आजादी के 80 साल : कितना बदल गया भारत , भारत की रणनीतिक गलतियां, जिनका असर आज भी दिखता है…..

आज हम अपने देश का 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं. आज लाल किले की प्राचीर से पीएम मोदी ने डिफेंस और आत्मनिर्भरता को लेकर खास तौर पर भारत की बढ़ती रक्षा उत्पादन क्षमता का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि पिछले 12 वर्षों में भारत का रक्षा प्रोडक्शन लगभग चार गुना हो गया है. उन्होंने इसे आत्मनिर्भर […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शनिवार, 15 अगस्त 2026, 05:43 AM 10 मिनट read
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आजादी के 80 साल :  कितना बदल गया भारत , भारत की रणनीतिक गलतियां, जिनका असर आज भी दिखता है…..
Photo: UB India News Archive

आज हम अपने देश का 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं. आज लाल किले की प्राचीर से पीएम मोदी ने डिफेंस और आत्मनिर्भरता को लेकर खास तौर पर भारत की बढ़ती रक्षा उत्पादन क्षमता का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि पिछले 12 वर्षों में भारत का रक्षा प्रोडक्शन लगभग चार गुना हो गया है. उन्होंने इसे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा बदलाव बताते हुए कहा कि भारत अब अपनी क्षमताओं के दम पर आगे बढ़ रहा है. पीएम ने Make in India, Swadeshi और Vocal for Local को विकसित भारत के लक्ष्य से जोड़ा और देशवासियों से स्वदेशी को बढ़ावा देने की अपील की. लेकिन यहां आपको बता दें कि आजादी के वक्त भारत के पास न तो अपनी मिसाइल थी न लड़ाकू विमान बनाने की ताकत. ज्यादातर हथियार बाहर से मंगाए जाते थे और सेना पुराने ढंग की पैदल-टुकड़ियों और टैंकों पर टिकी थी.

सीधी लड़ाई की नौबत आए तो जमीन पर टैंकों की गिनती से ज्यादा मायने रखेंगे वो हथियार जो हवा में ऊंचाई पर और रडार की पहुंच से परे काम करते हैं. आइए समझते हैं कि आज की तारीख में भारत के पास वो कौन से 5 हथियार हैं जो किसी संभावित टकराव का असली नतीजा तय कर सकते हैं. जानकारी के मुताबिक मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर ने इंडिया ने पूरी दुनिया को इसकी एक झलक भी दिखा दी थी. बता दें उस ऑपरेशन में पाक को पछाड़ने में जिन हथियारों ने असली फर्क डाला वे टैंक नहीं बल्कि मिसाइलें, फाइटर जेट और एयर डिफेंस सिस्टम थे.

S400

1. S-400 ‘सुदर्शन चक्र’… आसमान की सबसे मजबूत दीवार

जानकारी के मुताबिक रूस से खरीदा गया S-400 एयर डिफेंस सिस्टम भारत की सबसे भरोसेमंद ढाल बन चुका है. यह सिस्टम एक साथ कई दिशाओं से आ रहे लड़ाकू विमानों, मिसाइलों और ड्रोन को सैकड़ों किलोमीटर दूर ही पहचान लेता है और हवा में ही मार गिराता है. बता दें ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय S-400 एयर डिफेंस सिस्टम और अन्य काउंटर-यूएवी तकनीकों ने पाकिस्तानी हमलों को नाकाम कर दिया था. यही वजह है कि रक्षा विशेषज्ञ इसे भारत की एयर डिफेंस रणनीति की रीढ़ मानते हैं. अगर भविष्य में कोई बड़ा टकराव होता है तो सबसे पहला मुकाबला जमीन पर नहीं बल्कि आसमान में इसी सिस्टम की वजह से तय होगा.

ब्रह्मोस
ब्रह्मोस

2. ब्रह्मोस… वो मिसाइल जिससे थर्रा उठता है दुश्मन

भारत और रूस ने मिलकर जो ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बनाई है वह दुनिया की सबसे तेज क्रूज मिसाइलों में गिनी जाती है. जानकारी के मुताबिक यह ध्वनि की गति से करीब तीन गुना तेज उड़ान भरती है यही वजह है कि इसके वार से दुश्मन के पास बचाव के लिए कोई वक्त नहीं बचता है. बता दें 7 मई 2025 को ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारतीय सेना ने राफेल विमानों से SCALP मिसाइलों और हैमर ग्लाइड बमों का इस्तेमाल करते हुए महज 23 मिनट में पाकिस्तान और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में नौ ठिकानों पर हमला किया. हाल ही में अंडमान में हुए परीक्षण में भी इस मिसाइल ने अपनी सटीकता साबित की है. जमीन, हवा और समुद्र, तीनों जगहों से दागी जा सकने वाली यह मिसाइल किसी भी युद्ध में शुरुआती बढ़त दिलाने का सबसे बड़ा हथियार मानी जाती है.

राफेल फाइटर जेट
राफेल फाइटर जेट

3. राफेल फाइटर जेट… गहरे वार करने की ताकत

एक रिपोर्ट के मुताबिक फ्रांस से आए राफेल लड़ाकू विमानों ने भारतीय वायुसेना को एक नई ताकत दी है. ये विमान अपनी सीमा में रहकर भी दुश्मन के अंदर काफी दूर तक मौजूद ठिकानों को निशाना बना सकते हैं. इसलिए पायलटों को दुश्मन के इलाके में गहराई तक जाने का खतरा नहीं उठाना पड़ता. वहीं, भारत के राफेल फाइटर जेट्स ने SCALP मिसाइल और हैमर बमों की मदद से सीमा पार मौजूद ठिकानों पर सटीक हमले किए और सीमा के बेहद करीब रहकर भी दुश्मन के अंदर गहरे टारगेट्स को निशाना बनाने में सफल रहे जिससे पाकिस्तान के एयर डिफेंस सिस्टम पर भी दबाव बढ़ गया. राफेल के साथ जुड़ी मीटियोर और स्कैल्प जैसी मिसाइलें इसे हवा-से-हवा और हवा-से-जमीन, दोनों तरह की लड़ाई में बेहद खतरनाक बनाती हैं.

आकाश मिसाइल सिस्टम
आकाश मिसाइल सिस्टम

4. आकाश मिसाइल सिस्टम… स्वदेशी ताकत का नमूना

बता दें जहां S-400 विदेशी तकनीक पर टिका है वहीं आकाश पूरी तरह भारत में बना एयर डिफेंस सिस्टम है. यह कम और मध्यम ऊंचाई पर आ रहे विमानों, ड्रोन और मिसाइलों को मार गिराने में माहिर है और इसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है. बताया जाता है कि आकाश हथियार प्रणाली एक साथ कई लक्ष्यों को निशाना बना सकती है और इसमें इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटर माप की सुविधा भी शामिल है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बनी इस बहुस्तरीय रक्षा व्यवस्था ने पाकिस्तानी वायुसेना के हमलों को नाकाम करने में अहम भूमिका निभाई. यही वजह है कि सेना अब सीमा से सटे इलाकों में आकाश की तैनाती लगातार बढ़ा रही है.

Nuclear weapons and Agni missiles
परमाणु हथियार और अग्नि मिसाइलें

5. परमाणु हथियार और अग्नि मिसाइलें… आखिरी और सबसे बड़ी चेतावनी

टैंक, फाइटर जेट या क्रूज मिसाइल से इतर भारत के पास एक ऐसी ताकत भी है जो किसी भी युद्ध की सीमा तय करती है यानी परमाणु हथियार और लंबी दूरी की अग्नि मिसाइलें. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) की 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के पास पाकिस्तान से करीब 20 परमाणु हथियार ज्यादा हैं हालांकि दोनों देश लगातार अपने परमाणु जखीरे को आधुनिक बना रहे हैं. बता दें भारत की खासियत यह है कि उसकी परमाणु ताकत सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं है. अगर दुश्मन जमीन पर मौजूद मिसाइल ठिकानों और हवाई अड्डों को निशाना बनाए तब भी समुद्र में तैनात पनडुब्बियां जवाबी हमला कर सकती हैं और यही किसी देश की असली परमाणु सुरक्षा मानी जाती है. यह क्षमता किसी भी संभावित टकराव को बड़े स्तर पर बढ़ने से रोकने वाला सबसे बड़ा दबाव बिंदु बनी रहती है.

रक्षा बजट में भी भारत काफी आगे

हथियारों के अलावा पैसा भी युद्ध की तैयारी में बड़ा रोल निभाता है. सिपरी के मुताबिक 2025 में भारत का रक्षा खर्च बढ़कर 92.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया जो पिछले साल से 8.9 प्रतिशत ज्यादा है और इसके साथ भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश बना हुआ है जबकि पाकिस्तान दुनिया के टॉप 15 देशों की सूची में भी शामिल नहीं है. यह फर्क बताता है कि आने वाले सालों में भी भारत की सैन्य आधुनिकीकरण की रफ्तार पाकिस्तान से काफी तेज बनी रहेगी।

 

भारत की रणनीतिक गलतियां :

भारत ने अपनी आजादी के बाद से पिछले आठ दशकों (लगभग 80 वर्षों) में कई शानदार उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन कूटनीति, रक्षा और विदेश नीति के मोर्चे पर कुछ ऐसी ऐतिहासिक और रणनीतिक गलतियां भी हुईं, जिनका खामियाजा देश आज तक भुगत रहा है.

कश्मीर का अनसुलझा मुद्दा

भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्धों के दौरान भारतीय सेना ने अदम्य साहस का परिचय दिया था. एक समय ऐसा भी आया जब भारतीय फौजों ने दुश्मन को पछाड़ते हुए लाहौर के बाहरी इलाकों तक कदम रख दिए थे. सामरिक जानकारों का मानना है कि सैन्य मोर्चे पर मिली इस विशाल बढ़त का इस्तेमाल कूटनीतिक वार्ता की मेज पर किया जाना चाहिए था. लाहौर तक पहुंचने के बाद उस दबाव का उपयोग करके कश्मीर के विवादित हिस्सों को हमेशा के लिए वापस लिया जा सकता था. इस ऐतिहासिक मौके का पूरा सामरिक लाभ न उठा पाना एक बड़ी भूल साबित हुई, जिसके कारण कश्मीर का मुद्दा आज तक एक बड़ी सुरक्षा चुनौती बना हुआ है.

चीन को समझने में भूल और 1962 का युद्ध

आजादी के बाद शुरुआती वर्षों में भारत ने ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ की नीति पर गहरा विश्वास जताया. इस कूटनीतिक आदर्शवाद में चीन की विस्तारवादी नीतियों और उसकी सैन्य तैयारियों को काफी हद तक कम आंका गया. अति-आत्मविश्वास और सीमाओं पर सैन्य बुनियादी ढांचे की कमी के कारण 1962 में भारत को एक कड़वा सच झेलना पड़ा. चीन के अचानक हुए हमले ने न सिर्फ देश को झकझोर दिया, बल्कि भारत को अक्साई चिन जैसा अपना एक बड़ा और अहम भूभाग भी गंवाना पड़ा. इस युद्ध ने एक कठोर सबक दिया कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यथार्थ और सैन्य तैयारियां ही असल सुरक्षा हैं.

आपातकाल का काला अध्याय

साल 1975 में देश में लगाया गया आपातकाल स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे चुनौतीपूर्ण दौर माना जाता है. यह सिर्फ एक राजनीतिक घटनाक्रम नहीं था, बल्कि इसने देश के लोकतांत्रिक ढांचे और विकास को गहरा नुकसान पहुंचाया.  प्रेस की आजादी पर पाबंदी, संस्थाओं के कमजोर होने और अस्थिरता के कारण देश की प्रगति कई साल पीछे चली गई. इस दौर ने सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ आर्थिक नीतियों में भी ऐसा भटकाव पैदा किया, जिसकी भारी कीमत पूरे राष्ट्र को चुकानी पड़ी.

लाइसेंस राज की बेड़ियां

आजादी के बाद दशकों तक भारत की अर्थव्यवस्था सख्त सरकारी नियंत्रण यानी ‘लाइसेंस राज’ की बेड़ियों में जकड़ी रही. उद्योगों को शुरू करने और चलाने के लिए जटिल सरकारी अनुमतियों की आवश्यकता होती थी, जिसने नवाचार और निजी क्षेत्र के विकास को बुरी तरह रोक दिया. जब दुनिया के कई देश तेजी से औद्योगीकरण कर रहे थे, तब भारत आर्थिक रूप से पिछड़ रहा था. यह सिलसिला तब जाकर टूटा जब 1991 में तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने ऐतिहासिक सुधार करते हुए अर्थव्यवस्था के दरवाजे दुनिया के लिए खोले. हालांकि, तब तक देश अपने आर्थिक विकास के कई बहुमूल्य दशक खो चुका था.

रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) में निवेश की कमी

साल 1947 के आसपास भारत और चीन दोनों ने लगभग एक साथ अपनी नई यात्रा शुरू की थी. लेकिन आज दोनों देशों की स्थिति में एक बड़ा अंतर है, जिसका मुख्य कारण अनुसंधान और विकास (R&D) में निवेश की भारी कमी है. चीन ने शुरू से ही तकनीकी नवाचार, विज्ञान और विनिर्माण क्षमता को बढ़ाने के लिए अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा आरएंडडी में लगाया. इसके विपरीत, भारत में अनुसंधान को वह प्राथमिकता और पूंजी नहीं मिल सकी जिसकी आवश्यकता थी. इसी रणनीतिक चूक का नतीजा है कि आज वैश्विक सप्लाई चेन, रक्षा उत्पादन और नई तकनीक के मामले में चीन और भारत के बीच एक बड़ा फासला बन गया है.

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