सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता और साख पर गंभीर सवाल…………….

देश की शिक्षा इस समय हर स्तर पर दो खंडों में बंट गई है, सरकारी और निजी। सरकार के पास संसाधन नहीं हैं, अतः उसे शिक्षा में निजी निवेश को प्रोत्साहन देना ही है। समाज के जिस वर्ग को शिक्षा की सबसे अधिक आवश्यकता है, वह सरकारी स्कूलों पर निर्भर है। इसको वह अपनी मजबूरी […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 9 जुलाई 2026, 06:18 AM 5 मिनट read
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सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता और साख पर गंभीर सवाल…………….
Photo: UB India News Archive

देश की शिक्षा इस समय हर स्तर पर दो खंडों में बंट गई है, सरकारी और निजी। सरकार के पास संसाधन नहीं हैं, अतः उसे शिक्षा में निजी निवेश को प्रोत्साहन देना ही है। समाज के जिस वर्ग को शिक्षा की सबसे अधिक आवश्यकता है, वह सरकारी स्कूलों पर निर्भर है। इसको वह अपनी मजबूरी में ही स्वीकार कर रहा है, क्योंकि इसकी गुणवत्ता और साख आज सवालों के घेरे में है। सरकारी तंत्र में नियमित सेवा में नियुक्त और हर साधन संपन्न व्यक्ति अपने बच्चों को सामान्य सरकारी स्कूलों के बजाय निजी स्कूलों में भेजना पसंद कर रहा है। यहां दो वर्ग बन गए हैं।

सरकारी सहायता प्राप्त विश्वविद्यालयों में प्रवेश की प्रतिस्पर्धा इतनी कठिन हो चुकी है कि उसके लिए कोचिंग संस्थानों में जाना जरूरी है। कोचिंग एक शुद्ध व्यापार है। यहां जिन परिस्थितियों में संवेदनशील आयु के युवा आते हैं, रहते और पढ़ते हैं, वे अस्वीकार्य स्तर का तनाव, चिंता और घबराहट उत्पन्न करती हैं। कक्षा 11-12 में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को बोर्ड परीक्षा की तैयारी करनी होती है। यदि उन्हें न्यूनतम अंक नहीं मिलें तो आगे की प्रतियोगी परीक्षा में बैठ नहीं सकेंगे। फिर उन्हें मेडिकल, इंजीनियरिंग या अन्य व्यावसायिक प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी, कोचिंग में भागीदारी और वहां लगभग प्रतिदिन प्रतिस्पर्धा में आगे रहने का दायित्व उठाना पड़ता है। इस सबके साथ उन पर माता-पिता की अपेक्षाओं और आशाओं का लगातार बढ़ता दबाव भी है।

दूसरी ओर समाज में नैतिकता के प्रति लगातार बढ़ रही शिथिलता और व्यवस्था में कर्तव्यनिष्ठा की कमी ने पेपर-लीक का ऐसा जाल रच दिया है, जिसका कोई समाधान सामने नहीं आ रहा है। कहा तो यह भी जा रहा है कि कुछ नकल और पर्चा-लीक में भागीदार माफिया दशकों से इसमें संलग्न हैं और सरकारी तंत्र तथा न्याय व्यवस्था की खिल्ली उड़ा रहे हैं। किसी को भी विश्वास नहीं है कि भविष्य में सरकारी व्यवस्था नियमों का पालन करवा सकेगी। साठगांठ इतनी सशक्त है कि उसे तोड़ पाना सामान्य व्यक्ति को असंभव लगता है। नकल माफिया, साल्वर गैंग, पर्चा-लीक इत्यादि सभी शिक्षित लोगों द्वारा ही चलाए और निर्देशित किए जाते हैं। इन समस्याओं का त्वरित समाधान खोजना आवश्यक है, लेकिन शिक्षा व्यवस्था की साख पुनः स्थापित करने के लिए दीर्घकालीन उपाय खोजने होंगे। यह तभी संभव है जब उन परिस्थितियों को ईमानदारी से विश्लेषित किया जाए, जिसके कारण कर्तव्यनिष्ठा में गिरावट आई और नैतिकता केवल पुस्तकों में सिमट कर रह गई।

संविधान निर्माताओं ने 14 वर्ष तक के हर बच्चे को अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा देने के निर्देश दिए थे। यदि प्रारंभ से ही सभी सरकारों ने इस जिम्मेदारी को निभाया होता, सभी बच्चों को शिक्षा का एक समान अवसर देने की भावना को व्यावहारिक स्वरूप दिया होता, अपना उत्तरदायित्व स्वीकारा होता और उसके लिए संसाधन उपलब्ध कराए होते, हर वर्ग और आर्थिक स्थिति के बच्चे एक स्कूल में और साथ-साथ पढ़ते तो आज यह स्थिति पैदा नहीं होती। सरकारें यदि ऐसा करतीं तो समाज स्वयं आगे आता। संसाधनों की कमी कुछ वर्षों में स्वतः ही समाप्त हो जाती। सरकारी स्कूलों के प्रति घोर लापरवाही, उसके अध्यापकों से हर प्रकार का गैर-शैक्षिक कार्य करवाना, नियमित नियुक्तियां न करना कुछ ऐसे अक्षम्य निर्णय रहे हैं, जिनके प्रभाव को कम करना और रोकना आवश्यक है। हालांकि शिक्षा नीति-2020 के बाद एक आशाजनक स्थिति बनी है कि भारतीय संस्कृति के आलोक में नीति निर्माण हुआ है और इसमें भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व को स्वीकारा गया है। ये अत्यंत संवेदनशील कार्यक्षेत्र हैं, इनको उचित महत्व दिए बिना शिक्षा में वास्तविक समानता की ओर बढ़ना कठिन होगा। शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद के छह प्रतिशत खर्च करने की कोठारी आयोग (1964-66) की सिफारिश को गंभीरता से अपनाना होगा।

सरकारी स्कूलों में अध्यापकों की नियमित नियुक्ति को पीछे धकेलना शिक्षा की गुणवत्ता के लिए आत्मघाती रहा है। थोड़े से मानदेय पर सरकारी स्कूलों में अध्यापक नियुक्त करना, विश्वविद्यालयों में अतिथि-अध्यापक, लेक्चर आधारित मानदेय जैसे प्रयोग शिक्षा में गुणवत्ता, शोध की उत्कृष्टता और अध्यापकों के उत्साह तथा लगनशीलता को लील गए। सरकारें अब तय करें कि केवल नियमित अध्यापकों की नियुक्ति की जाएगी। तीन महीने के लिए स्थानीय स्तर पर सेवानिवृत्त अध्यापकों की सेवाएं लेने का अधिकार प्राचार्य को देना चाहिए। विश्वविद्यालय स्तर पर यह अधिकार कुलगुरुओं को होना चाहिए।

उद्देश्य यह है कि पढ़ाई का नुकसान एक दिन के लिए भी नहीं होना चाहिए। क्या विकसित भारत में भी चुनाव, जनगणना, पशुगणना जैसे कार्यों में अध्यापकों को लगाकर स्कूल बंद करने की प्रथा जारी रहेगी? इससे अध्यापकों का मनोबल गिरता है और देश की ज्ञान-कौशल संपदा क्षीण होती है। व्यवस्था का विकेंद्रीकरण आवश्यक है। हर स्तर पर नेतृत्व संवर्धन के प्रयास करने होंगे, तभी हर स्तर पर उत्तरदायित्व बोध बढ़ेगा। इसी से अन्य समाधान भी स्वतः ही निकलेंगे। वर्तमान में प्रगति और विकास का सशक्त आधार सिद्ध हो चुकी शिक्षा भविष्य में अपेक्षित अपनी सार्थकता तभी सिद्ध कर सकेगी जब वह गुणवत्ता, उत्कृष्टता, जीवनोपयोगी एवं उत्पादन कौशलों से परिपूर्ण हो।

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