भारत की मिसाइलें बन रहीं दुनिया की जरूरत……………

भारत के रक्षा क्षेत्र के लिए मंगलवार एक अहम दिन बनकर आया। दरअसल, इंडोनेशिया ने भारत से उसकी ब्रह्मोस मिसाइल और अस्त्र मिसाइल खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे पर ही दोनों देशों के बीच इस मिसाइलों को लेकर समझौता तय हुआ है। इसी के साथ देश के रक्षा उद्योग को […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
बुधवार, 8 जुलाई 2026, 08:15 AM 11 मिनट read
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भारत की मिसाइलें बन रहीं दुनिया की जरूरत……………
Photo: UB India News Archive
भारत के रक्षा क्षेत्र के लिए मंगलवार एक अहम दिन बनकर आया। दरअसल, इंडोनेशिया ने भारत से उसकी ब्रह्मोस मिसाइल और अस्त्र मिसाइल खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे पर ही दोनों देशों के बीच इस मिसाइलों को लेकर समझौता तय हुआ है। इसी के साथ देश के रक्षा उद्योग को अब एशिया में एक और खरीदार मिल गया है। हालांकि, अगर बीते कुछ वर्षों में भारत के रक्षा निर्यात पर गौर किया जाए तो कहानी एशिया से आगे पूरी दुनिया तक जा रही है।

पहले जानें- भारत के कौन-कौन से हथियारों की दुनिया में मांग?
दुनिया भर में भारत के कई स्वदेशी हथियारों और रक्षा प्रणालियों की मांग तेजी से बढ़ रही है। इन हथियारों ने अपनी उन्नत तकनीक और युद्धक्षेत्र में शानदार प्रदर्शन के कारण वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बनाई है।

1. ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल 
यह भारत का सबसे प्रमुख और सफल रक्षा निर्यात है। फिलीपींस जनवरी 2022 में इसका पहला विदेशी खरीदार बना था। इसका सबसे ताजा खरीदार इंडोनेशिया बना है यह मिसाइल ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना (मैक 2.8 से 3) तेज उड़ान भरने और 450 किलोमीटर तक सटीक वार करने में सक्षम है।

2. आकाश एयर-डिफेंस मिसाइल सिस्टम
यह सतह से हवा में मार करने वाली भारत की पहली स्वदेशी वायु-रक्षा मिसाइल है जिसे किसी विदेशी ग्राहक ने खरीदा है। आर्मेनिया इसका पहला खरीदार बना है। इसके अलावा कुछ और देशों ने भी लड़ाकू विमानों, क्रूज मिसाइलों और ड्रोन्स को मार गिराने वाले इस सिस्टम में अपनी रुचि दिखाई है।

3. अस्त्र मिसाइल
यह बियॉन्ड-विजुअल-रेंज (दिखने वाले निशानों से कई किमी दूर मारक क्षमता वाली) एयर-टू-एयर (हवा से हवा में मार करने वाली) मिसाइल है, जो 100 किलोमीटर से अधिक दूरी तक दुश्मन के विमानों को मार गिराने में सक्षम है। इंडोनेशिया ने इसे खरीदने का फैसला किया है। इसे वह अपने रूसी मूल के सुखोई लड़ाकू विमानों में इस्तेमाल करेगा।

4. पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर और तोप
भारतीय सेना द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेल लॉन्चर को अर्मेनिया ने खरीदा है। अर्मेनिया को भारत की तरफ से 155 मिमी की एडवांस टोड आर्टिलरी गन सिस्टम (एटीएजीएस) भी निर्यात की गई है।

5. आर्टिलरी शेल 
भारत ने संयुक्त अरब अमीरात को 155 मिमी आर्टिलरी शेल (तोप के गोले) की हजारों इकाइयों की आपूर्ति के लिए बड़े निर्यात ऑर्डर हासिल किए हैं।

6. सैन्य वाहन और ट्रक 
भारतीय रक्षा कंपनियों की ओर से बनाए गए सैन्य वाहनों की मांग भी बढ़ रही है। टाटा 8×8 एलपीटीए ट्रकों और सैन्य ट्रकों की खरीद बढ़ी है।

7. नौसैनिक प्लेटफॉर्म और टॉरपीडो
भारत ने मॉरीशस को बाराकुडा नाम के ऑफशोर गश्ती पोत निर्यात किया है। इसके अलावा भारत ने कुछ देशों को स्वदेशी रूप से विकसित लाइटवेट टॉरपीडो का भी निर्यात किया है।

इन प्रमुख हथियारों के अलावा, भारत दुनिया के 80 से अधिक देशों को डॉर्नियर-228 विमान, रडार, सिम्युलेटर, माइन-प्रोटेक्टेड वाहन, बुलेटप्रूफ जैकेट, थर्मल इमेजर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों का भी निर्यात कर रहा है।

इंडोनेशिया से पहले कौन-कौन से देशों में भारत के हथियारों की मांग?

इंडोनेशिया से पहले कई देशों ने भारतीय रक्षा प्रणालियों और हथियारों में भारी रुचि दिखाई है और बड़े स्तर पर इनकी खरीद की है। भारत के प्रमुख हथियार खरीदारों में दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर मध्य पूर्व, यूरोप और अफ्रीका तक के देश शामिल हैं।

फिलीपींस: यह ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का दुनिया का सबसे पहला विदेशी खरीदार है। जनवरी 2022 में फिलीपींस ने भारत के साथ 37.5 करोड़ डॉलर का एक बड़ा रक्षा सौदा किया था, जिसके तहत उसे तट-आधारित एंटी-शिप मिसाइल बैटरी, राडार और अन्य उपकरण सौंपे गए हैं।

वियतनाम: इंडोनेशिया से ठीक पहले, वियतनाम ने भी ब्रह्मोस मिसाइल के लिए लगभग 62.9 करोड़ डॉलर का समझौता किया है। यह सौदा विशेष रूप से दक्षिण चीन सागर में वियतनाम की तटीय रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के लिए किया गया है।

अर्मेनिया: यह देश भारतीय हथियारों का एक बहुत बड़ा रणनीतिक साझीदार बनकर उभरा है। अर्मेनिया आकाश वायु-रक्षा मिसाइल प्रणाली  का पहला विदेशी खरीदार है, जिसके लिए उसने 23 करोड़ डॉलर का सौदा किया था। इसके अलावा अर्मेनिया ने भारत से पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर, एंटी-टैंक म्यूनिशन और 155 मिलीकी एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन सिस्टम (एटीएजीएस) भी भारी मात्रा में खरीदे हैं।

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई): खाड़ी देशों में यूएई भारतीय हथियारों का बड़ा ग्राहक रहा है। यूएई ने भारत से 155 मिमी आर्टिलरी शेल (तोप के गोले) की हजारों इकाइयों की खरीद के लिए बड़े ऑर्डर दिए हैं, जिसमें 2017 में 40,000 और 2019 में 50,000 गोलों की आपूर्ति शामिल है। इसके अलावा, यूएई ब्रह्मोस मिसाइल और आकाशतीर एयर-डिफेंस कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम खरीदने के लिए भी भारत के साथ बातचीत कर रहा है।

थाईलैंड और मोरक्को: सैन्य वाहनों के मामले में थाईलैंड ने भारत से 600 से अधिक सैन्य ट्रकों की खरीद की है। वहीं, मोरक्को की सेना ने 2023 में टाटा के 2445 सैन्य ट्रकों को हासिल किया है।

मॉरीशस, म्यांमार और श्रीलंका: भारत ने 2011 में मॉरीशस को अपना पहला स्वदेशी रूप से डिजाइन किया गया ऑफशोर पेट्रोल वेसल (गश्ती पोत) बाराकुडा निर्यात किया था। 2017 में म्यांमार को स्वदेशी हल्के टॉरपीडो बेचे गए थे, और श्रीलंका को भी नौसैनिक युद्धपोत और अन्य प्लेटफॉर्म निर्यात किए गए हैं।

भारत की कौन सी मिसाइलें पूरी दुनिया में पसंद की जा रही हैं?

दुनिया भर में मुख्य रूप से भारत की तीन स्वदेशी मिसाइलों की मांग और लोकप्रियता सबसे तेजी से बढ़ रही है। वैश्विक रक्षा बाजार में इन मिसाइलों ने अपनी मजबूत धाक जमाई है। इनमें ब्रह्मोस, आकाश और अस्त्र मिसाइलें शामिल हैं।

1. ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल: यह भारत का सबसे सफल रक्षा निर्यात है और दुनिया में सबसे ज्यादा पसंद की जा रही है। फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया ने इसे खरीदने के लिए सौदे किए हैं। इसके अलावा यूएई, सऊदी अरब, मिस्र, ब्राजील, चिली, दक्षिण अफ्रीका और थाईलैंड जैसे देश भी इसे खरीदने में गहरी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। यहां तक कि इसे भारत के साथ मिलकर बनाने वाला देश रूस भी इसे अपनी सेना में शामिल करने पर विचार कर रहा है।

2. आकाश एयर-डिफेंस सिस्टम: यह सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल है। अर्मेनिया इसका पहला विदेशी खरीदार बना है। इसके अलावा, फिलीपींस और मिस्र ने भी इस सिस्टम में अपनी रुचि दिखाई है।

3. अस्त्र मिसाइल: यह बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल हवा से हवा में मार करने की खूबी रखती है। इंडोनेशिया इसका पहला विदेशी खरीदार बन गया है। चूंकि इंडोनेशिया के पास भी रूसी मूल के सुखोई-30 विमान हैं, इसलिए अस्त्र मिसाइल इस खतरनाक फाइटर जेट के साथ मिलकर दुश्मन के लिए घातक साबित हो सकती है।

क्या है इन मिसाइलों को पसंद किए जाने की वजह?

ऑपरेशन सिंदूर में प्रमाणित प्रदर्शन
भारत की मिसाइलों की बिक्री का सबसे बड़ा कारण ऑपरेशन सिंदूर में इनकी घातक क्षमता का प्रदर्शन था। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, खरीदार देश अब केवल हथियारों के कागजी दावों पर नहीं, बल्कि युद्ध के मैदान में साबित हो चुके हथियारों पर भरोसा कर रहे हैं। मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी एयरबेस को नष्ट करने के लिए ब्रह्मोस और अस्त्र मिसाइलों का बेहद सटीक और सफल इस्तेमाल किया था। इस घटना ने पूरी दुनिया के सामने इन मिसाइलों की मारक क्षमता और विश्वसनीयता को प्रमाणित कर दिया।

दक्षिण चीन सागर में ड्रैगन से बढ़ता खतरा 
दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों, जैसे- फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया का दक्षिण चीन सागर में चीन के साथ विवाद चल रहा है। इन देशों के लिए ब्रह्मोस जैसी मारक मिसाइलें चीन के खिलाफ एक बेहतरीन तटीय रक्षा और रणनीतिक प्रतिरोध का काम करती हैं।

आधुनिक, उन्नत और घातक तकनीक से लैस

  • ब्रह्मोस आवाज की गति से लगभग तीन गुना (मैक 2.8 से 3) तेज रफ्तार उड़ान भरती है और अंतिम चरण में समुद्र की सतह के बेहद करीब उड़ सकती है, जिससे इसे रडार पर पकड़ना और बीच में इंटरसेप्ट करना (रोकना) लगभग असंभव हो जाता है। यह जमीन, समुद्र, पनडुब्बी और हवा कहीं से भी दागी जा सकती है।
  • दूसरी ओर अस्त्र मिसाइल 100 किलोमीटर से अधिक दूरी तक दुश्मन के विमान को हवा में ही मार गिराने में सक्षम है। वहीं, आकाश मिसाइल लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों, ड्रोन्स और क्रूज मिसाइलों को आसानी से एक साथ निशाना बना सकती है।

भारत की विश्वस्त निर्यातक की भूमिका
भारत सरकार की आत्मनिर्भर भारत नीति के तहत भारत अब दुनिया भर में एक भरोसेमंद रक्षा आपूर्तिकर्ता के रूप में उभर रहा है। भारत अपने मित्र देशों को न केवल हथियार दे रहा है, बल्कि बेहतर ऋण-सुविधा और भविष्य के रखरखाव का भरोसा भी दे रहा है।

आगे क्या हैं भारत के रक्षा उद्योग के लिए संभावनाएं?

भारतीय रक्षा उद्योग भविष्य में एक तेज और निरंतर विकास के चरण में प्रवेश कर रहा है। मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसी नीतियों के कारण भारत अब दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातक की छवि से बाहर निकलकर एक प्रमुख वैश्विक रक्षा विनिर्माण और निर्यात हब बनने की कोशिश में जुटा है।

1. भारत का बड़ा निर्यात लक्ष्य 
भारत सरकार ने 2029 तक तीन लाख करोड़ रुपये ($31 अरब) के घरेलू रक्षा उत्पादन का लक्ष्य रखा है। इसके साथ ही 2029-30 तक रक्षा निर्यात को 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है। अनुमान है कि 2025-26 के बीच भारत का रक्षा उत्पादन 1.60 लाख करोड़ रुपये को पार कर जाएगा।

2. नए वैश्विक बाजारों का विस्तार
भारतीय हथियारों की पहुंच अब केवल दक्षिण-पूर्व एशिया तक सीमित नहीं है। भविष्य में पश्चिम एशिया, अफ्रीका (यूएई, सऊदी अरब, मिस्र, दक्षिण अफ्रीका) और लातिन अमेरिका (ब्राजील, चिली) जैसे नए बाजारों में भी ब्रह्मोस और आकाश जैसे हथियारों के निर्यात की संभावनाएं बनी हैं। यहां तक कि ब्रह्मोस के सह-निर्माता रूस भी इसे अपनी सेना में शामिल करने पर विचार कर रहा है, जो इसकी वैश्विक विश्वसनीयता के लिए अहम साबित होगा।

3. हथियारों के पोर्टफोलियो में विविधता
भारत के उन्नत मिसाइल सिस्टम, पिनाका रॉकेट लॉन्चर, और तोपों का भी निर्यात जारी है। भविष्य में टैक्टिकल ड्रोन्स  का बाजार भी 30-35 अरब रुपये से बढ़कर 120-140 अरब रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है, जो रक्षा क्षेत्र के लिए एक बड़ा अवसर है।

4. विदेशी आयात पर निर्भरता कम करने का कदम
सरकार ने विदेशी निर्भरता कम करने के लिए सैकड़ों रक्षा उपकरणों, जैसे- आर्टिलरी गन, परिवहन विमान, लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर और बख्तरबंद वाहन के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस नीति से स्थानीय रक्षा कंपनियों को अरबों रुपये के सरकारी ऑर्डर मिलने की गारंटी मिल रही है।

5. निजी क्षेत्र की बढ़ रही भूमिका
रक्षा उत्पादन में अब निजी कंपनियों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ रही है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, कुल उत्पादन में निजी क्षेत्र का योगदान 20.8% और रक्षा निर्यात में लगभग 60% रहा है। रक्षा मंत्री ने भी इस बात पर जोर दिया है कि इनोवेशन (नवाचार) के लिए निजी क्षेत्र को रक्षा उद्योग का नेतृत्व करना होगा।

भारत के रक्षा निर्यातक बनने के सफर में कितनी चुनौती?

  • रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, मौजूदा समय में भारतीय रक्षा कंपनियां अपने राजस्व का केवल 1-2 फीसदी ही रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर खर्च करती हैं, जबकि वैश्विक औसत 3.4% है एचएएल और बीडीएल जैसी कंपनियां इसका अपवाद जरूर हैं, लेकिन उन्नत तकनीक में बने रहने के लिए इस निवेश को बढ़ाना होगा।
  • विश्लेषकों का मानना है कि केवल हथियार बेचना ही काफी नहीं है; भारत को विदेश में मेंटेनेंस हब, स्पेयर पार्ट्स की निरंतर आपूर्ति और प्रशिक्षित तकनीकी टीमें तैनात करनी होंगी। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो भारतीय हथियारों की बिक्री के बाद के बाद की सेवा प्रभावित हो सकती है।
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