जब सत्ता के दो मंत्री आमने-सामने हों, तो सवाल केवल भरत तिवारी का नहीं, व्यवस्था की विश्वसनीयता का भी है………………

बिहार के भोजपुर में भरत तिवारी एनकाउंटर का मामला अब केवल एक पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है। यह घटना कानून-व्यवस्था, पुलिस की जवाबदेही, मानवाधिकार और राजनीति के उस चौराहे पर खड़ी है, जहाँ हर बयान जनता के मन में नए प्रश्न पैदा कर रहा है। सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शुक्रवार, 3 जुलाई 2026, 11:37 AM 6 मिनट read
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जब सत्ता के दो मंत्री आमने-सामने हों, तो सवाल केवल भरत तिवारी का नहीं, व्यवस्था की विश्वसनीयता का भी है………………
Photo: UB India News Archive

बिहार के भोजपुर में भरत तिवारी एनकाउंटर का मामला अब केवल एक पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है। यह घटना कानून-व्यवस्था, पुलिस की जवाबदेही, मानवाधिकार और राजनीति के उस चौराहे पर खड़ी है, जहाँ हर बयान जनता के मन में नए प्रश्न पैदा कर रहा है। सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि भरत तिवारी दोषी था या निर्दोष। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि एक ही केंद्र सरकार के दो मंत्री इस घटना पर बिल्कुल अलग-अलग राय रखते हैं, तो आखिर जनता किस पर भरोसा करे?

एक ओर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी पुलिस की कार्रवाई को उचित बताते हैं। उनका कहना है कि पुलिस ने आत्मरक्षा में कार्रवाई की और परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि बल प्रयोग आवश्यक था। दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान पीड़ित परिवार से मिलते हैं, निष्पक्ष जांच की मांग करते हैं और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की बात कहते हैं। दोनों नेता राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का हिस्सा हैं। दोनों केंद्र सरकार में मंत्री हैं। लेकिन दोनों के बयान दो अलग-अलग सच्चाइयों की तरह सामने आते हैं।

लोकतंत्र में मतभेद कोई असामान्य बात नहीं है। विचारों की विविधता लोकतांत्रिक व्यवस्था की ताकत है। लेकिन जब मामला किसी कथित पुलिस एनकाउंटर का हो, जहाँ किसी नागरिक की जान गई हो, तब सरकार के भीतर ही दो परस्पर विरोधी संदेश जनता के विश्वास को कमजोर करते हैं। यदि पुलिस की कार्रवाई पूरी तरह सही थी, तो फिर जांच की मांग क्यों उठ रही है? और यदि जांच आवश्यक है, तो बिना जांच के कार्रवाई को पूरी तरह सही कैसे ठहराया जा सकता है?

यह वही प्रश्न है जो आज बिहार ही नहीं, पूरे देश का नागरिक पूछ रहा है।

भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार न्याय का अधिकार देता है। अपराध कितना भी बड़ा क्यों न हो, अंतिम निर्णय अदालत का होता है, सड़क या बंदूक का नहीं। यदि कोई अपराधी है, तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि कहीं पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठते हैं, तो उन सवालों का उत्तर भी निष्पक्ष जांच से ही मिलना चाहिए। यही कानून के राज की मूल भावना है।

दुर्भाग्य यह है कि हमारे देश में हर बड़ी घटना कुछ ही घंटों में राजनीतिक बहस का विषय बन जाती है। कोई पुलिस के समर्थन में खड़ा हो जाता है, तो कोई पीड़ित परिवार के साथ। लेकिन सबसे पीछे छूट जाती है सत्य की खोज। लोकतंत्र में न तो पुलिस को बिना जांच के दोषी ठहराया जा सकता है और न ही उसे बिना जांच के पूरी तरह निर्दोष घोषित किया जा सकता है।

भरत तिवारी प्रकरण में भी यही सावधानी अपेक्षित है।

इस पूरे विवाद ने एक और गंभीर प्रश्न खड़ा किया है। यदि केंद्र सरकार के दो मंत्री सार्वजनिक रूप से अलग-अलग संदेश देंगे, तो इसका प्रभाव प्रशासनिक व्यवस्था पर भी पड़ेगा। पुलिस बल को कौन-सा संदेश मिलेगा? पीड़ित परिवार किस पर भरोसा करेगा? और आम नागरिक किसे सरकार का आधिकारिक पक्ष मानेगा? लोकतंत्र में सरकार की विश्वसनीयता उसकी एकरूपता और पारदर्शिता से बनती है। विरोधाभासी संदेश भ्रम पैदा करते हैं और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को बढ़ावा देते हैं।

यह भी सच है कि बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। ऐसे समय में हर संवेदनशील घटना का राजनीतिक प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। विभिन्न दल अपने-अपने सामाजिक आधार और राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखकर प्रतिक्रिया देते हैं। लेकिन राजनीति का उद्देश्य न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करना नहीं होना चाहिए। यदि किसी घटना की निष्पक्ष जांच आवश्यक है, तो उसे चुनावी लाभ-हानि से ऊपर रखा जाना चाहिए।

आज देश का नागरिक केवल इतना चाहता है कि यदि पुलिस सही है तो उसके पक्ष में ठोस साक्ष्य सामने आएँ, और यदि कहीं प्रक्रिया में चूक हुई है तो दोषियों पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो। यही न्याय है, यही लोकतंत्र है और यही संविधान की आत्मा है।

इस घटना ने पुलिस सुधारों की आवश्यकता पर भी एक बार फिर बहस छेड़ दी है। देश में हर विवादित एनकाउंटर के बाद यही सवाल उठते हैं—क्या बॉडी कैमरे अनिवार्य होने चाहिए? क्या हर पुलिस मुठभेड़ की स्वतः स्वतंत्र जांच होनी चाहिए? क्या फोरेंसिक और डिजिटल साक्ष्यों को सार्वजनिक निगरानी में लाया जाना चाहिए? यदि इन प्रश्नों पर गंभीरता से काम किया जाए, तो भविष्य में ऐसे विवाद कम हो सकते हैं।

सरकार को भी समझना होगा कि जनता केवल बयान नहीं, भरोसा चाहती है। भरोसा तभी बनेगा जब जांच निष्पक्ष होगी, रिपोर्ट समय पर आएगी और यदि किसी स्तर पर गलती हुई है तो कार्रवाई बिना किसी राजनीतिक दबाव के होगी। कानून का शासन केवल अपराधियों पर कठोर होने से स्थापित नहीं होता, बल्कि कानून लागू करने वाली संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करने से भी स्थापित होता है।

भरत तिवारी मामले का अंतिम सच क्या है, यह जांच बताएगी। लेकिन एक बात अभी से स्पष्ट है कि इस प्रकरण ने सरकार, पुलिस और राजनीति—तीनों की परीक्षा शुरू कर दी है। जनता की अदालत में केवल बयान नहीं चलते, वहाँ प्रमाण, पारदर्शिता और न्याय की कसौटी पर ही विश्वास टिकता है।

इसलिए आज आवश्यकता किसी राजनीतिक विजय की नहीं, बल्कि न्याय की है। यदि सरकार वास्तव में कानून के शासन में विश्वास करती है, तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि जांच निष्पक्ष हो, हर तथ्य सामने आए और जो भी दोषी हो—चाहे वह अपराधी हो या वर्दी में बैठा कोई अधिकारी—उसे कानून के अनुसार जवाबदेह बनाया जाए।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा पद मंत्री का नहीं, संविधान का होता है; और सबसे बड़ी शक्ति सत्ता की नहीं, न्याय की होती है।

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