‘कॉक्रोच जनता पार्टी’ का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन , खास प्रभाव छोड़ने में नाकाम………

अपनी आभासी दुनिया से निकलकर दो करोड़ फॉलोअर्स वाली ‘कॉक्रोच जनता पार्टी’ का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन खास प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहा। इससे वे क्रांतिकारी मित्र यकीनन निराश हुए होंगे, जिन्होंने सोशल मीडिया की जोशीली पंक्तियों से अपनी आंखों के सामने फ्रांसीसी राज्यक्रांति के पुनर्अवतरण के सपने पाल लिए थे। मैं यहां प्रदर्शनकारियों की नीयत […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
रविवार, 7 जून 2026, 07:59 AM 7 मिनट read
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‘कॉक्रोच जनता पार्टी’ का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन , खास प्रभाव छोड़ने में नाकाम………
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अपनी आभासी दुनिया से निकलकर दो करोड़ फॉलोअर्स वाली ‘कॉक्रोच जनता पार्टी’ का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन खास प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहा। इससे वे क्रांतिकारी मित्र यकीनन निराश हुए होंगे, जिन्होंने सोशल मीडिया की जोशीली पंक्तियों से अपनी आंखों के सामने फ्रांसीसी राज्यक्रांति के पुनर्अवतरण के सपने पाल लिए थे।

मैं यहां प्रदर्शनकारियों की नीयत पर सवाल नहीं उठा रहा और न यह कह रहा हूं कि जो लोग जंतर-मंतर पर इकट्ठा हुए, उनमें से सभी गलत थे। वे चाहते थे, उन्हें विरोध-प्रदर्शन का मौका मिले, सरकार ने उन्हें निराश नहीं किया। यहां हमें प्रदर्शनों और राजनीतिक अभियानों के अंतर को समझना होगा।

उदाहरण तो दर्जनों हैं, लेकिन अतीत के बियाबान में भटके बिना मैं आपको अन्ना आंदोलन के लम्हों में वापस ले जाना चाहता हूं। महाराष्ट्र के गांवों में कई सफल प्रतिरोधों के जनक अन्ना पहले से भारतीय जनमानस में विशिष्ट स्थान रखते थे। यही वजह है कि जब अरविंद केजरीवाल ने उनका दामन थामा, तो दोनों को एक-दूसरे का सहारा मिला। केजरीवाल सफल आयोजक और अन्ना घातक तौर पर प्रभावी साबित हुए थे।

अरविंद केजरीवाल तब तक अपनी एक छवि गढ़ चुके थे। उनके प्रति लोगों का आकर्षण इसलिए भी था, क्योंकि उन्होंने भारतीय राजस्व सेवा की चमकीली नौकरी छोड़कर आरटीआई एक्टिविस्ट और भ्रष्टाचार विरोधी मुहिमकर्ता के तौर पर जिंदगी गुजारने का निर्णय किया था। उनके साथ के अन्य कॉमरेड भी पढ़े-लिखे थे और उन्होंने भी अपने कमाऊ व्यवसाय को लात मार दी थी। यह तथ्य शुरुआती तौर पर आम जन के लिए ऐसा चुंबक साबित हुआ, जो लुभाने के साथ भरोसा पैदा करता था।

संसार का इतिहास गवाह है कि प्रतिरोध की पगध्वनियां तभी मुकाम तक पहुंचती हैं, जब उनको बुलंद करने वाले कोई न कोई त्याग करके आए हों। केजरीवाल और उनके ज्यादातर कॉमरेड यही लबादा ओढ़कर मैदान में उतरे थे।

यही वजह है कि अन्ना का आंदोलन मानीखेज साबित हुआ। मनमोहन सिंह भ्रष्टाचारी नहीं थे, लेकिन सबसे ज्यादा चोटिल वही हुए। उस समय जिन लोगों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, उनमें से तमाम बेदाग छूट चुके हैं, लेकिन माहौल ऐसा बन गया था कि अधिकांश भारतीयों को अपने सत्तानायकों से घिन आने लगी थी। समझदार लोग तब भी चेताते थे कि सत्ता से अत्यधिक प्रीत अथवा घृणा, दोनों लोकतंत्र के खिलाफ हैं।

सत्ताधारी कांग्रेस उस विराग से ऐसी बेदखल हुई कि आज तक उसके पैर लड़खड़ा रहे हैं। अरविंद केजरीवाल ने लोगों के मन में उपजे द्वैत को सटीक तौर पर पढ़ लिया था। यही वजह है कि लोहा गरम देख सन 2012 में उन्होंने आम आदमी पार्टी की घोषणा कर डाली। तब कुछ दिल्ली वालों ने इस पर फब्ती कसी थी कि यह तो कहते थे कि राजनीति में नहीं जाएंगे, हम नेता नहीं आंदोलनकारी हैं।

इससे सचेत अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी की राजनीति को ‘वैकल्पिक राजनीति’ का नाम दिया। उन्होंने दस साल दिल्ली की हुकूमत संभाली और पंजाब में उनकी पार्टी पांच साल पूरे करने जा रही है। अब कोई उनसे पूछता भी नहीं कि वैकल्पिक राजनीति के नारे का क्या हुआ? वह राजनीतिक विकल्प जरूर बन बैठे, लेकिन वैकल्पिक राजनीति पीछे छूट गई। विकल्प ढूंढ़ते-ढूंढ़ते वह खुद उन लोगों की कतार में जा बैठे, जिनके विरोध ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया था।

कॉक्रोच जनता पार्टी के पास तो आम आदमी पार्टी जैसा बौद्धिक विमर्श, सयानों की जमात और अन्ना जैसे आंदोलन की पृष्ठभूमि भी नहीं है। खुद अभिजीत दीपके कभी आम आदमी पार्टी के कॉमरेड हुआ करते थे। उन्होंने व्यंग्य और विरोध में जब कॉक्रोच जनता पार्टी का सोशल मीडिया पेज बनाया, तो उसे पहले दिन ही लाखों फॉलोअर्स मिल गए। यह संख्या देखते-देखते दो करोड़ तक जा पहुंची। इससे शायद उनके मन में भी यह उम्मीद जग गई कि वह अरविंद केजरीवाल-द्वितीय बन सकते हैं।

वह शायद यह आंकने में भूल कर बैठे थे कि उनमें और अरविंद केजरीवाल में बहुत बड़ा फर्क है। केजरीवाल की बौद्धिक क्षमता, राजनीतिक समझ और अपने विरोधियों के बीच पैठ बनाने की क्षमता अद्भुत है। अन्ना आंदोलन के दौरान उन्होंने भारतीय जनता युवा मोर्चा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों से सहयोग मांगने में भी संकोच नहीं किया था। भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कुछ तकलीफ के साथ मुझे बताया था कि वह उनके पास भीड़ जुटाने में मदद का आग्रह लेकर आते थे। उन्हें शिकायत थी कि मुख्यमंत्री बनते ही केजरीवाल ने सार्वजनिक तौर पर उनको पहचानने से इनकार कर दिया था।

कॉक्रोच जनता पार्टी और अभिजीत दीपके की एक और समस्या है। वह पर्चा लीक जैसे मुद्दे को लेकर आगे बढ़े। इस जरूरी मुद्दे पर उन्हें समर्थन तो मिलना ही था, लेकिन वह शायद यह नहीं आंक सके कि ये समर्थक मन से किसी अन्य पार्टी और नेता से भी जुड़े हुए हैं। उन्हें मुद्दे से मतलब है, सियासी विरोध से नहीं।

यही वजह है कि दो करोड़ फॉलोअर्स वाली कॉक्रोच जनता पार्टी के नेता बीस हजार लोग तक नहीं जुटा सके।

उनका यह सपना पूरा हो सकता था, अगर पुलिस हवाई अड्डे से ही उन्हें गिरफ्तार कर लेती। वह शायद इसीलिए संसद मार्ग थाने जाकर प्रदर्शन की अर्जी देना चाहते थे। हालांकि, सोशल मीडिया दिग्गज होने के नाते उन्हें यह तो मालूम होगा कि ऐसे अनुरोध ईमेल के जरिये कहीं से कभी भी किए जा सकते हैं, लेकिन थाने जाना नाटकीय प्रतिक्रिया की संरचना कर सकता था। सरकार ने हवाई अड्डे पर ही अनुमति-पत्र देकर इस संभावित आशंका की हवा निकाल दी।

कॉक्रोच जनता पार्टी की सदस्यता की पात्रताएं भी हंसाने वाली हैं, मसलन उसकी सदस्यता के लिए बेरोजगार होना अनिवार्य है। यह ठीक है कि देश में बेरोजगारी है, लेकिन वैसी बेबसियां भी नहीं हैं, जैसी बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका या डेढ़ दशक पहले कुछ अरब देशों में वक्ती तौर पर पसरी थीं। भारत में यूक्रेन जैसी स्थितियां भी नहीं हैं कि विदेश से संचालित होने वाला कोई सत्तानायक सोवियत संघ के पुराने कवच को नए रंग-रोगन के साथ धारण किए बैठा हो। वोलोदिमीर जेलेंस्की टेलीविजन पर एक हंसोड़ की भूमिका अदा किया करते थे, उनका काल्पनिक किरदार उस टेलीविजन सीरियल में राष्ट्रपति बन बैठा था। यूक्रेन ने उनके उस पात्र को जीवंत कर दिया था।

अब वही लोग सवाल उठा रहे हैं कि इससे हमें लाभ हुआ या हानि? रूस से छिड़ी लंबी लड़ाई ने वहां की अर्थव्यवस्था की जर्जर पोटली की रही-बची गांठें तक खोल दी हैं।

यहां सोनम वांगचुक की चर्चा करना जरूरी है। वह सम्मानित व्यक्ति हुआ करते हैं और उन्होंने कॉक्रोच जनता पार्टी के मंच से शिक्षा मंत्रालय के अलावा अन्य मंत्रालयों के कामकाज पर गौर करने की अपील की। तय है, वह मुद्दे को और बड़ा करना चाहते हैं। वह तो खासे पढ़े-लिखे हैं। वह भूल क्यों गए कि आंदोलनों व सियासत में चोली-दामन का रिश्ता जरूर है, पर हर आंदोलन असरकारी हो, यह जरूरी नहीं। लोग उन्हें समाज सुधारक की भूमिका में देखना चाहते हैं। बेहतर हो, खुद को वह वहीं तक सीमित रखें।

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