20 साल बाद कोलकाता क्यों जा रही हैं बांग्लादेशी लेखक तसलीमा नसरीन?

पश्चिम बंगाल में सरकार बदलने के बाद अब वहां पर कई चीजें बदलती जा रही हैं. कई पुरानी व्यवस्था खत्म की जा रही है तो कई नई चीजें भी शुरू हो रही हैं. बांग्लादेश की मशहूर लेखिका तस्लीमा नसरीन भी लंबे समय बाद कोलकाता आ रही हैं. अपनी लेखनी के विरोध की वजह से उन्हें […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
बुधवार, 15 जुलाई 2026, 07:19 AM 6 मिनट read
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20 साल बाद कोलकाता क्यों जा रही हैं बांग्लादेशी लेखक तसलीमा नसरीन?
Photo: UB India News Archive

पश्चिम बंगाल में सरकार बदलने के बाद अब वहां पर कई चीजें बदलती जा रही हैं. कई पुरानी व्यवस्था खत्म की जा रही है तो कई नई चीजें भी शुरू हो रही हैं. बांग्लादेश की मशहूर लेखिका तस्लीमा नसरीन भी लंबे समय बाद कोलकाता आ रही हैं. अपनी लेखनी के विरोध की वजह से उन्हें करीब 2 दशक पहले कोलकाता छोड़ने को मजबूर होना पड़ा था.

नसरीन क्यों आ रहीं कोलकाता

तस्लीमा नसरीन के लंबे अंतराल के बाद कोलकाता लौटने पर पश्चिम बंगाल की मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने कहा, “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास और सबकी जवाबदेही. जवाबदेही तय की जा रही है. लेफ्ट सरकार तस्लीमा नसरीन जैसी प्रतिभाशाली लेखिका को सुरक्षा नहीं दे सकी थी. लेफ्ट ने मुसलमानों के नाम पर राजनीति तो की लेकिन सुरक्षा नहीं दे पाए, बल्कि मैं तो कहूंगी कि उन्होंने सुरक्षा दी ही नहीं. ममता बनर्जी के दौर की बात तो छोड़ ही दीजिए. अब सुना है कि तस्लीमा आ रही हैं. मैं उनकी किताब की बहुत बड़ी प्रशंसक हूं.”

कोलकाता छोड़ने के करीब दो दशक बाद, तस्लीमा नसरीन 1 अगस्त को शहर में एक साहित्यिक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आ रही हैं. शहर के रवींद्र सदन सांस्कृतिक केंद्र में होने वाले इस कार्यक्रम का आयोजन 3 संगठन सेकुलर मिशन, पश्चिमबोंगेर जोन्नो (पश्चिम बंगाल के लिए) और ह्यूमन राइट्स बियॉन्ड फ्रंटियर्स कर रहे हैं.

CM अधिकारी भी कार्यक्रम में होंगे शामिल

आयोजकों का कहना है कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और लेखक शीर्षेंदु मुखोपाध्याय के भी कार्यक्रम में शामिल होने की उम्मीद है. साल 2007 के बाद कोलकाता में नसरीन का यह पहला सार्वजनिक कार्यक्रम होने जा रहा है. उस समय उनकी किताब ‘द्विखंडितो’ (स्प्लिट: ए लाइफ) के विरोध की वजह से उन्हें वह शहर छोड़ना पड़ा था, जिसे उन्होंने बांग्लादेश से निर्वासन के बाद अपना घर बनाया था.

3 आयोजकों में से एक’पश्चिमबोंगेर जोन्नो’ के मोहित रॉय ने अखबार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से कहा, “इस कार्यक्रम का आयोजन 3 संगठनों की ओर से किया जा रहा है, जिसमें हमारा संगठन भी शामिल है. इस कार्यक्रम में नसरीन की कविताएं और गाने पेश किए जाएंगे. खुद मुख्यमंत्री भी इसमें मौजूद रहेंगे.”

सेकुलर मिशन के उस्मान मलिक ने कहा, “कोलकाता को देश की सांस्कृतिक राजधानी माना जाता है. लेकिन कट्टरपंथियों के विरोध की वजह से उन्हें (नसरीन) यहां से जाना पड़ा और इससे हमें दुख है. हमने पिछली सरकार के समय भी उनके यहां के दौरे का कार्यक्रम बनाने की कोशिश की थी, लेकिन सफल नहीं हो पाए थे. इस बार हमने मुख्यमंत्री से संपर्क किया, जिन्होंने हमें उचित सुरक्षा व्यवस्था का भरोसा दिलाया.”

उन्होंने बताया, “मुख्यमंत्री से आश्वासन मिलने के बाद हमने लेखिका नसरीन से भी संपर्क किया. वह कोलकाता आने और कार्यक्रम में हिस्सा लेने को लेकर राजी हो गईं. वह यहां कार्यक्रम में अपने निर्वासन के दौर का जिक्र करेंगी, उन हालात का जिक्र भी करेंगी जिनके कारण उन्हें कोलकाता छोड़ना पड़ा था. वह अपनी कविताएं भी सुनाएंगी.”

कलकत्ता हाई कोर्ट के वकील मलिक, पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से राज्य में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू करने पर रिपोर्ट देने के लिए गठित 9 सदस्यीय पैनल के सदस्यों में से एक हैं.

लेखनी की वजह से विवादों में नसरीन

लेखिका नसरीन अपनी बेबाक लेखनी की वजह से विवादों के केंद्र में रही हैं. उनकी लेखनी मुख्य रूप से महिलाओं के अधिकारों, पितृसत्तात्मक मानदंडों, लैंगिक समानता, और महिलाओं द्वारा सामना की जाने वाली घरेलू और संरचनात्मक हिंसा पर केंद्रित रही है. साल 1993 में प्रकाशित उनके सबसे चर्चित उपन्यास ‘लज्जा’ ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई. इस किताब में अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद बांग्लादेश में एक काल्पनिक हिंदू परिवार पर हुए अत्याचारों का जिक्र किया गया था.

इस किताब के आने के बाद उन्हें जान से मारने की धमकी मिलने लगी. उन्हें कई तरह के विरोध-प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा. विरोध को देखते हुए नसरीन 1994 में बांग्लादेश छोड़कर यूरोप (जर्मनी) और उत्तरी अमेरिका में निर्वासित जीवन बिताने लगीं. इस दौरान उन्हें स्वीडन की नागरिकता मिल गई. बाद में उन्हें कोलकाता में भी शरण मिली, जो सांस्कृतिक रूप से उनके घर के सबसे करीब का शहर था.

40 से अधिक किताबों की लेखिका

साल 1998 में, नसरीन ने अपनी आत्मकथा का पहला भाग ‘मेयेबेला’ (My Bengali Girlhood) प्रकाशित किया. हालांकि, 2003 में जब उनकी आत्मकथा का दूसरा भाग ‘द्विखंडितो’ प्रकाशित हुआ तो विवाद शुरू हो गया. किताब में कुछ ऐसे अंश थे जिन्हें धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला माना गया.

18 नवंबर 2003 को, कवि सैयद हशमत जलाल द्वारा तस्लीमा नसरीन के खिलाफ मानहानि का केस दाखिल कर दिया जिसके बाद कलकत्ता हाईकोर्ट ने किताब के प्रकाशन पर रोक लगा दिया. 10 दिन बाद, तत्कालीन बुद्धदेव भट्टाचार्य की अगुवाई वाली वाम मोर्चा सरकार ने इस डर से किताब पर बैन लगा दिया कि इससे सांप्रदायिक तनाव फैल सकता है. हालांकि, प्रकाशक ने इस बैन को चुनौती दी और फिर सितंबर 2005 में, हाईकोर्ट ने किताब पर से रोक हटा लिया.

नसरीन को केंद्र सरकार की ओर से साल 2004 में अस्थायी निवास परमिट दे दिया गया और वह कोलकाता में रहने लगीं. लेकिन उनकी लेखनी को लेकर विवाद बना रहा. जून 2006 में, कोलकाता की टीपू सुल्तान मस्जिद के तत्कालीन इमाम सैयद नूर-उर-रहमान बरकाती ने घोषणा की कि जो कोई भी उनका चेहरा “काला” करेगा, उसे इनाम दिया जाएगा. नसरीन को लेकर तनाव कम नहीं हुआ. आखिरकार उन्हें कोलकाता छोड़ना पड़ा. मार्च 2008 में वह दिल्ली आ गईं, लेकिन करीब 2 साल रहने के बाद भारत छोड़ दिया.

तस्लीमा नसरीन ने बंगाली भाषा में 40 से अधिक किताबें लिखी हैं, जिनमें कविताएं, उपन्यास, निबंध और कई हिस्सों में लिखी गई आत्मकथा शामिल है. उनकी रचनाओं का 30 से अधिक भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है.

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