मजबूत लोकतंत्र के लिए कितनी जरूरी है कमजोर नौकरशाही………..

बिहार में भरत भूषण तिवारी के ‘आत्मसमर्पण’ के बाद भी पुलिस द्वारा की गई नृशंस ‘हत्या’ (जैसा कि सोशल मीडिया पर लोगों का आरोप है) से सबसे अधिक किसी संस्था का नुकसान हुआ है तो वह स्वयं पुलिस व्यवस्था का ही हुआ है. अब भविष्य में समर्पण करने से पूर्व आरोपी हो या अपराधी सौ […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
मंगलवार, 23 जून 2026, 10:46 AM 6 मिनट read
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मजबूत लोकतंत्र के लिए कितनी जरूरी है कमजोर नौकरशाही………..
Photo: UB India News Archive

बिहार में भरत भूषण तिवारी के ‘आत्मसमर्पण’ के बाद भी पुलिस द्वारा की गई नृशंस ‘हत्या’ (जैसा कि सोशल मीडिया पर लोगों का आरोप है) से सबसे अधिक किसी संस्था का नुकसान हुआ है तो वह स्वयं पुलिस व्यवस्था का ही हुआ है. अब भविष्य में समर्पण करने से पूर्व आरोपी हो या अपराधी सौ बार सोचेंगे, वे आत्मसमर्पण के बदले शायद ‘वास्तविक-एनकाउंटर’ को ही प्राथमिकता देना पसंद करेंगे. पुलिस तंत्र ने एक तरह से अपना विश्वास खोया है. हम नहीं जानते कि इस एनकाउंटर के पीछे एक सुनियोजित राजनीति थी या बस पुलिस तंत्र के ‘सामंती-अहंकार’ का परिणाम, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसने पुलिस तंत्र के घनघोर अमानवीय चरित्र को फिर से उजागर कर दिया है. यह समझना चाहिए कि इस तरह के ‘फर्जी’ एनकाउंटर महज एक आरोपी या अपराधी के अंत तक ही सीमित नहीं रहते, इसके परिणाम बेहद गंभीर और व्यापक होते हैं. यह एक साथ ही पुलिस तंत्र की साख, न्याय पालिका की सार्थकता और लोकतंत्र के औचित्य पर अनगिनत प्रश्न खड़े कर देती है.

पुलिस को कैसे देखती है जनता

पुलिस के प्रति आम जनता में क्या धारणा है, यह इस बात से समझा जा सकता है कि एक आम आदमी जो किसी भी अपराध का शिकार हुआ हो वह अकेले कभी पुलिस थाने नहीं जाना चाहता. वह अपने साथ कम से कम दो-चार प्रभावशाली व्यक्तियों को साथ लेकर ही जाना चाहता है. अकेले जाने पर उसे भय होता है कि वह पुलिस के अभद्र व्यवहार का शिकार हो सकता है या फिर उसकी शिकायत दर्ज नहीं की जाएगी. भारत के एक नागरिक का अकेले अपनी शिकायत लेकर थाने जाने से डरना इस तंत्र के शोषकीय और दमनकारी होने का एक बड़ा प्रमाण माना जाना चाहिए. पुलिस जनता की सेवा के लिए बनी है, लेकिन एक भारतीय नागरिक पुलिस के सामने नतमस्तक कर दिया जाता है. अनगिनत ऐसे विडियो उपलब्ध हैं. हम सबने अपने जीवन में ऐसा अनुभव भी किया होगा, जिसमें पुलिस वाला किसी सामान्य सी गलती के लिए एक जिम्मेदार नागरिक को भी अपमानित करने से नहीं डरता. कई बार ऐसा भी देखा गया है कि नागरिकों के साथ बुरा बर्ताव पुलिस वाले अपना अक्सर जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं. पुलिस कई बार जनप्रतिनिधियों को भी नहीं छोडती, जो लोकतंत्र के सबसे सम्मानित तंत्र के अंग होते हैं. आम आदमी उसे ‘सर-सर’ करता रह जाता है और वह अपने सामंती और औपनिवेशिक चरित्र के साथ तमाम भाषाई मर्यादाएं तोड़ता जाता है. आमतौर पर पुलिस कहीं से भी अपने व्यवहार में जनता का सेवक नहीं दिखाई देती है. ऐसे में एनकाउंटर जैसी कार्रवाई इसे और अराजक बना देती है.

एनकाउंटर को जिस तरह से सत्ता और समाज द्वारा प्रोत्साहित किया जा रहा है, वह अंततः न्यायपालिका के अस्तित्व को खारिज करने के समान है. लोकतंत्र में सबके अधिकार और कर्तव्य निर्धारित हैं. यह सब इसलिए है ताकि एक अराजक स्थिति उत्पन्न न हो और ‘रूल ऑफ लॉ’ की स्थापना की जा सके. लेकिन एनकाउंटर और वह भी ‘फर्जी’, अनिवार्य तौर पर न्याय पालिका की ही हत्या है. पुलिस वाला ही किसी को पकड़ रहा है, वही उसे अपराधी घोषित करवा रहा है और वही उसे सजा दे रहा है, वह भी जीवन मृत्यु की सजा! आरोपी के पास न तो अपना पक्ष रखने कोई अवसर है और न ही कोई वकील और न ही फैसला देने के लिए न्यायाधीश. ऐसे में फर्जी एनकाउंटरों पर न्यायपालिका को स्वतः ही संज्ञान लेना चाहिए. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसे मामले कम ही देखने को मिलते हैं.

लोकतंत्र में एनकाउंटर

सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि ऐसे फर्जी एनकाउंटर के मामले जब सामने आ जाते हैं तो यह संपूर्ण लोकतात्रिक व्यवस्था के प्रति आम जनता में एक अविश्वास का बीजारोपण करती है. ऐसे अध्ययन हैं और कानूनी विशेषज्ञों का मानना भी है कि अपवादों को छोड़कर अधिकांश एनकाउंटर पुलिस द्वारा की गई एकतरफा कार्रवाई होती है. लोकतंत्र जनता के हृदय से उपजता है, जब उसका हृदय लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए धड़कना बंद कर दें तो संस्थाओं को सचेत होने की जरूरत होती है. लोकतंत्र का ईश्वर केवल जनता है.

अगर पूछा जाए कि भारत की ऐसी कौन से संस्था है जिसमें क्रांतिकारी बदलाव की जरूरत है तो अनायास ही हम सबके मुंह से पुलिस तंत्र का ही नाम निकलेगा. इससे अमानवीय और सामंती अन्य कोई संस्था नहीं मानी जा सकती. दुनिया बदल गई है. हम जिस वैश्विक संसार में रह रहें हैं, उस अनुरूप हमारा पुलिस तंत्र कतई नहीं है. यह आज भी अपने औपनिवेशिक या मध्यकालीन स्वरूप में ही सिद्धांत और व्यवहार में काम कर रही है. दुनिया के बौद्धिक विमर्शों में वर्तमान नौकरशाही के विकल्प के रूप में बहुत सारे तंत्रों की वकालत की गई है. उसमें एक ‘एडहोक्रेसी’ का भी नाम आता है,  जिसे समाजशास्त्री एल्विन टोफ्लर ने व्यापक रूप से अपनी किताब ‘फ्यूचर शॉक’ में लिखा था. जब हमारी राजनीतिक-आर्थिक प्रणाली पूंजीवादी प्रतिमानों से प्रेरित हो ही गई है तो फिर हमें नौकरशाही को भी उसी अनुरूप बनाना और बदलना चाहिए. दूसरे शब्दों में कहें तो एक मजबूत लोकतंत्र के लिए नौकरशाही का कमजोर होना एक अनिवार्य जरूरत है. ‘एडहोक्रेसी’ एक तरह की परियोजना केंद्रित तात्कालिक-तंत्र है. इसमें शक्ति के अत्यधिक विकेंद्रीकरण की एक लचीली व्यवस्था होती है. इसमें नवाचार और अनुकूलन की अपार संभावनाए होती हैं. यह मूल तौर पर भारत में एक अप्रचलित विमर्श है. हमें लगता है वर्तमान पुलिस तंत्र के विकल्पों पर राजनेताओं, पत्रकारों, वकीलों, विचारकों और जनता को लगातार सोचना चाहिए, क्योंकि यह लोकतंत्र का शायद ऐसा खंभा है जिसकी साख और स्वरूप सबसे खराब है.

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