पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में जिस तरह सेना और सरकार के खिलाफ हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे हैं और खुद को पाकिस्तान का हिस्सा मानने से भी इन्कार कर रहे हैं, उससे पीओके की वास्तविक स्थिति समझी जा सकती है। अब भले ही इस्लामाबाद इन घटनाओं को दबाने या उन्हें सीमित दायरे का असंतोष बताने का प्रयास करे, लेकिन यह तो स्पष्ट है कि वहां लोगों में राजनीतिक अधिकारों, आर्थिक विकास और सम्मानजनक जिंदगी की मांग पहले से कहीं अधिक मुखर होती जा रही है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, JAAC के प्रमुख नेता शौकत नवाज मीर को दो साथियों के साथ धीरकोट के सांगर फत्तारे इलाके से गिरफ्तार कर लिया गया। PoK में JAAC के 600 से ज्यादा नेता और कार्यकर्ताओं को भी हिरासत में लिया गया है। शौकत नवाज मीर समेत JAAC के नेताओं की गिरफ्तारी की सूचना देने वालों के लिए पाकिस्तान सरकार ने ₹1 करोड़ के इनाम की घोषणा की थी।
प्रदर्शनकारी बोले- हमें नहीं, पाकिस्तान को हमारी जरूरत
प्रदर्शन के दौरान JAAC नेता सरदार अमन खान ने कहा, ‘हमें आपके राशन की जरूरत नहीं, आपको हमारी जरूरत है। अगर जरूरी सामान की सप्लाई बंद रही तो लोग जिंदा रहने के लिए दूसरा रास्ता चुनने को मजबूर होंगे।’
उनका आरोप है कि पाकिस्तान सरकार आंदोलन को दबाने के लिए जानबूझकर जरूरी सामान की सप्लाई रोक रही है।
महंगाई से शुरू हुआ आंदोलन, अब राजनीतिक मुद्दा बना
रिपोर्ट के मुताबिक, आंदोलन महंगाई, खाद्य संकट, बढ़ती कीमतों और स्थानीय प्रशासन के मुद्दों को लेकर शुरू हुआ था। अब यह पाकिस्तान सरकार के खिलाफ राजनीतिक विरोध का रूप ले चुका है। हाल ही में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने रावलकोट और मीरपुर के लोगों को ‘असल कश्मीरी नहीं’ बताया था। इसके बाद विरोध और बढ़ गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, JAAC के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं पर आतंकवाद विरोधी कानून के तहत केस भी दर्ज किए गए हैं। सरकार ने 5 जून को JAAC पर आतंकवाद विरोधी कानून के तहत प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बाद से इलाके में तनाव लगातार बढ़ रहा है।
दरअसल, पीओके में असंतोष की यह आवाज अचानक पैदा नहीं हुई है, बल्कि वर्षों की आर्थिक बदहाली, प्रशासनिक उपेक्षा और राजनीतिक अधिकारों के अभावों की ही परिणति है। इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान ने कभी भी पीओके को सांविधानिक रूप से अपने मुख्य भू-भाग का दर्जा नहीं दिया। यह विडंबना ही है कि दशकों से पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर में मानवाधिकारों की दुहाई देता रहा है, लेकिन जब उसके अपने कब्जे वाले क्षेत्र के लोगों की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, उद्योग या बिजली जैसी बुनियादी जरूरतों की बात आती है, तो इस्लामाबाद की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं।
ऐसे में, अगर राजनीतिक उपेक्षा की भावना भी जुड़ जाए, तो असंतोष का व्यापक आंदोलन में बदलना स्वाभाविक ही है। पीओके का वर्तमान आंदोलन इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में यहां महंगाई, बिजली संकट, बेरोजगारी, करों में वृद्धि और आटे की कीमतों को लेकर लोग आक्रोशित होते रहे हैं, जिनका पाकिस्तानी हुकूमत ने क्रूरता से दमन कर दिया था। दरअसल, पाकिस्तान विदेशी कर्ज के बोझ तले बुरी तरह दबा हुआ है और संसाधन बहुल पीओके में उसे अपने आर्थिक संकटों का समाधान दिख रहा है।
भारत में जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में जिस तरह से विकास हो रहा है, वह भी पीओके के लोगों से छिपा नहीं है, अलबत्ता यह पाकिस्तानी हुकूमत से उनकी असंतुष्टि को बढ़ा ही रहा है। ताजा आंदोलन में पीओके के लोग जिस तरह से भारत से जुड़ने की इच्छा जता रहे हैं, उसके पीछे भी पाकिस्तानी शासन के प्रति उनकी गहरी निराशा ही है। बलूचिस्तान हो, खैबर पख्तूनख्वा हो या पीओके, पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या यही रही है कि वह अपने भीतर उठ रही हर असहमति को बाहरी साजिश बताता आया है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वह दूसरे देशों को मानवाधिकारों के उपदेश देता है। भारत को इस स्थिति का रणनीतिक उपयोग करते हुए कूटनीतिक स्तर पर इस्लामाबाद पर दबाव बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। अब समय आ गया है कि दुनिया पीओके की सच्चाई पर नजर डाले।








