आखिर क्यों भाजपा धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा नहीं ले रही ………………….

सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल, कॉकरोच पार्टी का संसद मार्च, छात्रों को रोकने के लिए आंसू गैस के गोले, लाठियां, अफरा-तफरी, कांग्रेस का पीएम आवास के बाहर जोरदार प्रदर्शन और संसद में विपक्ष का हंगामा… पूरे विरोध प्रदर्शन की सिर्फ एक ही मांग है कि धर्मेंद्र प्रधान शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा दें. लेकिन […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
बुधवार, 22 जुलाई 2026, 10:25 AM 5 मिनट read
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आखिर क्यों भाजपा धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा नहीं ले रही  ………………….
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सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल, कॉकरोच पार्टी का संसद मार्च, छात्रों को रोकने के लिए आंसू गैस के गोले, लाठियां, अफरा-तफरी, कांग्रेस का पीएम आवास के बाहर जोरदार प्रदर्शन और संसद में विपक्ष का हंगामा… पूरे विरोध प्रदर्शन की सिर्फ एक ही मांग है कि धर्मेंद्र प्रधान शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा दें. लेकिन धर्मेंद्र प्रधान अब भी शिक्षा मंत्री की कुर्सी पर विराजमान है.

ऐसे में लोगों के मन में कई सवाल कौंध रहे हैं. हर व्यक्ति इस वक्त यही सोच रहा है कि आखिर क्यों प्रधानमंत्री मोदी या फिर भाजपा धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा नहीं ले रही है, वह भी तब, जब धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेने से पूरे विरोध प्रदर्शन के खत्म होने के पूरे चांस है. आइये जानते हैं इसी सवाल का जवाब…

भाजपा धर्मेंद्र प्रधान को नहीं हटा रही है, इसकी चार वजहें सबसे बड़ी हैं, आइये सिलसिलेवार ढंग से जानते हैं, एक-एक वजह…

पहली वजह- सरकार दबाव में झुकी है, ये नैरेटिव बनने का खतरा है
सरकार ये नैरेटिव बिल्कुल नहीं बनने देना चाहती है कि सरकार दबाव में झुक गई है. दबाव में झुकने की वजह से UPA सरकार को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी. मोदी सरकार उसी से सबक ले रही है. वरिष्ठ पत्रकारों की मानें तो यूपीए के दौर में अशोक चव्हाण से शुरू हुआ इस्तीफों का दौर कई मंत्रियों को ले डूबा था. यूपीए सरकार दबाव संभाल नहीं पाई और उसकी छवि बिगड़ती चली गई. एक्सपर्ट्स का कहना है कि सरकार ने अगर धर्मेंद्र से इस्तीफा लिया तो संदेश जाएगा कि सरकार से गलती हुई है. मोदी सरकार किसी भी प्रकार से ये नहीं दिखाना चाहती की उसने किसी दबाव में अपने मंत्री का इस्तीफा लिया.

सरकार इसी वजह से शुरुआत से कह रही है कि वे सिस्टम सुधार रहे हैं. सरकार ने नीट 2026 पेपर लीक केस में सीबीआई, राजस्थान एसओजी और राज्य पुलिसों से जांच करवा रही है. NTA में सरकार ने 2 जॉइंट सेक्रेटरी- अनुजा बापट, रुचिरा विज और 2 नए जॉइंट डायरेक्टर आकाश जैन, आदित्य राजेंद्र भोजगढिया को एजेंसी में भेजा है.

दूसरी वजह- मोदी सरकार में इस्तीफा न होने की अघोषित नीति
मोदी सरकार में सिर्फ आरोप लगने मात्र से मंत्रियों के इस्तीफे की परंपरा नहीं होते हैं. साल 2015 में तत्कालीन विदेश मंत्री और तत्कालीन राजस्थान सीएम वसुंधरा राजे पर ललित मोदी को विदेश भेजने के आरोप लगे. विपक्ष ने इस्तीफे की मांग की. मामले में तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि एनजीए सरकार में सिर्फ आरोपों के आधार पर मंत्रियों से इस्तीफे नहीं लिए जाते हैं. यही फैसला मोदी सरकार की अघोषित नीति बन गई. इसके बाद पूर्व गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी, पूर्व एचआर मिनिस्टर स्मृति ईरानी, रेलवे मंत्री अश्विनी वैष्णव सहित कई मंत्रियों के इस्तीफे की मांग की गई पर हुए किसी के भी नहीं. हालांकि, पूर्व विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर एक अपवाद हैं. मी-टू के वजह से उनको इस्तीफा देना पड़ गया था.

तीसरी वजह- संगठन, सरकार और संघ में प्रधान की मजबूत पकड़
धर्मेंद्र प्रधान भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं. वे पूर्व केंद्रीय मंत्री देवेंद्र प्रधान के बेटे हैं. छात्र जीवन से संघ और एबीवीपी से जुड़े रहे. प्रधान 1998 से भाजपा में एक्टिव हैं. अपने लंबे कार्यकाल में उन्होंने कई अहम जिम्मेदारियों को संभाला है. मोदी सरकार की फ्लैगशिप स्कीम प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना को जमीन में उतारने और उसे सफल बनाने में प्रधान ने अहम जिम्मेदारी निभाई. धर्मेंद्र एक लो-प्रोफाइल और गंभीर नेता के रूप में देखा जाता है.

चौथी वजह- आंदोलन और सरकार का राजनीतिक आकलन
राजनीतिक एक्सपर्ट्स का मानना है कि केंद्र सरकार किसी भी आंदोलन पर फैसला लेने से पहले उसके राजनीतिक प्रभाव, और जनसमर्थन का आंकलन करती है. अगर उसे किसी मुद्दे का बड़े स्तर पर असर नहीं दिखता है तो सरकार आमतौर पर तत्काल दबाव में फैसला नहीं लेती है. सरकार पहले ये देखती है कि किसी आंदोलन से जनता में कितनी नाराजगी है. चुनावी रणनीति पर कितना असर पड़ सकता है. उनका कहना है कि अगर किसी आंदोलन का प्रभाव व्यापक हो जाता है तो सरकार पर दबाव पड़ जाता है.

क्या धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की संभावना है?
विरोध प्रदर्शनों के बाद धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग फिर चर्चा में है. आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधियों ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा से मुलाकात करके अपनी मांगें रखी, जिनमें धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी शामिल है. इस पर सरकार की ओर से नेतृत्व स्तर पर चर्चा का आश्वासन दिया गया.

राजनीतिक एक्सपर्ट्स का मानना है कि सरकार किसी भी निर्णय से पहले संभावित राजनीतिक लाभ-हानि का आकलन करेगी. 2020-21 के किसान आंदोलन का उदाहरण अक्सर दिया जाता है, जब लंबे विरोध के बाद केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानून वापस लेने का फैसला किया था.

सरकार के सामने संभावित विकल्प
यदि भविष्य में मंत्रिमंडल या संगठन में फेरबदल होता है, तो राजनीतिक जानकारों के अनुसार धर्मेंद्र प्रधान को लेकर कुछ संभावित विकल्प हो सकते हैं—

उन्हें सरकार से संगठन की जिम्मेदारी में भेजा जा सकता है.

शिक्षा मंत्रालय के स्थान पर किसी अन्य मंत्रालय का दायित्व सौंपा जा सकता है.

ऐसा पहले भी हो चुका है. 2017 में तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने रेल हादसों के बाद इस्तीफे की पेशकश की थी. हालांकि सरकार ने तत्काल इस्तीफा स्वीकार नहीं किया और बाद में मंत्रिमंडल फेरबदल के दौरान उन्हें वाणिज्य मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी.

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