युद्ध हमें हैवानियत के अंधेरे की ओर नहीं ले जाए…………….

यह बहुत पीड़ा, चिंता और शर्म की बात है कि पश्चिम एशिया में फिर युद्ध छिड़ गया है। ईरान की ओर से किसी बड़े नेता का बयान नहीं आया है, पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हमले का एलान करते हुए बता दिया है कि ईरान के साथ युद्ध-विराम खत्म हो चुका है। उन्होंने तुर्किये […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 9 जुलाई 2026, 06:22 AM 4 मिनट read
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युद्ध हमें हैवानियत के अंधेरे की ओर नहीं ले जाए…………….
Photo: UB India News Archive

यह बहुत पीड़ा, चिंता और शर्म की बात है कि पश्चिम एशिया में फिर युद्ध छिड़ गया है। ईरान की ओर से किसी बड़े नेता का बयान नहीं आया है, पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हमले का एलान करते हुए बता दिया है कि ईरान के साथ युद्ध-विराम खत्म हो चुका है। उन्होंने तुर्किये में नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान कहा है कि मैं अब ईरान से कोई बातचीत नहीं करना चाहता। उससे बातचीत जारी रखना समय की बर्बादी है। ट्रंप ने ईरान के लिए ऐसे-ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया है, जिन्हें लिखना सभ्य राजनय के अनुकूल नहीं है। अभी कुछ ही दिनों पहले वह युद्ध-विराम की घोषणा करते हुए प्रसन्न थे, पर अब उनकी तल्खी सबको चौंका रही है। अफसोस, अपने मिजाज के मुताबिक ही उन्होंने पल में तोला, पल में माशा के मुहावरे को चरितार्थ कर दिया है। उनकी आक्रामक मुद्रा से लग रहा है कि वह आर-पार का युद्ध लड़ने के इच्छुक हैं। ईरान युद्ध से अब तक उन्हें निंदा ही हासिल हुई है और ईरान में भी उनसे उम्मीद लगाने वाले लोग जान हथेली पर लिए बैठे हैं।

बहरहाल, यह जानना बहुत मुश्किल है कि युद्ध-विराम के टूटने के लिए कौन जिम्मेदार है? दोनों देश एक-दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं। अगर ईरान ने होर्मुज समुद्री मार्ग से गुजरते किसी जहाज को निशाना बनाया है, तो यह वास्तव में मानवता विरोधी हरकत है। युद्ध-विराम और समझौते के लिए हो रही वार्ता को जारी रखना आसान नहीं होता। इसके लिए बहुत सब्र की जरूरत होती है। यह संयम शायद ईरान में नहीं है। ईरान के सर्वोच्च नेता रहे खामेनेई को अंतिम विदाई दे रहे देश में जैसा अमेरिका या ट्रंप विरोध दिखा है, उसकी तारीफ नहीं हो सकती। वहां लोग खुलेआम बदला लेने का आह्वान कर रहे हैं और इस पर ईरानी प्रशासन के पास एक लफ्ज नहीं है। क्या समझौते के लिए बातचीत और शत्रुता साथ-साथ चल सकती है? ट्रंप के ताजा उद्गार में यह चिंता साफ झलक रही है, पर ईरान पर हुए हमले की सिर्फ निंदा ही संभव है। खामेनेई गुरुवार को सुपुर्दे-खाक होंगे, तो क्या ईरान अपनी ओर से कुछ सब्र नहीं बरत सकता था? ट्रंप अब बोल रहे हैं कि ईरान के जिस शासन ने 54 हजार से ज्यादा अपने ही लोगों को मारा है, उसे छोड़ा नहीं जाएगा। क्या वाकई ट्रंप इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाएंगे? यहां यह कहना ही चाहिए कि अमेरिका द्वारा की गई आधी-अधूरी लड़ाइयों ने पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, इराक और फलस्तीन में मानव जीवन को नारकीय बना रखा है। गजब त्रासदी है, अमेरिका आतंकवाद को समाप्त करना चाहता है, लेकिन इन दिनों पाकिस्तान उसका सबसे बड़ा मध्यस्थ है। क्या अमेरिका वाकई आतंकवाद और मानवाधिकार हनन के खिलाफ लड़ाई चाहता है?

वीरता में दोष नहीं है, पर मानवता से परे किसी देश को नहीं जाना चाहिए। ईरान ने बहरीन और कुवैत में 85 अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किए हैं, क्या इसे युद्ध-विराम जारी रखने की कोशिश माना जाए? ईरान ने होर्मुज में किसी अमेरिकी जहाज पर नहीं, बल्कि कतर के जहाज पर हमला बोला है। ईरान के इरादे बिल्कुल साफ हैं, अगर उसे परेशान किया जाएगा, तो वह होर्मुज में यातायात को बंद कर पूरी दुनिया को परेशान करेगा। नतीजे सामने हैं, भारत सहित दुनिया भर के शेयर बाजार लुढ़कने लगे हैं और कच्चे तेल के भाव में पांच प्रतिशत से ज्यादा की उछाल संकेत है कि बुरे दिन अभी टले नहीं हैं। बेशक, यह उम्मीद और दुआ करने का समय है कि यह युद्ध हमें हैवानियत के अंधेरे की ओर नहीं, इंसानियत के उजाले की ओर ले जाए।

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