जनसंख्या प्रोत्साहन नीति : भारत के सीमित संसाधनों के लिए राष्ट्रीय नीति आवश्यक है………………

हाल में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने राज्य की नई जनसंख्या प्रबंधन नीति के अंतर्गत तीसरे बच्चे के जन्म पर 30 हजार और चौथे बच्चे के जन्म पर 40 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा की है। प्रदेश में दूसरे बच्चे के जन्म पर पहले से ही 25 हजार रुपये […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शनिवार, 20 जून 2026, 07:48 AM 5 मिनट read
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जनसंख्या प्रोत्साहन नीति : भारत के सीमित संसाधनों के लिए राष्ट्रीय नीति आवश्यक है………………
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हाल में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने राज्य की नई जनसंख्या प्रबंधन नीति के अंतर्गत तीसरे बच्चे के जन्म पर 30 हजार और चौथे बच्चे के जन्म पर 40 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा की है। प्रदेश में दूसरे बच्चे के जन्म पर पहले से ही 25 हजार रुपये प्रोत्साहन स्वरूप दिए जाते हैं। ऐसे फैसलों के पीछे की वजह राज्य की गिरती ‘कुल प्रजनन दर’ और जनसांख्यिकीय असंतुलन की चुनौतियों से निपटना है, लेकिन वास्तविकता के धरातल पर देखें तो यह कदम लोकसभा में अपने राज्य का प्रतिनिधित्व घटने की आशंका और असुरक्षा की उपज है। संभव है कि जनसंख्या में संकुचन से जूझ रहे अन्य प्रदेश विशेषकर दक्षिणी राज्य भी आंध्र की यह राह पकड़ सकते हैं। ऐसा कोई प्रोत्साहन नितांत संकुचित सोच का ही परिणाम है, जिसमें राज्य के हित को राष्ट्र हित से ऊपर देखा जा रहा है। यह गिरती प्रजनन दर की सतही समझ और जनसांख्यिकीय असंतुलन के शार्टकट समाधान से अधिक कुछ नहीं है।

नायडू की गिनती प्रगतिशील नेताओं में होती है और अतीत में वे समेकित राष्ट्रीय जनसंख्या नीति बनाने के पैरोकार भी रहे हैं, लेकिन उनका यह निर्णय प्रतिगामी है। यह राष्ट्रीय हितों के बरक्स वोट बैंक की राजनीति और प्रभावी दबाव समूह बने रहने की चाह का प्रतिफलन है। नायडू का यह सोच उन वर्गों का हौसला ही बढ़ाएगा, जो अपनी संख्या से राजनीतिक वर्चस्व की चाह रखते हैं। अगर जनसंख्या में कमी को एक समस्या के रूप में देखा जा रहा है तो फिर उसके उचित समाधान तलाशने होंगे। इसकी एक वजह बड़ी संख्या में युवाओं का समय पर विवाह न करना है। अगर देरी से विवाह हो भी जाए तो वे एक ही संतान को पर्याप्त समझने लगे हैं।

आज के प्रतिस्पर्धा से भरे जीवन और संयुक्त परिवारों के घटते चलन में बच्चों के पालन-पोषण की चुनौतियां कहीं अधिक बढ़ गई हैं। ऐसे पहलुओं ने भी प्रजनन दर को प्रभावित किया है और एक हद तक इससे जनसांख्यिकीय असंतुलन की स्थिति भी निर्मित हो रही है। चूंकि भारत में प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र है तो घटती जनसंख्या वाले राज्यों को अपने राजनीतिक प्रभाव को लेकर भी चिंता सता रही है। यह आशंका सिर्फ राज्यों की ही नहीं है, बल्कि तमाम धार्मिक और जातीय समुदायों में भी फैल रही है। ऐसी चिंताओं के बावजूद जनसंख्या बढ़ाने संबंधी प्रोत्साहन उचित नहीं, क्योंकि भारत में संसाधन और सुविधाएं सीमित हैं। इन सीमित संसाधनों पर पहले ही भारी जनसंख्या का दबाव है।

जनसांख्यिकीय लाभांश की बात करें तो जनसंख्या और मानव संसाधन में अंतर होता है। कमाने वाले हाथों और आश्रितों के बीच सही संतुलन आवश्यक है। वर्तमान युग तो मशीन और तकनीक का है। इस कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अत्यधिक विकसित तकनीकी उपकरणों वाले युग में तो कमाने वाले हाथों को सोचने वाले मस्तिष्क ने काफी हद तक प्रतिस्थापित कर दिया है। जनसंख्या को मानव संसाधन बनाने के लिए आधारभूत ढांचे, साधन-संसाधन और सुविधाओं की आवश्यकता होती है। पौष्टिक आहार, पेयजल, समुचित स्वास्थ्य, स्तरीय शिक्षा और कौशल विकास की व्यवस्थाओं एवं सुविधाओं द्वारा ही जनसंख्या को मानव संसाधन बनाया जा सकता है। भारत जैसे विकासशील देश की तो बात ही क्या, किसी विकसित देश में भी ये संसाधन और सुविधाएं असीमित नहीं।

कृषि भूमि और उसकी उत्पादन क्षमता, अन्यान्य प्राकृतिक संसाधन और यहां तक कि शुद्ध जल और वायु भी असीमित नहीं हैं। साधन-सुविधाओं के अभाव और बढ़ते अपराध के अंतर्संबंध को भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। जनसंख्या वृद्धि, अशिक्षा, गरीबी, कुपोषण, पर्यावरण असंतुलन और प्राकृतिक क्षरण के दुष्चक्र से हम सब अनभिज्ञ भी नहीं हैं। तमाम सुविधाओं के अभाव और संसाधनों पर निरंतर बढ़ते दबाव ने न सिर्फ मानव-स्वभाव और चरित्र को विकृत किया है, बल्कि प्रकृति के स्वरूप को भी बदरंग और विध्वंसक बना डाला है। अत्यधिक दोहन और शोषण ने मनुष्य को प्रकृति का दुश्मन बना दिया है और यही कारण है कि नियमित अंतराल पर प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ी है। प्रख्यात अर्थशास्त्री माल्थस ने जनसंख्या नियंत्रण और प्राकृतिक आपदाओं के अंतर्संबंध की विस्तृत विवेचना की ही है।

भारत में जनसंख्या वृद्धि के लिए प्रोत्साहन में कोई समझदारी नहीं, क्योंकि जनसंख्या की दृष्टि से हमारा देश पहले ही चीन को पछाड़ कर पहले पायदान पर पहुंच गया है। भारत का जनसंख्या घनत्व भी चीन से लगभग तीन गुना अधिक है। इसलिए यह आवश्यक ही नहीं अनिवार्य हो गया है कि समस्त देशवासी इस विकराल बन चुकी समस्या के बारे में सोचें और उसके समाधान की दिशा में सक्रिय हों। भौगोलिक क्षेत्रफल और अन्य संसाधनों-सुविधाओं और जनसंख्या में आनुपातिक संतुलन स्थापित करके ही राज्य अपने नागरिकों को आवश्यक मूलभूत सुविधाएं प्रदान कर सकता है, जो कल्याणकारी राज्य का प्राथमिक कर्तव्य भी है। इन सुविधाओं से ही नागरिकों की गरिमा भी बहाल हो सकेगी। मानव जीवन का महत्व और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए समेकित राष्ट्रीय जनसंख्या नीति में ही इस समस्या का समाधान निहित है।

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