रथयात्रा निकलने के बाद किस दिन होगी हेरा पंचमी की रस्म?

जगन्नाथ रथ यात्रा का हिंदू धर्म में खास महत्व है. हर साल यह भव्य यात्रा आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि पर मनाई जाती है. रथ यात्रा में भगवान श्रीजगन्नाथ, बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने असली स्वरूप में गर्भगृह से बाहर आते हैं. यहां वे भव्य रथों पर सवार होकर भक्तों को दर्शन […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
मंगलवार, 14 जुलाई 2026, 09:19 AM 6 मिनट read
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रथयात्रा निकलने के बाद किस दिन होगी हेरा पंचमी की रस्म?
Photo: UB India News Archive

जगन्नाथ रथ यात्रा का हिंदू धर्म में खास महत्व है. हर साल यह भव्य यात्रा आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि पर मनाई जाती है. रथ यात्रा में भगवान श्रीजगन्नाथ, बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने असली स्वरूप में गर्भगृह से बाहर आते हैं. यहां वे भव्य रथों पर सवार होकर भक्तों को दर्शन देते हैं. रथ यात्रा में भगवान अपनी माउसी मां के मंदिर जाते हैं. माउसी मां मंदिर, वहीं स्थान है जहां रानी गुंडिचा मां उनका इंतजार करती है. दरअसल, जब भगवान जगन्नाथ के मंदिर का निर्माण हुआ तो भगवान वहां आकर विराजित हो गए. इसके बाद राजा और रानी, प्रतिदिन उनसे मिलने मंदिर आते थे. कुछ समय पश्चात रानी गुंडिचा और राजा की आयु ज्यादा होने लगी. दोनों की कोई भी संतान नहीं थी. इसलिए, भगवान उन्हें कहा कि मैं हर साल रथ यात्रा करूंगा और उसके बाद रथ पर संवार होकर वृंदावन भ्रमण करूंगा. वृंदावन, रानी गुंडिचा का मंदिर कहलाता है. इसलिए, वे हर साला गुंडिचा मां के पास जाते हैं ताकि वहां उन्हें माता का स्नेह मिल सके. यहां वे अपने भाई-बहनों के साथ तो आ जाते हैं लेकिन मात लक्ष्मी को साथ नहीं लाते हैं. जैसे ही माता लक्ष्मी को पता चलता है कि भगवान जगन्नाथ जी अकेले भ्रमण के लिए निकले हैं तो वह अपने गणों के साथ उनके दर्शन करने निकल पड़ती है. इस दिन कुछ ऐसा होता है, जो बड़ा ही प्यारा और मनुहार भरा होता है. आइए जानते हैं हेरा पंचमी की रस्म में क्या होता है? इस साल हेरा पंचमी कब है?

हेरा पंचमी 2026 कब है? HERA PANCHAMI 

पुरीधाम के ओडिया पांजी के अनुसार, इस वर्ष जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई 2026 को है. इसलिए, हेरा पंचमी इस साल 20 जुलाई 2026, सोमवार को मनाई जाएगी. हेरा पंचमी के दिन माता लक्ष्मी जो भगवान जगन्नाथ की अर्धांगिनी होती हैं. वे अपने पति को ढूंढने श्रीमंदिर से बाहर आती है.

हेरा पंचमी की रस्म क्या होती है?

हेरा पंचमी रथ यात्रा के दौरान होने वाली एक रस्म होती है. इसे मजेदार और आनंदमय उत्सव माना जाता है. रथ यात्रा के पांचवे दिन यह अनुष्ठान होता है. दरअसल, जब जगन्नाथ जी श्रीमंदिर से चले जाते हैं और माता लक्ष्मी इंतजार करती रहती हैं. इंतजार लंबे समय तक रहता है, जिस वजह से माता क्रोधित हो उठती है. वे व्याकुल हो जाती हैं क्योंकि कई दिनों से उन्होंने अपने प्रभु के दर्शन नहीं किए होते हैं. इसके बाद उनके सेवक आकर बताते हैं कि भगवान के रथों को वृंदावन में देखा गया है. माता लक्ष्मी अब जगन्नाथ जी से मिलने के लिए निकल जाती है. कथाओं के अनुसार, जाते समय लक्ष्मी माता अफनी पालकी पर संवार होकर ढोल-नगाड़ों और गीत-संगीत करते हुए जाती हैं. गुंडिचा मंदिर पहुंचकर भी जगन्नाथ भगवान मंदिर से बाहर नहीं आते हैं. उनके दैत्यपति सेवक लक्ष्मी माता को समझाने का प्रयास करते हैं कि भगवान जल्द ही श्रीमंदिर लौटेंगे.

रथ तोड़ देती है लक्ष्मी माता

इस प्यारे अनुष्ठान की सबसे प्यारी रस्म रथ तोड़ने की ही होती है. जब भगवान (Lord Jagannath) लक्ष्मी माता के पुकारने पर भी उन्हें दर्शन नहीं देते हैं तो मां गुस्से में आकर उनके रथ को तोड़ देती है. इससे नंदीघोष रथ का एक हिस्सा बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो जाता है. लक्ष्मी माता गुंडिचा मंदिर में प्रभु के दर्शन छुप-छुपकर करती हैं और फिर वहां से हेरा गोहोरी मार्ग से श्रीमंदिर में वापस आती है. दरअसल, मुख्य मार्ग से माता इसलिए नहीं आती है क्योंकि उन्हें डर लगता है कि कहीं जगन्नाथ जी को उनके आने के बारे में पता न चल जाए. हेरा गोहोरी साही एक गुप्त मार्ग होता है. जैसे ही भगवान का रथ टूटता है तो माता लक्ष्मी घबरा जाती है. इसके बाद वे तुरंत गुंडिचा मंदिर से अपनी पालकी पर बैठकर शांति से रवाना हो जाती हैं. श्रीमंदिर लौटते समय वह हेरा गोहिरी साही मार्ग का इस्तेमाल करती है. इस मार्ग से वे मंदिर जाती है और अपने निजी क्षेत्र में प्रवास करती है. यहां वे आराम करती हैं और ध्यान करती है. यह उनका गुप्त विश्राम कक्ष होता है.

मंदिर के द्वार पर स्थित है माता लक्ष्मी

जी हां, पुरी के जगन्नाथ मंदिर के मुख्य द्वार पर सबसे ऊपर माता लक्ष्मी कि मूर्ति हैं. यह मंदिर भगवान जगन्नाथ का नहीं बल्कि लक्ष्मी माता (goddess lakshmi) का घर है. यह उनका ससुराल है. इस मंदिर की देखरेख वहीं करती है. प्रभु का महाप्रसाद भी लक्ष्मी माता ही पकाती है. कहते हैं कि भगवान जगन्नाथ, जो विष्णु जी के ही स्वरूप है. वह धरती पर प्रतिदिन भ्रमण करते हैं. इस दौरान वे जगन्नाथपुरी मंदिर में भोजन खाने यानी महालक्ष्मी के हाथों का बना महाप्रसाद खाने के लिए रुकते हैं. पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भात का प्रसाद ही मुख्य माना जाता है. इसलिए, यहां एकादशी नहीं मानी जाती है. यहां के प्रसाद को महाप्रसाद कहते हैं. मान्यता है कि पुरीधाम की रसोई घर में कभी भी किसी भी भक्त के लिए भोजन कम नहीं पड़ता है. इसे हर कोई खा सकता है. महाप्रसाद का एक भात खाना भी उन्हें तृप्त कर देता है. यह भोग माता लक्ष्मी के स्पर्श से पावन हो जाता है.

हेरा पंचमी का नाम कैसे पड़ा?

बता दें कि ओड़िया भाषा में ‘हेरा’ का मतलब होता है देखना या दर्शन करना. पंचमी तिथि के दिन ही माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं, इसलिए इस दिन को हेरा पंचमी कहा जाता है. यह नाम इस अनूठी परंपरा से जुड़ा हुआ है, जिसमें देवी अपने पति के दर्शन के लिए स्वयं मंदिर से बाहर निकलती हैं.

इसके बाद क्या होता है?

हेरा पंचमी के बाद निलाद्री बिजे के दिन भगवान जगन्नाथ और माता लक्ष्मी के सेवकों के बीच मंदिर के द्वार पर काफी समय तक तर्क-वितर्क होते हैं. मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं होती है. इस वजह से जगन्नाथ जी माता लक्ष्मी को रस्गुल्ले और पाटो साड़ी देते हैं. इससे वे प्रसन्न हो जाती है और सिंह द्वार से भगवान जगन्नाथ को प्रवेश करने देती है.

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