समस्या बढ़ाएगा कमजोर मानसून ,अल नीनो का असर पड़ेगा……………..

केद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बीते सप्ताह आशंका जताई कि मानसून में देरी के कारण खरीफ फसलों की बुवाई पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है, क्योंकि 315 जिलों में सामान्य से कम वर्षा होने के आसार हैं। कृषि मंत्री ने यह भी बताया कि देश के 111 जिलों को सबसे अधिक संवेदनशील के […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
सोमवार, 29 जून 2026, 06:57 AM 6 मिनट read
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समस्या बढ़ाएगा कमजोर मानसून ,अल नीनो का असर पड़ेगा……………..
Photo: UB India News Archive

केद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बीते सप्ताह आशंका जताई कि मानसून में देरी के कारण खरीफ फसलों की बुवाई पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है, क्योंकि 315 जिलों में सामान्य से कम वर्षा होने के आसार हैं। कृषि मंत्री ने यह भी बताया कि देश के 111 जिलों को सबसे अधिक संवेदनशील के रूप में चिह्नित किया गया है, क्योंकि वहां सिंचाई की सुविधा 25 प्रतिशत से भी कम है। उन्होंने कहा,‘मानसून में देरी हुई है। अब तक 43 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है।’ भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के पूर्वानुमान के अनुसार, 2 जुलाई को समाप्त होने वाले सप्ताह तक मानसून के कमजोर रहने का अनुमान है।

इस साल 14 जून तक मानसून में 28.4 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गई। यदि अगले महीने भी यह कमी बनी रहती है, तो खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो जाएगी। इससे उपज पर असर पड़ेगा। मौसम विभाग ने इसका कारण अल नीनो को बताया है और कहा है कि जून-सितंबर में दक्षिण-पश्चिमी मानसून के आगे बढ़ने के साथ इसके और मजबूत होने की आशंका है। हालांकि, एक सुखद संभावना यह है कि हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी) की सकारात्मक स्थिति, जिसमें पूर्वी हिंद महासागर की तुलना में पश्चिमी हिंद महासागर का पानी अधिक गर्म होता है, मानसून पर अल नीनो के कुछ प्रतिकूल प्रभावों को कम कर दे। अगर हालात में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया, तो इस बार देश में बारिश कम होगी।

अल नीनो वास्तव में भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में होने वाली गर्मी है, जो विश्व भर में मौसम के पैटर्न को प्रभावित करती है। भारत में यह कमजोर मानसून की आशंका को बढ़ाती है। 1951 से अब तक, 16 अल नीनो वर्षों में से 12 में सामान्य से कम या अपर्याप्त वर्षा हुई, जबकि छह या सात साल स्थिति ज्यादा खराब रही। वर्षा को सामान्य से कम तब माना जाता है, जब यह दीर्घकालिक औसत का 90-95 प्रतिशत हो और अपर्याप्त तब माना जाता है, जब यह उस मानक से 10 प्रतिशत से अधिक तक कम हो।

अल नीनो का असर 2027 की शुरुआत तक जारी रह सकता है, इससे अगले साल भी उच्च तापमान का खतरा बना रहेगा। भारत के कुछ हिस्सों में पीने के पानी की कमी हो सकती है, जिस तरह 2015-16 के अल नीनो के बाद हुई थी। अल नीनो आमतौर पर प्रशांत महासागर के ऊपर चलने वाली हवाओं को कमजोर करके भारतीय मानसून को दबा देता है। भारत ने 2015 के दौरान मजबूत अल नीनो प्रभाव का अनुभव किया। उस साल जून-अगस्त के तीन महीनों के दौरान 1.3 डिग्री सेल्सियस गर्मी दर्ज की गई, जो 26 जून 2026 को पार करके 1.34 डिग्री सेल्सियस हो चुकी है। नवंबर 2015 से जनवरी 2016 के दौरान अल नीनो वार्मिंग अपने सबसे ऊंचे स्तर 2.4 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गई थी, जिसके कारण 2015 के मानसून (जून-सितंबर) में 12.7 प्रतिशत की कमी आई। हालांकि, तब खाद्य उत्पादन में गिरावट न के बराबर रही। मौजूदा साल में मानसूनी बारिश में लगभग 10 प्रतिशत की कमी का अनुमान है, क्योंकि अक्तूबर-दिसंबर तक अल नीनो वार्मिंग 2.5-3.0 डिग्री तक पहुंच सकती है।

‘इंडियन ओशन डाइपोल’ (आईओडी) हिंद महासागर में मौसम को प्रभावित करने वाला एक अहम कारक है, जो हमारे मानसून की क्षमता पर काफी असर डालता है। लाभकारी आईओडी तब माना जाता है, जब पश्चिमी हिंद महासागर (अफ्रीका के पास) पूर्वी हिस्से (इंडोनेशिया के पास) की तुलना में अधिक गर्म हो जाता है। तापमान का यह अंतर पश्चिम में कम दबाव बनाता है, नमी वाली हवाओं को भारतीय उपमहाद्वीप की ओर खींचता है। 2015 के मानसून के दौरान प्रशांत महासागर में मजबूत अल-नीनो और पश्चिमी हिंद महासागर में अधिक आईओडी एक साथ देखे गए थे। भारत में वार्षिक वर्षा का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा चार महीने के मानसून में प्राप्त होता है। कमजोर मानसून कृषि के अलावा अन्य चीजों पर भी असर डालेगा।

कुल मिलाकर, मानसूनी बारिश पर बहुत कुछ निर्भर करता है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा हाल ही में जारी मासिक रिपोर्ट में कहा गया कि वैश्विक ऊर्जा कीमतों, आपूर्ति शृंखला में बाधाओं, सामान्य से कमजोर मानसून और अल नीनो के कारण खाद्य महंगाई पर दबाव बना रह सकता है। रिजर्व बैंक ने माना है कि महंगाई के बढ़ने के पीछे मुख्य वजह खाद्य पदार्थों, ईंधन के दाम में बढ़ोतरी रही है, क्योंकि आम जरूरत के सामान की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं।

वैसे, अल नीनो का असर भारत ही नहीं, पश्चिम पर भी पड़ रहा है। पूरा यूरोप हीट डोम के कारण भीषण गर्मी से झुलस रहा है। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली की सरकारों ने प्रचंड गर्मी को लेकर रेड अलर्ट जारी किए हैं। एक नए शोध के अनुसार, दुनिया के कई देश वर्ष 1970 के दशक की तुलना में दो महीने अधिक ‘हीट स्ट्रेस’ (गर्मी और उमस का भीषण असर) का सामना कर रहे हैं। शोधकर्ताओं ने इसके लिए जीवाश्म ईंधन और ग्लोबल वार्मिंग को मुख्य कारण बताया है। शोध के निष्कर्ष जलवायु परिवर्तन केंद्रित पत्रिका नेचर में प्रकाशित हुए हैं। इस अध्ययन के अनुसार, जो क्षेत्र पहले गर्म हवाओं से बचे रहते थे, वे भी अब इसे ज्यादा महसूस कर रहे हैं।

अनुमान है, साल 2026 में आईओडी का स्तर 1.3 डिग्री से ऊपर तक पहुंच जाएगा और 2026 की मानसूनी बारिश पर अल नीनो के प्रभाव को बेअसर कर देगा। हालांकि, इसका पता सितंबर तक ही चल पाएगा। बुवाई क्षेत्र में अब तक तो खास चिंता नहीं दिख रही है। एहतियात के तौर पर, कृषि मंत्रालय पहले से ही किसानों को खरीफ सीजन के लिए कम अवधि और नमी प्रतिरोधी फसल बोने की सलाह दे रहा है। उधर, आने वाले चार सप्ताह में मध्य, पूर्वी और दक्षिणी भारत में लगातार सक्रिय मानसून बारिश के लिए अनुकूल परिस्थितियां बना रहा है।

कुल मिलाकर, अब तक खरीफ क्षेत्र के लगभग 10 प्रतिशत हिस्से में बुवाई का काम हो चुका है। 22 जून तक सभी तरह की खरीफ फसलों का कुल रकबा 1.17 करोड़ हेक्टेयर रहा, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि के 1.13 करोड़ हेक्टेयर के मुकाबले अधिक है। वैसे भी, ज्यादा चिंता की बात नहीं है, भारत के पास चावल का पर्याप्त भंडार है और वह मुख्य खरीफ फसल में कमी को पूरा कर सकता है। हां, बारिश पर निर्भर दलहन और तिलहन के उत्पादन पर असर पड़ेगा।

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