेफ्ट ने लगातार पांच चुनाव उन्हीं के चेहरे पर जीते।
- ममता बनर्जी यानी हवाई चप्पल, सूती साड़ी पहनने वाली आम आदमी से जुड़ी नेता। लोगों ने TMC नहीं, ‘दीदी’ को वोट दिया और 3 बार लगातार सरकार बनाई।
- सीनियर जर्नलिस्ट सुमन भट्टाचार्य कहते हैं, ‘बंगाल के लोग वफादार होते हैं। एक बार पसंद कर लिया तो लंबे समय तक जिताते हैं।’
- हालांकि अगले विधानसभा चुनाव तक ममता बनर्जी 76 साल की हो जाएंगी। तब तक उनका ‘पर्सनैलिटी कल्ट’ बेअसर हो सकता है।
4. वोटबैंक की सटीक चुनावी इंजीनियरिंग
- लेफ्ट ने बहुसंख्यक वर्ग को साधा और उनके लिए कई योजनाएं चलाईं। 1978 में 15 लाख बटाईदारों को 11 लाख एकड़ जमीन बांटी, जिनमें दलित, आदिवासी और मुस्लिम शामिल थे।
- ममता ने इससे आगे जाकर दो नए वोटबैंक बनाए- महिलाएं और मुस्लिम। कन्याश्री, रूपश्री, लक्ष्मीर भंडार, स्वास्थ्य साथी जैसी योजनाओं से महिला वोट बैंक पक्का किया।
- राज्य की 27% मुस्लिम आबादी के लिए 10 हजार मदरसों को मान्यता दी। TMC की सरकार में 39 महिला और 43 मुस्लिम विधायक थे।
- सुमन भट्टाचार्य कहते हैं कि बीजेपी ध्रुवीकरण और चुनावी इंजीनियरिंग में सफल हो गई है। बंगाल का ट्रेंड है कि अब बीजेपी अगले 15-20 साल तक जीतती रह सकती है।’








