आजादी की रात 11 बजे की वो आवाज!

15 अगस्त 2026 को लाल किले की प्राचीर से जब ‘वंदे मातरम्’ गूंजेगा, तो इसे स्वतंत्रता दिवस के इतिहास में पहली बार होने वाली घटना के तौर पर याद किया जाएगा। पहली बार देश के स्वतंत्रता दिवस समारोह में लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब लगातार 13वें साल तिरंगा फहराएंगे तो इससे […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शुक्रवार, 14 अगस्त 2026, 10:03 AM 7 मिनट read
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आजादी की रात 11 बजे की वो आवाज!
Photo: UB India News Archive

15 अगस्त 2026 को लाल किले की प्राचीर से जब ‘वंदे मातरम्’ गूंजेगा, तो इसे स्वतंत्रता दिवस के इतिहास में पहली बार होने वाली घटना के तौर पर याद किया जाएगा। पहली बार देश के स्वतंत्रता दिवस समारोह में लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब लगातार 13वें साल तिरंगा फहराएंगे तो इससे पहले राष्ट्रगीत की प्रस्तुति होगी।

लेकिन इस कहानी में एक ऐसा पन्ना है, जिसके बारे में शायद बहुत कम लोगों को पता है। आजादी के ठीक 79 साल पहले भी ‘वंदे मातरम्’ ही उस ऐतिहासिक रात की पहली आवाज बना था।

तारीख थी 14 अगस्त 1947। वक्त रात के 11 बजे। दिल्ली में हर तरफ एक बेचैनी थी। कुछ घंटों बाद भारत आजाद होने वाला था। संसद भवन का सेंट्रल हॉल रोशनी से जगमगा रहा था और संविधान सभा के सदस्य उस ऐतिहासिक क्षण के इंतजार में अपनी-अपनी जगह ले रहे थे।”

जिन फ्रेम्स में कुछ दिन पहले तक ब्रिटिश वायसरायों की तस्वीरें लगी थीं, उनमें अब भारतीय तिरंगा दिखाई दे रहा था। लेकिन इसी हॉल में कुछ देर बाद जो भाषण होने वाला था, उसकी तैयारी पर्दे के पीछे कई दिनों से चल रही थी।

जवाहरलाल नेहरू उस भाषण को लेकर बेहद गंभीर थे। वह जानते थे कि आजादी की घोषणा के उस क्षण में बोले गए शब्द सिर्फ उस रात के लिए नहीं होंगे। आने वाली पीढ़ियां उन्हें पढ़ेंगी, सुनेंगी और याद रखेंगी।

नेहरू ने स्पीच से क्यों हटाया ‘Date’ शब्द?

नेहरू के सचिव एम. ओ. मथाई ने बाद में अपनी किताब ‘रेमिनिसेंसेज ऑफ नेहरू एज’  में उस भाषण के बनने की एक दिलचस्प कहानी लिखी। नेहरू ने भाषण का ड्राफ्ट तैयार किया था। जब उसकी टाइप की हुई एक कॉपी मथाई के पास पहुंची तो उनकी नजर शुरुआती पंक्ति पर गई। जहां लिखा था Date with Destiny

मथाई को लगा कि यह शब्द इस ऐतिहासिक अवसर के लिए ठीक नहीं है। उन्होंने रोजेट के इंटरनेशनल थिसॉरस को देखा और फिर नेहरू से बात की।

उनका तर्क था कि अमेरिकी अंग्रेजी में ‘Date’ शब्द का एक ऐसा प्रचलित अर्थ बन चुका था, जो किसी महिला या लड़की के साथ मिलने-जुलने से जुड़ा था। आजादी की घोषणा जैसे गंभीर अवसर के लिए यह शब्द अनचाहा अर्थ पैदा कर सकता था।मथाई ने दो ऑप्शन्स दिए ‘Rendezvous’ या ‘Tryst’

फिर रॉन्डेवू सुनते ही एक और बात सामने आई। मथाई ने नेहरू को बताया कि अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट अपनी एक चर्चित वॉर टाइम स्पीच में रॉन्डेवू शब्द का इस्तेमाल कर चुके थे। नेहरू कुछ क्षण चुप रहे। फिर उन्होंने टाइप किए हुए ड्राफ्ट में ‘Date’ वर्ड काट दिया और उसकी जगह अपने हाथ से लिख दिया ‘Tryst’

Nehru Speech 1

और यही से इस लाइन का जन्म हुआ “A Tryst with Destiny” मथाई के मुताबिक, नेहरू की लिखावट वाला मेन ड्राफ्ट बाद में नेहरू म्यूजियम एंड लाइब्रेरी को सौंप दिया गया। उस मूल Manuscript में ‘Date’ काटकर ‘Tryst’ किए जाने का निशान आज भी मौजूद है।

लेकिन उस वक्त सेंट्रल हॉल में बैठे लोगों को इस शब्द के पीछे की यह छोटी-सी कहानी पता नहीं थी। उनके सामने बस एक बड़ा सवाल था, आधी रात कब होगी?

Sucheta Kriplani

14 अगस्त की रात संविधान सभा का विशेष सत्र शुरू हो चुका था। सुचेता कृपलानी जो कि आगे चलकर देश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी, इन्होंने गीतों के जरिए उस रात को आवाज दी। ‘वंदे मातरम्’ की धुन संसद भवन में गूंजी। अब 2026 में पहली बार यही गीत स्वतंत्रता दिवस के मुख्य समारोह का हिस्सा बनने जा रहा है।

14 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस का कार्यक्रम क्यों शुरू किया?

अभी आपके दिमाग में हो सकता है एक सवाल चल रहा हो कि कार्यक्रम 15 अगस्त की बजाय 14 अगस्त की रात ही शुरू क्यों किया गया। दरअसल, कई ज्योतिषियों ने 15 अगस्त का दिन अशुभ बताया था। इसलिए आजादी के जश्न को 14 अगस्त की रात से शुरू करने का रास्ता निकाला गया।

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हालांकि, 14 अगस्त की रात को कार्यक्रम शुरू होने से पहले कुछ ऐसा हुआ कि जवाहर लाल नेहरू टूट गए। जवाहर लाल नेहरू खाने के टेबल पर बैठे थे। साथ में इंदिरा गांधी, फिरोज गांधी और पद्मजा नायडू भी मौजूद थे। बगल के कमरे में टेलीफोन की घंटी घनघना उठी।

आजादी की रात से पहले नेहरू को किसका कॉल आया?

नेहरू ने फोन उठाया… ट्रंक कॉल की लाइन इतनी खराब थी कि नेहरू ने फोन कर रहे शख्स से कहा कि आपने जो कुछ भी कहा है उसे रिपीट करें। नेहरू ने फोन रखा था उनका चेहरा पीला पड़ गया। उन्होंने इंदिरा गांधी को बताया कि फोन लाहौर से था।

वही लाहौर जहां उनकी मां का बचपन बीता था और जहां नेहरू ने खुद अपने जीवन के शुरुआती सालों का एक हिस्सा बिताया था। वह उस वक्त जल रहा था। शहर पर नए प्रशासन का कब्जा होते ही हिंदू और सिख मोहल्लों की पानी की सप्लाई काट दी गई थी।

जो मां और मासूम बच्चे हलक सुखाने वाली इस प्यास को बुझाने के लिए मजबूरी में घरों से बाहर कदम रखते, उन पर घात लगाए बैठे लोग निशाना साधते और उन्हें चुन-चुनकर मौत के घाट उतार देते।

जब नेहरू बोले- देश को कैसे संबोधित कर पाऊंगा

लगभग फुसफुसाते हुए नेहरू ने टूटे मन से कहा, ‘मैं आज रात इस देश को कैसे संबोधित कर पाऊंगा? मैं दुनिया के सामने यह कैसे जता पाऊंगा कि मैं इस देश की आजादी पर खुश हूं… जब मुझे मालूम है कि मेरा लाहौर, मेरा खूबसूरत लाहौर इस वक्त धुएं और आग की लपटों में जल रहा है?’

‘वंदे मातरम्’ के बाद अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संबोधन किया, फिर आजादी की लड़ाई में बलिदान देने वालों की याद में मौन रखा गया। आधी रात के करीब जवाहरलाल नेहरू खड़े हुए। उनके सामने वह क्षण था, जिसे लेकर वह घबरा रहे थे, क्योंकि उनके दिमाग में लाहौर चल रहा था।

अब सेंट्रल हॉल में सभी की निगाहें नेहरू पर थीं।

आजादी के बाद नेहरू की पहली स्पीच

घड़ी आधी रात की तरफ बढ़ रही थी। ब्रिटिश राज का अंत अब सिर्फ कुछ मिनट दूर था। नेहरू खड़े हुए और उन्होंने बोलना शुरू किया। सेंट्रल हॉल में ठीक 11 बजकर 55 मिनट पर नेहरू ने स्पीच पढ़ी।

Nehru Speech

नेहरू अपनी स्पीच में कहते हैं,  बहुत सालों पहले हमने नियति से एक वादा किया था। आधी रात के समय जब पूरी दुनिया सो रही है, भारत आजादी की सांस ले रहा है।’

हालांकि, स्पीच के बाद नेहरू ने अपनी बहन विजयलक्ष्मी से इस बात को लेकर चर्चा भी की। उन्होंने कहा उस रात उनके दिमाग में अपने भाषण के शब्द नहीं घूम रहे थे। जो लबों से निकला वो बोलते गए।

माउंटबेटन को नेहरू ने थमा दिया खाली लिफाफा

इसके बाद एक किस्सा और है… समारोह के बाद जवाहरलाल नेहरू और राजेंद्र प्रसाद लॉर्ड माउंटबेटन को औपचारिक रूप से भारत के पहले गवर्नर जनरल बनने का न्योता देने पहुंचे। इस दौरान नेहरू ने गवर्नर-जनरल के हाथ में एक लिफाफा सौंपा। नेहरू और राजेंद्र प्रसाद के जाने के बाद जब माउंटबेटन ने लिफाफा खोला तो उनकी हंसी निकल गई क्योंकि वो खाली था

Mountbettan and Nehru

इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी किताब ‘इंडिया ऑफ्टर गांधी’ में लिखते हैं, ‘नेहरू ने जब गवर्नर-जनरल के पास सूची देने पहुंचे तो के अजीब सी स्थिति पैदा हो गई। नेहरू ने जो लिफाफा गवर्नर-जनरल को दिया वो खाली था। हालांकि, शपथ ग्रहण की सेरेमनी शुरू होने तक खोई हुई मंत्रियों की लिस्ट वापस मिल गई।

इस सूची में प्रधानमंत्री नेहरू के अलावा 13 अन्य मंत्रियों के नाम थे। सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे प्रमुख नाम देश की पहली कैबिनेट में शामिल थे।

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