क्या हिंदू धर्म के वैभव प्रदर्शन से धर्म प्रचार का उद्देश्य पूरा हो जाता है?

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की घटना हिंदू समाज को आहत और साथ ही इस मंदिर के ट्रस्ट के प्रति लोगों के भरोसे को चोट पहुंचाने वाली है। फिलहाल यह कहना कठिन है कि कितनी राशि की चोरी की गई और वह कब से जारी थी, लेकिन यह शर्मनाक है कि दान राशि […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
रविवार, 5 जुलाई 2026, 08:12 AM 6 मिनट read
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क्या हिंदू धर्म के वैभव प्रदर्शन से धर्म प्रचार का उद्देश्य पूरा हो जाता है?
Photo: UB India News Archive

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की घटना हिंदू समाज को आहत और साथ ही इस मंदिर के ट्रस्ट के प्रति लोगों के भरोसे को चोट पहुंचाने वाली है। फिलहाल यह कहना कठिन है कि कितनी राशि की चोरी की गई और वह कब से जारी थी, लेकिन यह शर्मनाक है कि दान राशि उन्हीं लोगों ने हड़पी, जिन पर उसकी देख-रेख की जिम्मेदारी थी।

अभी तक इस मामले में आठ लोगों को गिरफ्तार कर विशेष जांच दल यानी एसआइटी की ओर से पूछताछ जारी है। मामले की गंभीरता और व्यापकता को देखते हुए एसआइटी की समय सीमा बढ़ा दी गई है। देखना है कि वह तय समय में अपनी जांच पूरी कर पाती है या नहीं?

चूंकि राम मंदिर सदियों की प्रतीक्षा और संघर्ष के बाद बना, इसलिए उसके उद्घाटन के बाद से ही देश-विदेश के लोग अयोध्या आ रहे थे और हर महीने करोड़ों की दान राशि आ रही थी। इस दान राशि के उपयोग का अधिकार ट्रस्ट के पास है। दान राशि के उपयोग में सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं और वह होना भी नहीं चाहिए, लेकिन यह तो सुनिश्चित होना ही चाहिए कि ट्रस्ट उसका उपयोग सही तरह से करे।

जैसे राम मंदिर के लिए एक ट्रस्ट बना है, वैसे ही अन्य प्रमुख मंदिरों के लिए भी है। कुछ मंदिरों में भक्त करोड़ों का दान देते हैं। जहां कुछ मंदिरों के ट्रस्ट में सरकारी अधिकारी भी शामिल होते हैं, वहीं कुछ पूरी तौर पर सरकार की ओर से संचालित होते हैं। ऐसे मंदिरों को मिलने वाले चढ़ावे की राशि का उपयोग सरकारें अपने हिसाब से करती हैं।

इसे लेकर कई बार सवाल उठ चुके हैं कि क्या मंदिरों का चढ़ावा हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार और हिंदू समाज के कल्याण के लिए ही होता है? ऐसे सवाल इसलिए उठते रहे हैं, क्योंकि कई मंदिरों की दान राशि का इस्तेमाल हिंदू धर्म के कल्याण से इतर कार्यों में भी किए जाने की खबरें आती रही हैं।

आम तौर पर जो छोटे मंदिर हैं, उनके चढ़ावे की राशि तो पुजारियों, सेवादारों के गुजारे के साथ मंदिर के रखरखाव, भंडारे आदि के आयोजन में ही खर्च हो जाती है। क्या इस सबसे हिंदू धर्म के प्रचार के उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है? कुछ बड़े मंदिरों के ट्रस्ट शिक्षा संस्थान, अस्पताल, धर्मशालाएं आदि चलाते हैं, लेकिन इसका सटीक आंकड़ा शायद ही किसी के पास हो कि देश के प्रमुख मंदिरों को प्रति वर्ष कितना चढ़ावा मिलता है और उसका उपयोग किन-किन कार्यों में किया जाता है?

इसका कारण यह है कि इसकी कोई सुनिश्चित व्यवस्था नहीं कि चढ़ावे की राशि किन कार्यों में खर्च की जाएगी और किनमें नहीं? निःसंदेह मंदिरों को मिलने वाली चढ़ावे की राशि हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार और कल्याण में ही खर्च होनी चाहिए, लेकिन यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि आखिर हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार का काम प्रभावी तरीके से किस प्रकार किया जाए? क्या संस्कृत विद्यालयों अथवा गुरुकुलों का संचालन करने मात्र से हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार का उद्देश्य पूरा हो जाता है?

क्या हिंदू धर्म के वैभव प्रदर्शन से धर्म प्रचार का उद्देश्य पूरा हो जाता है? प्रश्न यह भी है कि क्या हिंदू धर्म का प्रचार केवल हिंदुओं के बीच होना चाहिए? विडंबना यह है कि इसे लेकर हिंदू धर्माचार्यों और मंदिर ट्रस्ट का संचालन करने वालों में कोई सहमति नहीं है।

हिंदू धर्म की विशेषता यह है कि यह किसी एक ग्रंथ या देव के दर्शन पर आधारित नहीं है। हिंदुओं को इसकी स्वतंत्रता है कि वे अपनी इच्छानुसार किसी इष्ट की पूजा-अर्चना करें। हिंदू धर्म के अनुयायियों के रीति-रिवाज भी अलग-अलग हैं और वे सब अपनी आस्था के अनुसार उनका पालन करने के लिए स्वतंत्र हैं। कोई कर्मकांडों को महत्व देता है तो कोई उनकी आवश्यकता नहीं समझता। हिंदू धर्म की विशेषताएं ही उसे अन्य धर्मों-पंथों से अलग करती हैं, लेकिन संभवतः इसी कारण इसकी कोई रूपरेखा भी नहीं बन सकी है कि आखिर हिंदू धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार कैसे हो?

इसके विपरीत सनातन की शाखा समझे जाने वाले बौद्ध मत का प्रचार-प्रसार सुनियोजित तरीके से किया गया। इसका परिणाम यह है कि आज अनेक देशों में बौद्ध मत के अनुयायी हैं, लेकिन समय के साथ बौद्ध पंथ को हिंदू धर्म से अलग देखा जाने लगा। जैन और सिख पंथ भी सनातन की ही शाखा हैं। सभी अपने-अपने अनुसार अपने मत का प्रचार करते हैं, लेकिन यह किसी से छिपा नहीं कि ईसाइयत और इस्लाम का प्रचार करने वाले कहीं अधिक संगठित हैं और सुनियोजित हैं। इसीलिए उनसे जुड़े संगठनों पर मतांतरण के आरोप लगते रहते हैं।

मंदिरों की समस्या यह है कि जहां कई बड़े मंदिरों के संचालन में सरकारी हस्तक्षेप रहता है, वहीं अन्य पंथों के अनुयायी अपने धार्मिक स्थलों का संचालन अपने हिसाब से करते हैं और उसमें सरकार का कोई दखल नहीं रहता। यह एक विसंगति है। हिंदू संगठन लगातार यह मांग करते चले आ रहे हैं कि मंदिरों का संचालन हिंदू समाज को सौंपा जाए, लेकिन इस मांग पर बल देने के साथ ही यह भी आवश्यक है कि मंदिरों के संचालन की कोई ठोस संहिता बने।

यह भी तय हो कि मंदिरों को मिलने वाली चढ़ावे की राशि का उपयोग किस तरह होगा? इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि देश में कई ऐसे मंदिर हैं, जिनमें अच्छा-खासा चढ़ावा आता है, लेकिन यह पता नहीं चलता कि उनका खर्च किन कार्यों में किया जाता है? ट्रस्ट संचालित मंदिर भी चढ़ावे की राशि का उपयोग अपने हिसाब से करते हैं। जब भी कोई भक्त मंदिर जाता है तो चढ़ावा देते समय उसके दिमाग में यह नहीं रहता कि उसका क्या उपयोग होगा?

समय आ गया है कि इसकी कोई ठोस रूपरेखा बने कि मंदिरों के पुजारी या ट्रस्टी चढ़ावे की राशि का उपयोग हिंदू धर्म का समुचित ढंग से प्रचार करने और हिंदू समाज के कल्याण में ही खर्च करें। जब तक ऐसा नहीं होगा, चढ़ावे के उपयोग को लेकर सवाल उठते रहेंगे।

जितना आवश्यक यह है कि राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की घटना की सही तरह जांच हो, उतना ही यह भी आवश्यक है कि ऐसी व्यवस्था बने, जिससे मंदिरों के दान की राशि में किसी तरह की हेराफेरी न हो सके। इस व्यवस्था के निर्माण के लिए धर्माचार्यों और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों को आगे आना होगा।

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