पूरा क्यों नहीं गाया जाता था वंदे मातरम, किसने हटाए थे बाकी अंतरे?

बीते 15 अगस्त को देश ने अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाया. इस दौरान पीएम मोदी से संबोधन से पहले राष्ट्रगीत वंदे मातरम बजाया गया और फिर पीएम ने राष्ट्रध्वज फहराया जिसके बाद राष्ट्र गान जन गण मन गाया गया. वंदे मातरम की रचना मशहूर लेखक बंकिम चंद्र चटोपाध्याय ने की थी. वंदे मातरम में मूल […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
रविवार, 16 अगस्त 2026, 07:55 AM 5 मिनट read
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पूरा क्यों नहीं गाया जाता था वंदे मातरम, किसने हटाए थे बाकी अंतरे?
Photo: UB India News Archive

बीते 15 अगस्त को देश ने अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाया. इस दौरान पीएम मोदी से संबोधन से पहले राष्ट्रगीत वंदे मातरम बजाया गया और फिर पीएम ने राष्ट्रध्वज फहराया जिसके बाद राष्ट्र गान जन गण मन गाया गया. वंदे मातरम की रचना मशहूर लेखक बंकिम चंद्र चटोपाध्याय ने की थी. वंदे मातरम में मूल तौर पर छह अंतरे हैं, लेकिन लंबे वक्त से सार्वजनिक कार्यक्रमों में इसके पहले दो अंतरे ही गाए जाते हैं. ऐसे में सवाल यह है कि आखिर किसने इसके बाकी के चार अंतरे हटा दिए और इसके पीछे की वजह क्या रही. चलिए समझ लेते हैं.

क्यों छोटा किया गया वंदे मातरम?

बंकिम चंद्र चटोपाध्याय के मूल वंदे मातरम में गीत के शुरुआती दो अंतरे पूरी तरह से भारत माता की प्राकृतिक सुंदरता, हरियाली और मातृभूमिकी वंदना पर आधारित गीत हैं. इसके बाद के अंतरों में देवी दुर्गा, लक्ष्मी और साहित्यिक कृति आनंदमठ के धार्मिक संदर्भ आते हैं. साल 1937 में मुस्लिम लीग और अन्य कई पक्षों ने इन धार्मिक प्रतीकों पर अपनी असहमति जताई थी. तब देश में किसी भी तरह के मतभेद से बचने के लिए और विविधता को बनाए रखने के लिए कांग्रेस ने एक समिति बनाई थी.

किसकी सलाह पर सिर्फ दो अंतरे गाने का हुआ फैसला?

तत्कालीन परिस्थितियों में सर्वसम्मति बनाने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने रवींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी से परामर्श किया था. दोनों नेताओं की सलाह पर यह निर्णय लिया गया कि सार्वजनिक मंचों और राष्ट्रीय आयोजनों में केवल शुरुआती दो पदों का ही इस्तेमाल किया जाएगा, क्योंकि ये पंक्तियां किसी भी धार्मिक प्रतीक से परे पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष थीं. इस कदम का मुख्य उद्देश्य देश के सभी समुदायों को एक साथ जोड़कर रखना और सांप्रदायिक सौहार्द को बनाए रखना था.

1950 में संविधान सभा का ऐतिहासिक कदम

आजादी के बाद वर्ष 1950 में जब भारत का संविधान लागू हुआ, तब संविधान सभा ने राष्ट्रीय प्रतीकों की स्थिति स्पष्ट की. ‘जन गण मन’ को देश का आधिकारिक राष्ट्रगान चुना गया, जबकि ‘वंदे मातरम’ के पहले दो छंदों को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया. उस समय दोनों को समान आदर और स्थान देने की बात कही गई, जिससे देश के सरकारी प्रोटोकॉल में धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय एकता का संतुलन पूरी तरह बना रहे.

संसद से पास हुआ नया संशोधन कानून

अब केंद्र सरकार ने इस ऐतिहासिक गीत को और अधिक सशक्त कानूनी संरक्षण देने के लिए बड़ा कदम उठाया है. पिछले महीने जुलाई 2026 में संसद ने ‘प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर (अमेंडमेंट) बिल, 2026’ को सर्वसम्मति से पारित कर दिया है. इस नए कानून के जरिए ‘वंदे मातरम’ को भी राष्ट्रगान के समान कानूनी ढांचा और सुरक्षा प्रदान कर दी गई है.

अपमान और रुकावट पर सख्त सजा

साल 1971 में बने ‘प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू% नेशनल ऑनर ऐक्ट’ के तहत अब तक मुख्य रूप से राष्ट्रगान के अपमान या उसमें बाधा डालने पर सजा का नियम था. अब 1971 के इस मूल कानून की धारा 2 और 3 में जरूरी संशोधन करके ‘वंदे मातरम’ को भी इसमें जोड़ दिया गया है. नए नियमों के अनुसार, राष्ट्रगीत के गायन के दौरान जानबूझकर किसी भी तरह का शोर मचाना, रुकावट डालना या इसका अपमान करना दंडनीय अपराध की श्रेणी में आएगा.

तो क्या वंदे मातरम न गाने पर हो सकती है जेल?

नए नियमों के लागू होने के बाद लोगों के मन में यह सवाल भी उठा कि क्या राष्ट्रगीत न गाने पर कोई जेल या कानूनी कार्रवाई हो सकती है. इस विषय पर स्थिति पूरी तरह से साफ हो चुकी है. जनवरी 2026 में गृह मंत्रालय द्वारा एक सर्कुलर जारी किया गया था, जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी. 25 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए याचिका को खारिज कर दिया. अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि गृह मंत्रालय का यह आदेश केवल सलाह और मार्गदर्शन के लिए है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वंदे मातरम न गाने पर किसी तरह का आपराधिक मामला दर्ज नहीं होगा और न ही इसके लिए कानून में कोई दंडात्मक प्रावधान रखा गया है.

वंदे मातरम का 150 साल का गौरवशाली सफर

वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं बल्कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे बुलंद आवाज रहा है. इसका इतिहास करीब 150 साल पुराना है. इतिहास के पन्नों में साल 1905 का समय इसके लिए बेहद खास माना जाता है. जब अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया, तो इसके विरोध में पूरा देश सड़क पर उतर आया. 7 अगस्त 1905 को कोलकाता के टाउन हॉल से निकले विशाल जुलूस में हजारों छात्रों और क्रांतिकारियों ने वंदे मातरम के नारे लगाए. इसी ऐतिहासिक आंदोलन के दौरान विदेशी कपड़ों के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने का संकल्प लिया गया था. सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, यह पहला मौका था जब वंदे मातरम अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई का मुख्य नारा बना. इसी साल कांग्रेस के वाराणसी सम्मेलन में इसे राष्ट्रीय आयोजनों के आधिकारिक गीत के रूप में स्वीकार कर लिया गया था.

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