चढ़ावा चोरी : धर्म और नैतिकता के बीच के अंतर को समझने की आवश्यकता है …………………..

भारतीय क्या स्वभाव से ही भ्रष्ट होते हैं? ऐसे भ्रष्ट कि भगवान राम तक को न बख्शें। दशकों से लोग जिस मंदिर के स्वप्न की पूर्ति के लिए प्रयासरत रहे, उसी मंदिर से यह बात सामने आई कि जिन लोगों को इस पवित्र संस्थान की सेवा का दायित्व सौंपा गया था, वही शायद यहां चोरी […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 16 जुलाई 2026, 08:08 AM 6 मिनट read
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चढ़ावा चोरी : धर्म और नैतिकता के बीच के अंतर को समझने की आवश्यकता है …………………..
Photo: UB India News Archive

भारतीय क्या स्वभाव से ही भ्रष्ट होते हैं? ऐसे भ्रष्ट कि भगवान राम तक को न बख्शें। दशकों से लोग जिस मंदिर के स्वप्न की पूर्ति के लिए प्रयासरत रहे, उसी मंदिर से यह बात सामने आई कि जिन लोगों को इस पवित्र संस्थान की सेवा का दायित्व सौंपा गया था, वही शायद यहां चोरी या हेराफेरी करते रहे। यह किसी सरकारी विभाग, ऐरे-गैरे ठेकेदार या अनाम कंपनी से नहीं, बल्कि भगवान राम की संपदा में ही सेंधमारी का मामला है। याद रहे कि इस मंदिर निर्माण के संकल्प की पूर्ति में कई पीढ़ियां खप गईं। इस मुद्दे ने देश की राजनीति की दशा-दिशा को बदल कर रख दिया। समुदायों के बीच विभाजन की खाई खींच दी। पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा और आधुनिक भारत के सर्वाधिक भावनात्मक मुद्दों में से एक बन गया।

जब राम जन्मभूमि मंदिर का स्वप्न वास्तव में साकार हुआ, तो दुनिया भर में करोड़ों लोगों ने जश्न मनाया। अनगिनत श्रद्धालुओं के लिए यह महज एक और मंदिर नहीं था, उनके लिए यही मंदिर था। ऐसे में यहां चोरी की घटना मन को गहरी टीस देने वाली है। यह कोई सामान्य भारतीय घपला-घोटाला नहीं कि किसी ने कोई गमला चुरा लिया या किसी सरकारी कर्मचारी ने किसी काम के एवज में रिश्वत ली हो। एक ऐसे देश में जहां नैतिकता का पतन एक सामान्य परिपाटी बनता जा रहा हो, वहां राम मंदिर से चोरी का मामला कल्पनातीत ही प्रतीत होता है। गर्त में जा रही नैतिकता को अपनी नियति मान चुके समाज के लिए भी यह पाप की पराकाष्ठा है।

जिस प्रकरण ने समूचे देश की चेतना को झकझोर कर रख दिया, उसके उजागर होने पर भी हमने वही सब किया, जो ऐसी स्थितियों में करने के लिए विख्यात या कहें कि कुख्यात रहे हैं। मसलन-कुछ खलनायकों को चिह्नित करो, कुछ को जेल भेज दो, कड़ी निंदा के साथ मामला रफा-दफा करने के साथ आगे बढ़ो। यह बहुत ही सहज प्रक्रिया है, लेकिन इसमें उस असहज करने वाली सच्चाई को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि भारत में भ्रष्टाचार महज कुछ लोगों की करतूतों से ही नहीं फलता-फूलता आया है। यह इस कारण भी अपनी पैठ जमाता गया, क्योंकि तमाम सामान्य भद्र जनों ने इसके साथ जीने और इसे अनदेखा करने के साथ ही इसके संग अनुकूलन की क्षमता विकसित कर ली और इस क्रम में जब कभी अवसर मिला, तो वे इससे लाभ उठाने से भी नहीं चूके।

हम इसी सोच के वशीभूत रहते हैं मानो भ्रष्टाचार केवल दूसरों की करतूत है-जैसे नेता, नौकरशाह और ठेकेदार ही इसके लिए जिम्मेदार हों। क्या वाकई ऐसा है? आखिर ये लोग हैं कौन? ये सभी हमारे इर्द-गिर्द के ही लोग हैं। कहीं न कहीं हमने भ्रष्टाचार को एक नैतिक नाकामी के रूप में लेना बंद कर उसे एक ‘कौशल’ मानना शुरू कर दिया है। हमारे लिए कर चोरी करने वाला कारोबारी स्मार्ट, ऊपरी कमाई करने वाला सरकारी कर्मचारी ‘पूरी तरह सेटल्ड’ और कानूनी विसंगतियों का फायदा उठाकर काम निकालने वाला संसाधन-संपन्न माना जाता है। निजी जीवन में ही इसके तमाम उदाहरण देखने को मिल जाएंगे। जैसे अपनी लड़की के विवाह के लिए लिए सरकारी नौकरीपेशा लड़का खोज रहे अभिभावक लड़के की ‘ऊपरी कमाई’ के बारे में पूछताछ को लेकर शायद ही झिझकते हों।

अक्सर हम धार्मिकता और नैतिकता को एक दूसरे का पर्याय मान लेते हैं, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। धर्म के प्रति अतिशय आस्था रखने वाला व्यक्ति भी दैनंदिन जीवन में बेईमानी कर सकता है। भारतीय समाज में नैतिकता की पूर्ति के लिए धर्म का सहारा लेने की एक विचित्र परिपाटी विकसित हो गई है। मतलब चाहे कारोबारी धोखाधड़ी हो या कमजोर लोगों का शोषण, ऐसा कोई भी ‘पाप’ करो और किसी मंदिर को चंदा भेजकर स्वयं का आध्यात्मिक शुद्धीकरण समझ लो। मानो भगवान ने कोई ‘पाप-पुण्य समायोजन सेवा’ चला रखी हो कि भगवान को दी गई ‘रिश्वत’ से आपकी बेईमानी में ईमानदारी का भाव घोल दिया जाएगा। राम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण ने ऐसी ही तमाम धारणाओं को ध्वस्त किया है। जब धर्म के आवरण वाले परिसर में भी लोभ पर नियंत्रण न रह जाए तो समझिए कि समस्या चरित्र में खोट की अधिक है और इसका समाधान भी अपेक्षाकृत अधिक कठिनाई भरा है।

कुछ लोग यह दलील दे सकते हैं कि भ्रष्टाचार तो हर जगह है। अन्य धर्मों, संस्थानों और देशों में भी ऐसे प्रकरण सामने आते रहते हैं। मान लिया कि यह भी सही है, लेकिन इससे क्या साबित होता है? कहीं और भ्रष्टाचार होने से यहां के भ्रष्टाचार का मामला कम शर्मनाक नहीं हो जाता। इसे हिंदू बनाम गैर-हिंदू का मुद्दा भी न बनाया जाए। इस मामले में जो आरोपित हैं, वे बाहर से आए हमलावर नहीं, बल्कि भीतर बैठे वे लोग हैं, जिन पर यहां सेवा एवं संचालन का दायित्व था।

इस प्रकरण से यही सीख मिलती है कि एक संस्थान केवल विश्वास के भरोसे ही न रहे। हमारी समस्या यह भी है कि हम कुछ लोगों पर आवश्यकता से अधिक भरोसा कर उन्हें तमाम बुराइयों से परे मान लेते हैं। वास्तव में हमें प्रभावी तंत्र विकसित करने चाहिए। ऐसा नहीं है कि लोग बुरे होते हैं, लेकिन यह भी न भूला जाए कि मनुष्य अंतत: मनुष्य ही होता है और उसके साथ गलतियों की गुंजाइश बनी रहती है। यह बात काफी हद तक सही है कि सभी भारतीय एक जैसे नहीं, लेकिन यह भी उतनी ही सही है कि अधिकांश तो ऐसे ही मिल जाएंगे।

हम हिंदुओं के लिए यह बहुत पीड़ा देने वाला प्रकरण है। हममें से तमाम लोगों ने धर्म को प्रतीकों, पहचान और कर्मकांडों तक सीमित कर लिया है। धर्म मंत्रोच्चार, तीर्थाटन और दान तक ही सीमित नहीं है। धर्म का मर्म तो व्यक्ति के चरित्र से निर्धारित होता है कि आप कैसे धनार्जन करते हैं? कैसे लोगों से व्यवहार करते हैं? जब गलत कार्य करना बहुत आसान लगता हो तो स्वयं को उस राह पर फिसलने से कैसे बचाते हैं? जब कोई न देख रहा हो तो स्वयं को कैसे संचालित करते हैं? याद रहे कि हमारे चरित्र में खोट हो तो घंटों पूजा-पाठ का कोई अर्थ नहीं रह जाता। संभव है कि चढ़ावा चोरी प्रकरण से प्रभु श्रीराम ने हमें संभलने का एक अवसर दिया हो कि न केवल मंदिर परिसर में गड़बड़ियों को दूर किया जाए, बल्कि हम स्वयं एवं समाज को सुधारने के लिए भी प्रयासरत रहें।

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