आजादी के बाद से अबतक भारत कैसे बना दुनिया का सबसे बड़ा चुनावी सिस्टम?

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने वाले भारत में लोकसभा, विधानसभा, राज्यसभा, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव के साथ-साथ बड़ी संख्या में उपचुनाव होते हैं. इसके अलावा पंचायत और नगर निकाय चुनाव कराए जाते हैं, जिसकी जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग की होती है.इसका अर्थ है कि भारत में चुनाव सिर्फ पांच साल में एक बार […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शनिवार, 15 अगस्त 2026, 05:41 AM 5 मिनट read
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आजादी के बाद से अबतक भारत कैसे बना दुनिया का सबसे बड़ा चुनावी सिस्टम?
Photo: UB India News Archive

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने वाले भारत में लोकसभा, विधानसभा, राज्यसभा, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव के साथ-साथ बड़ी संख्या में उपचुनाव होते हैं. इसके अलावा पंचायत और नगर निकाय चुनाव कराए जाते हैं, जिसकी जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग की होती है.इसका अर्थ है कि भारत में चुनाव सिर्फ पांच साल में एक बार होने वाली प्रक्रिया नहीं, बल्कि लगभग पूरे साल चलने वाली विशाल संवैधानिक व्यवस्था है.

भारत का पहला आम चुनाव 1951-52 में हुआ. तब देश की चुनावी व्यवस्था आज के मुकाबले बेहद छोटी थी, लेकिन उस समय के हिसाब से यह भी बहुत बड़ी चुनौती थी. पहली लोकसभा के चुनाव में कुल 17.32 करोड़ मतदाता थे. लोकसभा के लिए 489 सीटें थीं और 401 निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव हुआ. करीब 10.60 करोड़ वोट पड़े और मतदान प्रतिशत 44.87% रहा.

भारत के चुनावी सिस्टम 76 सालों के दौरान क्या-क्या बदला?

  • 2024 के लोकसभा चुनाव के समय देश में 96.98 करोड़ मतदाता थे.
  • यानी सात दशक से कुछ ज्यादा समय में मतदाताओं की संख्या करीब 5.6 गुना बढ़ गई.
  • 2024 में 64.64 करोड़ वोट पड़े.
  • 1951 में भारत की आबादी करीब 36 करोड़ थी और चुनाव में 17.32 करोड़ मतदाता थे.
  • आज मतदाता संख्या करीब 97 करोड़ पहुंच चुकी है. यह सिर्फ जनसंख्या बढ़ने की कहानी नहीं है.
  • भारत ने लगातार मतदाता सूची का विस्तार किया, नए मतदाताओं को जोड़ा और चुनावी प्रक्रिया को ज्यादा व्यापक बनाया.
  • 1951 में 489 लोकसभा सीटों का चुनाव हुआ था, जबकि आज लोकसभा में 543 निर्वाचित सीटों के लिए चुनाव होता है.
  • 1951 के चुनाव में एक लोकसभा सीट पर औसतन कुछ लाख मतदाता थे.
  • आज कई निर्वाचन क्षेत्रों में यह संख्या 15-20 लाख या उससे भी अधिक है.
  • 2024 में देश में 10.48 लाख से ज्यादा मतदान केंद्र थे. यानी 1951 की तुलना में चुनावी ढांचा कई गुना बड़ा हो चुका है.

भारत में किस-किस तरह के चुनाव होते हैं?

भारत का चुनावी सिस्टम सिर्फ लोकसभा चुनाव तक सीमित नहीं है. निर्वाचन आयोग लोकसभा के अलावा राज्य विधानसभाओं, राज्यसभा, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव कराता है. फिर भी चुनावी कैलेंडर खत्म नहीं होता. किसी विधायक या सांसद के इस्तीफे, निधन या अयोग्यता से सीट खाली होने पर उपचुनाव कराया जाता है. इसका साफ मतलब हुआ भारत में सिर्फ साल भर में एक चुनाव नहीं होते हैं, बल्कि चुनावों का पूरा साल होता है.

हालांकि, भारत में चुनावों की स्थिति देखते हुए यह आंकलन करना सही नहीं होगी कि निर्वाचन आयोग हर साल कितने चुनाव कराता है. चुनावों की संख्या साल-दर-साल बदलती है. किसी साल कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होते हैं, किसी साल लोकसभा चुनाव होता है. किसी साल सिर्फ कुछ राज्यों के चुनाव और उपचुनाव होते हैं. एक तरीके से यह कह सकते हैं कि भारत में चुनावी गतिविधियां लगभग हर साल और कई बार पूरे साल चलती रहती हैं.

EVM ने कैसे बदली बदली चुनाव की रफ्तार?

शुरुआती चुनावों में मतपत्र और मतपेटियां इस्तेमाल होती थीं. धीरे-धीरे इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM भारतीय चुनाव व्यवस्था का अहम हिस्सा बनी. इससे मतदान और मतगणना की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव आया. आज EVM और VVPAT के साथ चुनाव कराए जाते हैं. करोड़ों मतदाताओं के लिए मशीनें तैयार करना, उन्हें सुरक्षित रखना, मतदान केंद्रों तक पहुंचाना, मतदान कर्मचारियों की तैनाती करना और फिर मशीनों को स्ट्रॉन्ग रूम तक पहुंचाना. यह अपने आप में दुनिया के सबसे बड़े चुनावी लॉजिस्टिक्स ऑपरेशनों में से एक है. इसके अलावा जहां बैलेट बॉक्स से वोटिंग और काउंटिंग में समय लगता है, इवीएम के चलते इसमें आसानी जरूरी हुई है.

प्रशासन के सामने चुनाव के दौरान क्या चुनौती होती है?

भारत के चुनाव की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ मतदाताओं की संख्या नहीं है. इसके लिए लाखों मतदान केंद्र, चुनाव कर्मचारी, सुरक्षा बल, पर्यवेक्षक, वाहन, EVM-VVPAT, संचार व्यवस्था और मतगणना केंद्रों की जरूरत पड़ती है.यानी चुनाव आयोग को एक साथ देश के पहाड़ी इलाकों, रेगिस्तान, जंगलों, द्वीपों, बड़े महानगरों और दूरदराज के गांवों तक मतदान की व्यवस्था पहुंचानी होती है. साथ ही चुनावों के दौरान किसी तरह की अव्यवस्था ना हो इसकी भी जिम्मेदारी रखनी होती है.

भारत में दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी मशीनरी

भारत का चुनावी सिस्टम दुनिया में सबसे बड़ा सिर्फ इसलिए नहीं है कि यहां सबसे ज्यादा मतदाता हैं. इसकी असली ताकत यह है कि एक ही संवैधानिक ढांचे के तहत इतने बड़े और विविध देश में लगातार अलग-अलग स्तरों पर चुनाव कराए जाते हैं. सात दशकों में भारत ने सिर्फ मतदाताओं की संख्या नहीं बढ़ाई, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी मशीनरी खड़ी कर, इसे एक विशाल नेटवर्क के तौर पर स्थापित किया है.

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