महज 5 दिन में ही क्यों अंतर्ध्यान हो गए बाबा बर्फानी , जम्मू से अब तक का सबसे बड़ा जत्था 9837 श्रद्धालुओं का जत्था हुआ रवाना …………

वार्षिक अमरनाथ यात्रा ने बुधवार को नया कीर्तिमान रच दिया। भगवती नगर यात्री निवास जम्मू से एक ही दिन में रिकॉर्ड 9,837 श्रद्धालुओं का जत्था पवित्र गुफा के दर्शन के लिए रवाना हुआ। यह इस साल की अब तक की सबसे बड़ी एकल-दिवसीय रवानगी है। अधिकारियों ने बताया कि सातवां जत्था कुल 361 वाहनों के […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
बुधवार, 8 जुलाई 2026, 07:31 AM 9 मिनट read
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महज 5 दिन में ही क्यों अंतर्ध्यान हो गए बाबा बर्फानी , जम्मू से अब तक का सबसे बड़ा जत्था 9837 श्रद्धालुओं का जत्था हुआ रवाना …………
Photo: UB India News Archive

वार्षिक अमरनाथ यात्रा ने बुधवार को नया कीर्तिमान रच दिया। भगवती नगर यात्री निवास जम्मू से एक ही दिन में रिकॉर्ड 9,837 श्रद्धालुओं का जत्था पवित्र गुफा के दर्शन के लिए रवाना हुआ। यह इस साल की अब तक की सबसे बड़ी एकल-दिवसीय रवानगी है। अधिकारियों ने बताया कि सातवां जत्था कुल 361 वाहनों के काफिले में रवाना हुआ। इसमें से 5,337 श्रद्धालु 188 वाहनों से पारंपरिक पहलगाम मार्ग के लिए, जबकि 4,500 श्रद्धालु 173 वाहनों से छोटे बालटाल मार्ग के लिए निकले।भोर से ही भगवती नगर यात्री निवास में भारी भीड़ देखी गई। देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालु बाबा बर्फानी के जयकारे लगाते हुए आधार शिविरों की ओर बढ़े। इस रिकॉर्ड जत्थे में आस्था का हर रंग दिखा। कुल 9,837 श्रद्धालुओं में 6684 पुरुष, 2730 महिलाएं, 21 बच्चे, 320 साधु, 80 साध्वियां, 2 किन्नर श्रद्धालु शामिल रहे।

अमरनाथ यात्रा करोड़ों शिवभक्तों की आस्था का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है. हर साल श्रद्धालु बर्फ से प्राकृतिक रूप से बनने वाले बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए हजारों फीट की कठिन चढ़ाई तय करते हैं. लेकिन इस बार यात्रा शुरू होने के महज कुछ दिनों के भीतर ही बाबा बर्फानी के लगभग अंतर्ध्यान होने की खबर ने भक्तों को मायूस कर दिया है. सवाल यह उठ रहा है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया कि जो प्राकृतिक हिमलिंग पहले पूरे सावन तक बना रहता था वह अब यात्रा शुरू होने के एक सप्ताह के भीतर ही पिघलने लगा है. क्या इसके पीछे केवल मौसम जिम्मेदार है, या फिर हिमालय का बदलता पर्यावरण, बढ़ती गर्मी और इंसानी गतिविधियां भी इस पवित्र स्थल के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित कर रही हैं? वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल धार्मिक नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन का भी गंभीर संकेत है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
3 जुलाई से शुरू हुई अमरनाथ यात्रा में श्रद्धालुओं का उत्साह पहले की तरह ही देखने को मिल रहा है. चार दिनों के भीतर 85 हजार से ज्यादा श्रद्धालु बाबा अमरनाथ की गुफा तक पहुंच चुके हैं. हालांकि, इस बार गुफा के अंदर प्राकृतिक बर्फ का शिवलिंग तेजी से पिघल गया है, इससे बाद में पहुंचने वाले अधिकांश श्रद्धालुओं को पहले जैसी विशाल हिमलिंग के दर्शन नहीं हो पा रहे हैं. 23 मई को करीब 7 फीट ऊंचा दिखने वाला हिमलिंग 29 जून को भी पांच फीट से अधिक था, लेकिन 6 जुलाई तक उसका अधिकांश हिस्सा पिघल चुका था. यही वजह है कि इस बार आस्था के साथ-साथ इसके पीछे छिपे वैज्ञानिक कारणों पर भी चर्चा तेज हो गई है.

क्या कहता है विज्ञान, क्यों तेजी से पिघल रहा है बाबा बर्फानी?

  • प्राकृतिक हिमलिंग किसी मूर्ति की तरह बनाया नहीं जाता, बल्कि यह पूरी तरह एक प्राकृतिक प्रक्रिया का परिणाम होता है. अमरनाथ गुफा की छत से लगातार टपकने वाली पानी की बूंदें अत्यधिक कम तापमान में जमकर नीचे बर्फ का स्तंभ यानी स्टैलेग्माइट (Stalagmite) बनाती हैं. यही बर्फ का स्तंभ श्रद्धालुओं के लिए बाबा बर्फानी के रूप में पूजनीय है. इसका आकार हर साल मौसम, बर्फबारी, तापमान और गुफा के भीतर मौजूद प्राकृतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है. यदि तापमान सामान्य से अधिक रहता है या बर्फबारी कम होती है, तो हिमलिंग जल्दी पिघलने लगता है.
  • पिछले कुछ सालों में जम्मू-कश्मीर और पूरे हिमालयी क्षेत्र में मौसम का पैटर्न तेजी से बदला है. सर्दियों में अपेक्षाकृत कम बर्फबारी और गर्मियों में सामान्य से अधिक तापमान दर्ज किया जा रहा है. मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यही कारण है कि गुफा के भीतर बर्फ लंबे समय तक टिक नहीं पा रही है. पहले जहां हिमलिंग अगस्त तक सुरक्षित रहता था, वहीं अब यात्रा शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद उसका आकार तेजी से घटने लगता है. यह बदलाव केवल अमरनाथ तक सीमित नहीं है, बल्कि हिमालय के ग्लेशियरों और बर्फीले क्षेत्रों में भी इसी तरह की प्रवृत्ति देखी जा रही है.
  • अमरनाथ यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु गुफा तक पहुंचते हैं. श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने से गुफा के भीतर मानव शरीर से निकलने वाली गर्मी, रोशनी की व्यवस्था, आसपास की गतिविधियां और लगातार आवाजाही का असर भी प्राकृतिक तापमान पर पड़ता है. पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक भीड़ और पर्यटन संबंधी गतिविधियां गुफा के नाजुक इकोसिस्टम पर अतिरिक्त दबाव डालती हैं. हेलीकॉप्टर सेवाएं, सड़क निर्माण, खच्चरों की आवाजाही और अन्य व्यवस्थाएं भी आसपास के पर्यावरण को प्रभावित करती हैं. हालांकि, विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल भीड़ को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि ग्लोबल वार्मिंग और बदलते मौसम की भूमिका इससे कहीं अधिक बड़ी मानी जा रही है.

ग्लोबल वार्मिंग का कितना बड़ा असर पड़ रहा है?

क्या श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या भी बन रही है वजह?

विशेषज्ञों के अनुसार अमरनाथ यात्रा में हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं. गुफा के भीतर बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी से तापमान पर हल्का असर पड़ सकता है. इसके अलावा बिजली की व्यवस्था, रोशनी, जनरेटर, हेलीकॉप्टर सेवाएं, सड़क निर्माण और अन्य सुविधाओं का भी आसपास के पर्यावरण पर प्रभाव पड़ता है. हालांकि वैज्ञानिक मानते हैं कि इन सभी कारणों की तुलना में जलवायु परिवर्तन कहीं अधिक गंभीर कारक है. फिर भी पर्यावरणविद लगातार सुझाव दे रहे हैं कि यात्रा प्रबंधन ऐसा हो जिससे श्रद्धालुओं की आस्था भी बनी रहे और गुफा के प्राकृतिक इकोसिस्टम पर अनावश्यक दबाव भी न पड़े.

पिछले तीन साल से क्यों दोहराई जा रही है यही तस्वीर?

अमरनाथ श्राइन बोर्ड और स्थानीय जानकारों के अनुसार, पहले बाबा बर्फानी का हिमलिंग सावन के अधिकांश समय तक सुरक्षित रहता था. लेकिन अब लगातार तीन साल से यात्रा शुरू होने के एक सप्ताह के भीतर ही इसका आकार तेजी से घट जाता है. 2026 में भी यही स्थिति देखने को मिली. 23 मई को बीएसएफ द्वारा जारी तस्वीरों में हिमलिंग लगभग सात फीट ऊंचा दिखाई दिया था. 29 जून को प्रथम पूजा के समय भी इसकी ऊंचाई पांच फीट से अधिक थी. लेकिन 6 जुलाई तक सामने आई तस्वीरों में हिमलिंग का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा पिघल चुका था. इससे यह साफ संकेत मिलता है कि मौसम में हो रहे बदलाव अब इस पवित्र स्थल को भी प्रभावित कर रहे हैं.

श्रद्धालुओं का उत्साह फिर भी नहीं हुआ कम

हिमलिंग के जल्दी पिघलने के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था में कोई कमी नहीं आई है. यात्रा शुरू होने के केवल चार दिनों के भीतर 85,779 से अधिक श्रद्धालु बाबा अमरनाथ के दर्शन कर चुके हैं. सोमवार को अकेले 28,818 श्रद्धालु गुफा तक पहुंचे. खराब मौसम और लगातार बारिश के बावजूद श्रद्धालु बालटाल और पहलगाम दोनों मार्गों से 3,880 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पवित्र गुफा तक पहुंचे. प्रशासन का कहना है कि यात्रा पूरी तरह सुरक्षित ढंग से संचालित की जा रही है और श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है. इस वर्ष यात्रा 28 अगस्त यानी रक्षाबंधन तक चलेगी.
पर्यावरण संरक्षण और आस्था के बीच संतुलन जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि अमरनाथ गुफा केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि हिमालय के बेहद संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा भी है. इसलिए भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन, पर्यावरण संरक्षण और यात्रा प्रबंधन के बीच संतुलन बनाना जरूरी होगा. यदि ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार इसी तरह बढ़ती रही और हिमालयी क्षेत्रों में तापमान लगातार ऊपर जाता रहा, तो केवल बाबा बर्फानी ही नहीं, बल्कि पूरे हिमालय के ग्लेशियरों पर भी गंभीर संकट खड़ा हो सकता है. यही वजह है कि पर्यावरण विशेषज्ञ इसे केवल धार्मिक विषय नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन की गंभीर चेतावनी के रूप में भी देख रहे हैं.
क्या बाबा बर्फानी का हिमलिंग हर साल एक जैसा बनता है?
नहीं, अमरनाथ गुफा में बनने वाला हिमलिंग पूरी तरह प्राकृतिक प्रक्रिया का परिणाम होता है. हर साल इसकी ऊंचाई, चौड़ाई और आकार अलग-अलग हो सकता है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि सर्दियों में कितनी बर्फबारी हुई, गुफा के भीतर तापमान कितना रहा और यात्रा शुरू होने से पहले मौसम कैसा रहा. इसलिए किसी साल हिमलिंग 8 से 10 फीट तक ऊंचा दिखाई देता है, तो किसी वर्ष यह अपेक्षाकृत छोटा रहता है. इसे किसी कृत्रिम तरीके से तैयार नहीं किया जाता.
क्या हिमलिंग के जल्दी पिघलने से अमरनाथ यात्रा रद्द हो सकती है?
सामान्य परिस्थितियों में नहीं. अमरनाथ यात्रा का उद्देश्य केवल हिमलिंग के दर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भगवान शिव की पवित्र गुफा की धार्मिक यात्रा भी है. यदि प्राकृतिक कारणों से हिमलिंग पिघल जाता है, तब भी यात्रा निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार जारी रहती है. हालांकि खराब मौसम, भूस्खलन, बाढ़ या सुरक्षा कारणों से प्रशासन अस्थायी रूप से यात्रा रोक सकता है. इसलिए श्रद्धालुओं को यात्रा से पहले आधिकारिक एडवाइजरी जरूर देखनी चाहिए.
क्या भविष्य में बाबा बर्फानी का हिमलिंग लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि हिमलिंग को कृत्रिम तरीके से संरक्षित करने की बजाय प्राकृतिक परिस्थितियों को बेहतर बनाए रखना अधिक महत्वपूर्ण है. इसके लिए हिमालयी पर्यावरण की सुरक्षा, ग्लोबल वार्मिंग पर नियंत्रण, कार्बन उत्सर्जन में कमी और यात्रा के दौरान पर्यावरण-अनुकूल प्रबंधन जरूरी है. यदि जलवायु परिवर्तन की रफ्तार कम होती है और संवेदनशील क्षेत्रों में मानवीय दबाव नियंत्रित रहता है, तो भविष्य में हिमलिंग के अधिक समय तक बने रहने की संभावना बढ़ सकती है.
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