शिवसेना के इतिहास में बगावत का DNA!

शिवसेना उद्धव ठाकरे इन दिनों टूट की दहलीज पर खड़ी है. 9 में से 7 सांसद एकनाश शिंदे के गुट में जाने को तैयार हैं. ये पहली बार नहीं है जब पार्टी को इस परेशानी से दो चार होना पड़ रहा है. शिवसेना के इतिहास में बगावत का डीएनए ही कुछ ऐसा रहा है, लगभग […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
बुधवार, 17 जून 2026, 06:57 AM 4 मिनट read
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शिवसेना के इतिहास में बगावत का DNA!
Photo: UB India News Archive

शिवसेना उद्धव ठाकरे इन दिनों टूट की दहलीज पर खड़ी है. 9 में से 7 सांसद एकनाश शिंदे के गुट में जाने को तैयार हैं. ये पहली बार नहीं है जब पार्टी को इस परेशानी से दो चार होना पड़ रहा है. शिवसेना के इतिहास में बगावत का डीएनए ही कुछ ऐसा रहा है, लगभग हर दशक में पार्टी के भीतर टूट देखी जाती रही है. कोई एनसीपी में चला गया तो किसी ने पार्टी पर दावा कर इसे दो धड़ों में बांट दिया. समय-समय पर शिवसेना में टूट देखी जाती रही है. 1991 से 2022 तक शिवसेना के बगावती सफर कुछ ऐसा ही रहा है.

शिवसेना को पहला बड़ा झटका भुजबल की बगावत

शिवसेना के गठन के बाद से ही, यह पार्टी अपने आक्रामक हिंदुत्व और क्षेत्रीय अस्मिता के लिए जानी जाती रही है, लेकिन इसके साथ ही पार्टी के भीतर आंतरिक कलह और बड़े नेताओं का बाहर निकलना एक ऐतिहासिक सच्चाई रही है. 1991 से लेकर 2022 तक, शिवसेना को समय-समय पर बड़े झटकों का सामना करना पड़ा. 1991 में छगन भुजबल का बगावत करना शिवसेना के लिए पहला बड़ा झटका था, जिसने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को चुनौती दी.

छगन भुजबल (1991): शिवसेना के इतिहास में पहला बड़ा विद्रोह भुजबल ने किया. 17 विधायकों के साथ पार्टी छोड़कर वे शरद पवार गुट में शामिल हुए और बाद के सालों तक कांग्रेस-NCP सरकार में उपमुख्यमंत्री, गृहमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे.

नारायण राणे (2004): पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने उद्धव ठाकरे के साथ मतभेदों के चलते शिवसेना को अलविदा कहा. कांग्रेस, अपनी स्वाभिमान पार्टी और अंततः बीजेपी का सफर तय करते हुए, राणे आज कोंकण क्षेत्र में बीजेपी का मजबूत आधार हैं.

गणेश नाईक (1999): नवी मुंबई में वर्चस्व रखने वाले गणेश नाईक व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की वजह से शिवसेना छोड़कर NCP में चले गए. करीब दो दशक NCP में रहने के बाद, 2019 में वे बीजेपी में शामिल हो गए और आज भी नवी मुंबई की राजनीति में उनका दबदबा कायम है.

राज ठाकरे (2007): ठाकरे परिवार में आंतरिक मतभेद और उद्धव ठाकरे के बढ़ते कद से असंतुष्ट होकर राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़कर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना MNS का गठन किया. शुरुआती सफलताओं के बावजूद, पार्टी अपनी राजनीतिक पकड़ को बरकरार नहीं रख सकी और वर्तमान में शून्य पर है. राज ठाकरे का अलग होना एक वैचारिक और पारिवारिक विरासत के बंटवारे के रूप में देखा गया, जिससे शिवसेना की मूल ताकत दो हिस्सों में बंट गई.

एकनाथ शिंदे (2022) : 2022 में सिर्फ नेता नहीं बल्कि शिवसेना ही दो हिस्सों में टूट गई. 19 जून, 1966 को बनी शिवसेना को एकनाथ शिंदे ने 2022 में दो हिस्सों में तोड़ दिया. शिंदे के नेतृत्व में बहुमत विधायक और सांसद अलग हो गए. 2022 में एकनाथ शिंदे द्वारा किया गया विद्रोह इन सभी पूर्व घटनाओं से भिन्न और कहीं अधिक गहरा प्रभाव डालने वाला रहा।.यह केवल कुछ नेताओं का पार्टी से बाहर जाना नहीं था, बल्कि पार्टी के मूल जनाधार और विधानमंडल के एक बड़े हिस्से का पाला बदल लेना था, जिसने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना के अस्तित्व को ही वैधानिक और संगठनात्मक संकट में डाल दिया.

बगावत के चरम पर गुवाहाटी पहुंचने वाले शिंदे के विधायकों की संख्या 40 से 46 के बीच रही, शिंदे गुट ने BJP के साथ मिलकर सरकार बनाई और आधिकारिक शिवसेना का नाम और तीर-कमान चुनाव चिन्ह हासिल कर लिया. सांसदों का शिंदे गुट में शामिल होने का सिलसिला सरकार बनने के बाद अधिक तेज हुआ. उद्धव ठाकरे के गुट को शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) या शिवसेना यूबीटी कहा जाता है, जिसका चुनाव चिन्ह मशाल है. शिंदे ख़ुद को कानूनी रूप से असली शिवसेना बताते हैं.

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