सऊदी अरब और ईरान के बीच क्या हैं मतभेद? दोनों के बीच लगी है हथियारों की होड़

सऊदी अरब और ईरान पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) की दो सबसे प्रभावशाली शक्तियां हैं. दोनों के बीच दशकों पुरानी प्रतिद्वंद्विता देखने को मिलती है. यह मात्र धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीति, क्षेत्रीय प्रभाव, सुरक्षा और सैन्य शक्ति से भी जुड़ी है. विशेषज्ञ इसे अक्सर “मिडिल ईस्ट की शीत युद्ध जैसी प्रतिस्पर्धा” कहते हैं. […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शनिवार, 18 जुलाई 2026, 09:37 AM 6 मिनट read
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सऊदी अरब और ईरान के बीच क्या हैं मतभेद? दोनों के बीच लगी है हथियारों की होड़
Photo: UB India News Archive

सऊदी अरब और ईरान पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) की दो सबसे प्रभावशाली शक्तियां हैं. दोनों के बीच दशकों पुरानी प्रतिद्वंद्विता देखने को मिलती है. यह मात्र धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीति, क्षेत्रीय प्रभाव, सुरक्षा और सैन्य शक्ति से भी जुड़ी है. विशेषज्ञ इसे अक्सर “मिडिल ईस्ट की शीत युद्ध जैसी प्रतिस्पर्धा” कहते हैं. आपको बता दें कि सऊदी अरब खुद को सुन्नी इस्लाम का प्रमुख केंद्र मानता है. ईरान शिया इस्लाम का सबसे बड़ा और प्रभावशाली देश रहा है. सुन्नी-शिया में काफी मतभेद रहे हैं, मगर अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि आज की प्रतिद्वंद्विता मुख्य रूप से भू-राजनीतिक (Geopolitical) है, केवल धार्मिक नहीं.

क्षेत्रीय वर्चस्व की होड़

दोनों देश मध्य पूर्व में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं. इसी कारण वे कई देशों में अलग-अलग पक्षों का समर्थन करते रहे हैं.

यमन: सऊदी अरब ने सरकार समर्थक गठबंधन का समर्थन किया, जबकि ईरान पर हूती विद्रोहियों का समर्थन करने का आरोप लगते रहे हैं.

सीरिया: ईरान ने राष्ट्रपति बशर अल-असद का समर्थन किया है. वहीं सऊदी अरब ने  विभिन्न विरोधी समूहों का समर्थन किया. लेबनान और इराक में दोनों का प्रभाव अलग-अलग राजनीतिक और सशस्त्र समूहों के जरिए से देखा जाता है.

1979 की ईरानी क्रांति

ईरान की इस्लामी क्रांति के बाद वहां एक शिया इस्लामी गणराज्य बना. इसके बाद दोनों देशों के संबंध तेजी से खराब होने लगे. इसकी वजह है कि सऊदी नेतृत्व को लगा कि  ईरान क्षेत्र में अपनी राजनीतिक और वैचारिक पकड़ को बनाना चाहता है.

दोनों के बीच मची हथियारों की होड़

दोनों देश अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखने के लिए लगातार सैन्य क्षमताएं बढ़ाते रहे हैं. सऊदी अरब की बात की बात की जाए तो वह ईरान को टक्कर देने के लिए हथियारों की होड़ में लगा है. इसके लिए आधुनिक लडाकू विमान, मिसाइल रक्षा प्रणाली और अत्या​धुनक हथियारों पर भारी निवेश करता है. उसका रक्षा बजट दुनिया के सबसे बड़े बजटों में  शामिल रहा है.

ईरान: लंबे वक्त से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना करने की वजह से उसने घरेलू रक्षा उद्योग को काफी विकसित किया. बैलिस्टिक मिसाइलों, ड्रोन और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों (प्रॉक्सी नेटवर्क) पर विशेष जोर दिया है.

क्या अब रिश्ते सुधर रहे हैं?

मार्च 2023 में दोनों देशों ने चीन की मध्यस्थता में राजनयिक संबंध बहाल करने पर सहमति जताई और दूतावास फिर से खोलने की प्रक्रिया शुरू की. इससे तनाव कुछ कम हुआ, लेकिन कई क्षेत्रीय इलाकों पर प्रतिस्पर्धा पूरी तरह खत्म नहीं हुई.

सऊदी अरब और ईरान का इतिहास केवल दो देशों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह मध्य पूर्व की राजनीति, धर्म औ शक्ति-संतुलन की कहनी की तरह है.

1. शुरुआती संबंध (1929–1979)

सऊदी अरब और ईरान ने 1929 में औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए. उस वक्त ईरान में शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन था. दोनों देशों के रिश्ते सामान्य थे. दोनों देश पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका के सहयोगी माने जाते थे.

2. 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति

ईरान में वर्ष 1979 में इस्लामी क्रांति हुई थी. शाह का शासन खत्म हो गया था. Ruhollah Khomeini की अगुवाई में एक इस्लामी गणराज्य स्थापित हुआ.

सऊदी अरब सुन्नी मुस्लिम बहुल देश में गिना जाता है. ईरान शिया मुस्लिम बहुल देश है. ईरान ने इस्लामी क्रांति के विचारों को अन्य देशों तक फैलाने की बात कही है. इससे सऊदी अरब चिंतित है.

3. क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता

दोनों देशों ने सीधे युद्ध नहीं लड़ा, मगर कई देशों में अलग-अलग पक्षों का समर्थन किया.
इराक में अलग-अलग राजनीतिक और सशस्त्र समूहों का समर्थन है. सीरिया में ईरान ने सरकार का समर्थन किया, जबकि सऊदी अरब ने कई विद्रोही समूहों का समर्थन किया.
यमन में सऊदी अरब ने सरकार समर्थित गठबंधन का नेतृत्व किया. वहीं ईरान पर हूती आंदोलन का समर्थन करने के आरोप लगे. लेबनान में ईरान का समर्थन Hezbollah     को और सऊदी अरब का समर्थन उसके विरोधी राजनीतिक गुटों को माना जाता रहा.

4. 2016 का बड़ा विवाद

2016 में सऊदी अरब ने शिया धर्मगुरु Nimral-Nimr को फांसी दी. इसके बाद ईरान में प्रदर्शनकारियों ने सऊदी दूतावास पर हमला किया. सऊदी अरब ने ईरान से राजनयिक  संबंध तोड़ दिए.

5. 2023 में मेल-मिलाप

मार्च 2023 में चीन की मध्यस्थता से दोनों देशों ने संबंध बहाल करने और दूतावास फिर से खोलने पर सहमत हो गए. यह मध्य पूर्व की राजनीति में बड़ा बदलाव माना गया.

अलग-अलग पक्षों का समर्थन

दोनों देशों के बीच टेंशन की वजह कई कारण रहे हैं. धार्मिक नेतृत्व (सुन्नी बनाम शिया) मध्य पूर्व में राजनीतिक और सामरिक प्रभाव बढ़ाने की होड़ रही है. तेल और ऊर्जा से जुड़ी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा विभिन्न क्षेत्रीय संघर्षों में अलग-अलग पक्षों का समर्थन कर रही है. हालांकि दोनों देशों के बीच लंबे वक्त से तनाव रहा है. समय-समय पर संवाद और संबंध सुधारने के प्रयास भी हुए हैं. हाल के वर्षों में कई क्षेत्रों में तनाव फिर बढ़ा है, विशेषकर यमन से जुड़े घटनाक्रमों के कारण.

FAQ: सऊदी अरब और ईरान विवाद

1. सऊदी अरब और ईरान में दुश्मनी क्यों है?

दोनों देशों के बीच तनाव की मुख्य वजह मध्य पूर्व में नेतृत्व और प्रभाव स्थापित करने की होड़ है। धार्मिक मतभेद (सुन्नी और शिया) इसकी एक वजह जरूर हैं, लेकिन वर्तमान समय में सबसे बड़ा कारण क्षेत्रीय वर्चस्व, सुरक्षा और राजनीतिक प्रभाव है।

2. क्या यह केवल सुन्नी और शिया का विवाद है?

नहीं। हालांकि सऊदी अरब खुद को सुन्नी इस्लाम का प्रमुख केंद्र मानता है और ईरान दुनिया का सबसे प्रभावशाली शिया बहुल देश है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि आज दोनों देशों की प्रतिस्पर्धा मुख्य रूप से भू-राजनीतिक है। धर्म इस प्रतिद्वंद्विता का एक महत्वपूर्ण पहलू है, लेकिन यह अकेला कारण नहीं है।

3. 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति क्यों अहम मानी जाती है?

1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई, जिसके बाद शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन समाप्त हो गया और अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई।

यहीं से दोनों देशों के संबंध तेजी से खराब होने लगे। सऊदी अरब को आशंका थी कि ईरान अपनी नई वैचारिक और राजनीतिक व्यवस्था का प्रभाव पूरे क्षेत्र में बढ़ाना चाहता है।

4. क्या सऊदी अरब और ईरान ने कभी सीधे युद्ध लड़ा है?

नहीं। दोनों देशों के बीच कभी सीधा युद्ध नहीं हुआ, लेकिन कई देशों में उन्होंने अलग-अलग पक्षों का समर्थन किया। इसे अक्सर “प्रॉक्सी वॉर” (Proxy War) कहा जाता है।

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