आरक्षण पर आंदोलन को लेकर INDI और NDA के बीच क्यों मचा घमासान…

देश में आजकल फिर से आरक्षण के मुद्दे पर गजब का घमासान मचा हुआ है. एक तरफ जनरल कैटगरी के बहुत सारे लोग हैं, जो कह रहे हैं कि 70 साल हो गए हैं अब आरक्षण पर चर्चा होनी चाहिए, आरक्षण की व्यवस्था में सुधार होना चाहिए. इसके लिए ये लोग आंदोलन कर रहे हैं. […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
मंगलवार, 25 अगस्त 2026, 08:53 AM 16 मिनट read
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आरक्षण पर आंदोलन को लेकर INDI और NDA के बीच क्यों मचा घमासान…
Photo: UB India News Archive
देश में आजकल फिर से आरक्षण के मुद्दे पर गजब का घमासान मचा हुआ है. एक तरफ जनरल कैटगरी के बहुत सारे लोग हैं, जो कह रहे हैं कि 70 साल हो गए हैं अब आरक्षण पर चर्चा होनी चाहिए, आरक्षण की व्यवस्था में सुधार होना चाहिए. इसके लिए ये लोग आंदोलन कर रहे हैं.
लेकिन जैसे ही ये आंदोलन शुरू हुआ, वैसे ही राजनीति में आग लग गई. इधर इंडी और उधर एनडीए के नेताओं के बीच घमासान मच गया. अखिलेश यादव बोलने लगे, चंद्रशेखर बोलने लगे, उधर एनडीए से चिराग पासवान बोल पड़े, रामदास अठावले जैसे दलित नेता बोलने लगे. ऐसा बवाल मच गया जो देखा ना होगा.
इंडी वाले कह रहे हैं कि आरक्षण सुधार के नाम पर माहौल बनाया जा रहा है, इंडी वाले वही पुराना नैरेटिव चला रहे हैं कि ये लोग आरक्षण को खत्म करना चाहते हैं, जबकि कोई भी आरक्षण खत्म करने की बात नहीं कर रहा. खुद सरकार भी बार बार कह चुकी है कि आरक्षण को किसी को हाथ नहीं लगाने देंगे.
लेकिन नरेंद्र मोदी के खिलाफ जो नैरेटिव 2024 के लोकसभा चुनाव के वक्त बनाया गया था कि 400 सीट आ गई तो संविधान खत्म कर देंगे, वही नैरेटिव आरक्षण को लेकर भी रिपीट किया जा रहा है, जिससे इसका फायदा यूपी चुनाव और आगे के चुनाव में लिया जा सके.
आप ये भी देखिए कि जो लोग आंदोलन भी कर रहे हैं, उनमें भी कोई ये नहीं कह रहा है कि आरक्षण हटना चाहिए या आरक्षण किसी का छीना जाना चाहिए.वो सिर्फ इतना कह रहे हैं कि इतने साल हो गए ये देखना चाहिए कि आरक्षण की व्यवस्था सही तरीके से चल रही है या नहीं. सबको सही लाभ मिल रहा है या नहीं.
आपको वो रिपोर्ट भी दिखाएंगे जिसे देखकर पैरों तले जमीन खिसक जाएगी. इससे आपको पता चलेगा कि रिजर्वेशन का फायदा आखिर मिल किसे रहा है. आरक्षण पर आजादी से लेकर आजतक जो सियासत हुई है, उसका भी अध्याय खुलेगा, लेकिन पहले एक ट्रेलर देख लीजिए
आरक्षण को लेकर राजनीति में जो घमासान मचा हुआ है, उसमें आप देखिए कि एक तरफ तो आंदोलन हो रहा है कि रिजर्वेशन रिफॉर्म होना चाहिए. दिल्ली से लेकर लखनऊ तक लोग सड़क पर उतरे और ये मांग रहे हैं कि आरक्षण व्यवस्था में सुधार और समीक्षा होनी चाहिए.
लेकिन जैसे ही ये बात आई, इंडी वाले अपना नैरेटिव बनाने लगे कि ये सब तो साजिश हो रही है आरक्षण को खत्म करने की. अभी सबसे पहले यूपी का चुनाव है, तो अखिलेश यादव तुरंत एक्टिव हो गए. दिल्ली और लखनऊ में हुए प्रोटेस्ट पर अखिलेश यादव ने कहा कि…
  1. आरक्षण सुधार के नाम पर आरक्षण समाप्ति का षड्यंत्र हो रहा है
  2. – ये पीडीए समाज के खिलाफ एक और गहरी साजिश है.
  3. – आरक्षण पीडीए का अधिकार है किसी की इच्छा का विषय नहीं.
  4. – बीजेपी और उनके संगी-साथी समय-समय आरक्षण का विरोध करते हैं
  5. – कभी समीक्षा’ तो कभी सुधार’ जैसे अस्पष्ट शब्दों का प्रयोग करते हैं
  6. – कभी क्रीमीलेयर तो कभी आरक्षण त्यागने’ की सलाह देते हैं
  7. – सदियों से शोषित-वंचित लोगों को मिले आरक्षण की हकमारी की कोशिश हो रही है
  8. – आरक्षण था, आरक्षण है, आरक्षण रहेगा!
उधर आजाद समाज पार्टी के सांसद चंद्रशेखर आजाद रावण तो प्रदर्शन करने वालों को अपना राजनीतिक दल बनाने की सलाह दे रहे हैं. कह रहे हैं कि अपनी ताकत दिखाओ, बहुमत लाओ और जो नियम बनाना है बना लो,
चंद्रशेखर आजाद रावण का कहना है, ‘जो साथी आंदोलन कर रहे हैं. मेरी उनको राय है कि वो सब लोग अपना दल बनाएं, और दल बनाकर आगामी लोकसभा चुनाव में विधानसभा चुनाव में हिस्सा लें. अपना संख्याबल बना लें, जब उनका बहुमत हो जाएगा. बहुमत बनाकर वो कोई भी कानून पास कर सकते हैं. आप ये समझिए, जो लोग आज विरोध कर रहे हैं उन्होंने कभी कुछ दिया नहीं. ये तो संवैधानिक व्यवस्था नहीं होती तो यह जो चुनावी भाईचारा है इसको भी नहीं निभा पाते.’
आरक्षण आंदोलन के खिलाफ ये जो बातें हो रही हैं, उसमें आप ये भी देखिए कि अगर जनरल कास्ट दूसरे समाज का विरोधी होता तो पिछड़े समाज से आने वाले नरेंद्र मोदी तीन तीन बार देश के प्रधानमंत्री नहीं होते. नरेंद्र मोदी की टीम में भी दलित और पिछड़े समाज के लोगों का प्रतिनिधित्व बहुत बड़ी संख्या में है.
इधर इंडी और विपक्ष की बाकी पार्टियां आरक्षण के नाम पर माहौल बनाने लगी तो उधर एनडीए से भी जवाब मिला. चिराग पासवान भी बोल पड़े. रामदास अठावले भी बोल पड़े. एनडीए के वो नेता जो दलित पॉलिटिक्स करते हैं, उन्होंने खुलकर बोल दिया कि आरक्षण को कोई हटा नहीं सकता.
चिराग पासवान का कहना है, ‘आरक्षण किसी को दी हुई खैरात नहीं है. ये संवैधानिक अधिकार हैं और दुनिया की कोई ताकत आरक्षण को समाप्त नहीं कर सकती. मैं जब तक हूं तो इतना गारंटी के साथ कह सकता हूं कि जिस सरकार में चिराग पासवान हैं, रामविलास पासवान जी का बेटा हूं, कभी इस व्यवस्था को बिगड़ने नहीं दूंगा.’
इस मामले में अब कांग्रेस भी कूद पड़ी है. कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने आरोप लगाया है कि
  • – मोदी सरकार ने चोर दरवाजे से आरक्षण खत्म करने की योजना रची !!
  • – 2015 में केंद्र सरकार में 4.21 लाख पद खाली थे
  • – 2024 में यह संख्या बढ़कर 8.24 लाख हो गई
  • – रेलवे में 2.40 लाख पद खाली हैं. डिफेंस में 2.41 लाख. गृह मंत्रालय में 1.10 लाख हैं
  • – PSU में 5.1 लाख स्थायी नौकरियां खत्म हो गईं.
  • – ठेका कर्मचारियों की हिस्सेदारी 19% से बढ़कर 49% हो गई
  • – सवाल सिर्फ रोजगार का नहीं, सामाजिक न्याय का है
  • – सरकारी पद खाली रखो तो आरक्षण का अवसर खत्म
  • – PSU बेचो तो आरक्षित नौकरियां खत्म.
  • स्थायी नौकरी को ठेके में बदलो तो आरक्षण खत्म.
  • – आरक्षण खत्म करने के लिए संविधान बदलना जरूरी नहीं
  • – आरक्षण वाली नौकरियां खत्म कर देना ही काफ़ी है.
  • – सामाजिक न्याय विरोधी बीजेपी का यही एजेंडा है.
  • – पद खाली रखो. PSU बेचो. ठेकेदारी बढ़ाओ.
  • – SC, ST, OBC, EWS से उनका संवैधानिक हक छीन लो.
खड़गे ने कहा कि बाबासाहेब के संविधान से मिले अधिकारों को षड्यंत्र के तहत खत्म करने की बीजेपी की नीति का अब पर्दाफाश हो चुका है.
आरक्षण को लेकर इंडी वाले जो माहौल बना रहे हैं, वो नया नहीं है. इसी तरह का एक नैरेटिव इंडी वालों ने 2024 के लोकसभा चुनाव में खूब चलाया था. इसमें कहा गया था कि नरेंद्र मोदी को अगर 400 सीटें आ गई तो ये संविधान बदल देंगे.
जबकि आप देखिए कि समय समय पर खुद नरेंद्र मोदी और उनकी टीम ने साफ साफ कहा है कि आरक्षण तो रहेगा, आरक्षण हटेगा नहीं. सुनिए अमित शाह और राजनाथ सिंह के पुराने बयान, जो इंडी के नैरेटिव को ध्वस्त कर रहे हैं.
अमित शाह कहते हैं, ‘कान खोलकर सुन लो…भारतीय जनता पार्टी कभी रिजर्वेशन को हटाने वाली नहीं है. इतना ही नहीं अगर आप हटाना चाहोगे तो आपको भारतीय जनता पार्टी हटाने भी नहीं देगी. ये कमिटमेंट (प्रतिबद्धता) भारतीय जनता पार्टी की है.’
वहीं रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, ‘आरक्षण के बारे में मैं कहना चाहता हूं. गुमराह कर रहे हैं हमारे ये विरोधी. मेरे बहनों-भाईयों मैं कहकर जा रहा हूं. किसी माई के लाल ने दूध नहीं पिया है कि आरक्षण को समाप्त कर दे. आरक्षण किसी भी सूरत में समाप्त नहीं हो पाएगा.’
यानी इंडी वाले आरक्षण पर फिर से वैसी ही भ्रम की राजनीति करने का प्रयास कर रहे हैं, जैसा इन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में किया था. जबकि सच ये है कि आरक्षण खत्म करने की किसी ने कोई बात नहीं की.
लेकिन आरक्षण की बात जैसे होती है उसे जनरल कैटेगरी और एससी/एसटी के बीच की लड़ाई बनाकर पेश किया जाने लगता है. जबकि ये मुद्दा तो जनरल कैटेगरी से भी कहीं ज्यादा पिछड़ों दलितों के साथ रिजर्वेशन होने के बावजूद हो रहे अन्याय का है. जिसकी वजह से रिजर्वेशन हटाने नहीं बल्कि उसकी समीक्षा की बात होती है ताकि जिनको अब तक इसका फायदा नहीं मिला उनको तो मिले.आप कुछ आंकड़े देखिए, आप खुद हैरान रह जाएंगे. जैसे हरियाणा में स्टेट कमिशन फॉर शेड्यूल्ड कास्ट की एक स्टडी के मुताबिक..
  1. – हरियाणा में शेड्यूल्ड कास्ट में बाल्मिकी, धनुक, खटिक, मजहबी सिख मिलाकर करीब 36 जातियां ऐसी हैं जिनकी SC में आबादी 52 फीसदी है, लेकिन क्लास-1, क्लास-2, क्लास-3 की सरकारी नौकरी में इनकी हिस्सेदारी सिर्फ 35% है.
  2. – जबकि हरियाणा में जाटव, मोची, रहगर, राइगर, रामदासिया, रविदासिया जैसी जातियां जिनकी SC के अंदर आबादी 50% से कम है, उनकी क्लास-1, 2, 3 की नौकरियों में हिस्सेदारी 65% है
  3. – हरियाणा में दलितों में भी सबसे वंचित समुदाय जिनकी आबादी दलितों के अंदर 50% है, और जो हरियाणा में कुल आबादी का 11% है, उनकी क्लास 1 की नौकरी में 4.7%, क्लास 2 में 4.1%, क्लास 3 में सिर्फ 6.2% हिस्सेदारी है
  4. – इसी तरह बिहार में महादलित कमीशन ने कहा था कि 22 SC समुदायों में से 21 समुदाय वचिंत हैं, ये शिक्षा, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक तौर पर वंचित हैं, इन समुदायों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाया है
  5. – बिहार में 2022 के कास्ट सर्वे के मुताबिक राज्य में दलितों की आबादी 20% है, लेकिन सिर्फ 1.3% दलित ही सरकारी नौकरी में हैं. यहां तक कि 84% दलित आबादी के पास जमीन तक नहीं है.
  6. – जातिगत सर्वे में बिहार में SC कैटेगरी में भी गरीबी का डिफरेंस दिखता है
  7. – 54.56% मुसहर और 53.10% डोम,49% नट, 39.36% दुसध और 38.34% पासी गरीब हैं यानी SC जातियों में गरीबी का अंतर करीब 16% दिखाई दे रहा है
  8. – सरकारी नौकरी में धोबी 3.14% हैं तो वहीं मुसहर सिर्फ 0.26% हैं
  9. – इसी तरह से आंध्र प्रदेश का हाल देखिए, 2007 के जस्टिस उषा मेहरा कमीशन के मुताबिक
  10. – आंध्र प्रदेश में रेल्ली और मडिगा समुदाय SC आबादी का 50.21% है जबकि माला और अन्य जातियां SC आबादी का 42.78% हैं
  11. – लेकिन माला और अन्य जातियों के पास सरकारी नौकरी के क्लास 1 और क्लास 3 पद का 70% हिस्सा है.
जब आरक्षण की बात हो रही है तो आपको इतिहास भी देखना चाहिए कि आरक्षण पर संविधान सभा में क्या चर्चा हुई थी. आरक्षण के रिव्यू को लेकर क्या बातें हुई थी. आरक्षण को लेकर संविधान सभा के दलित नेता एस नागप्पा ने 25 मई 1949 को कहा था
लगभग सभी हरिजन सदस्य इस सदन में एक साथ बैठे हैं. पंडित नेहरू ने हमें समझाया कि हमारे अपने हितों में ये सबसे अच्छी बात होगी. उनकी सलाह के अनुसार हमने इस बिंदु पर निर्णय लिया है.
आखिरकार ये ऐसा प्रश्न है जिसे संसद को फिर से उठाना होगा. अगर दस साल बाद हमारी स्थिति वैसी ही रहे जैसी आज है, तो संसद के लिए यह खुला रहेगा कि वह इसे renew करे या समाप्त करे.
इसलिए, हमने स्वीकार किया कि आरक्षण संविधान के प्रारंभ से दस सालों तक जारी रहना चाहिए.
संविधान सभा में ही सरदार पटेल ने कहा कि श्री मुनिस्वामी पिल्लई, जो अनुसूचित जातियों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, उन्होने एक संशोधन रखा कि अनुसूचित जातियों के संबंध में आरक्षण का प्रावधान दस वर्ष की अवधि तक जारी रखा जाए.
सलाहकार समिति में सभी की सामान्य राय, जो लगभग सर्वसम्मत थी, ये थी कि अनुसूचित जातियों के संबंध में ये आरक्षण उस अवधि तक जारी रखा जाए और श्री मुनिस्वामी पिल्लई के संशोधन को स्वीकार किया जाए.
आज भले ही आरक्षण के मुद्दे पर राजनीति हो रही है. आरक्षण का नाम लेने भर से हंगामा मच जाता है. आरक्षण पर आज से नहीं आजादी के बाद से ही बहस चल रही है. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की आरक्षण पर क्या राय थी वो भी बताते हैं. नेहरू ने कहा था…
  1. – अगर हम सांप्रदायिक और जातिगत आधार पर आरक्षण लागू करेंगे तो हम प्रतिभाशाली और सक्षण लोगों को पीछे धकेल देंगे, और खुद दूसरे या तीसरे दर्जे के बनकर रह जाएंगे.
  2. – ये रास्ता केवल मूर्खता नहीं बल्कि विनाश की ओर ले जाता है, हम अपने सार्वजनिक क्षेत्र, बल्कि किसी भी क्षेत्र का निर्माण दूसरे दर्जे के लोगों के साथ कैसे कर सकते हैं.
  3. 1961 में जवाहर लाल नेहरू ने देश के मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखी थी. उस चिट्ठी में नेहरू ने आरक्षण के विषय में कहा था कि, ये सही है कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों की सहायता को लेकर कुछ नियम और परंपराएं हमें बांधती हैं, वे सहायता के पात्र हैं. लेकिन इसके बावजूद मुझे किसी भी प्रकार का आरक्षण, विशेषकर सेवाओं में पसंद नहीं है.
  4. उन्होंने कहा था, ‘जो भी चीज अकुशलता और दूसरे दर्जे के मानकों को बढ़ावा देती है उसका मैं प्रबल विरोध करता हूं, मैं चाहता हूं कि मेरा देश हर क्षेत्र में प्रथम श्रेणी का देश बने, जिस क्षण हम दूसरे दर्जे को प्रोत्साहन देते हैं, उसी पल हम हार जाते हैं.’
  5. नेहरू जी तो आरक्षण के बारे में खुल कर बोलते थे, लेकिन आज कांग्रेस नेहरू की बातों को भूल गई है. यहां तक कि राजीव गांधी तक ने कहा था कि अगर आरक्षण चलता रहेगा तो उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी.
आरक्षण के मुद्दे पर जनसंघ और आरएसएस का पुराना स्टैंड क्या था वो देखिए
संघ के दूसरे सरसंघचालक गुरू गोलवलकर ने आरक्षण पर कहा था कि अगर कोई व्यक्ति जाति के कारण सामाजिक या राजनीति रूप से किसी प्रकार की वंचना या असुविधा झेल रहा है तो उसे खत्म किया जाना चाहिए
डॉ. अंबेडकर ने इन विशेष सुविधाओं की परिकल्पना सिर्फ 10 साल के लिए की थी यानी 1950 में, जब भारत गणराज्य बना था. लेकिन अब हम 1970 में हैं ये व्यवस्था लगातार बढ़ाई जा रही है, हम केवल जाति के आधार पर जारी विशेषाधिकारों के पक्ष में नहीं हैं.
क्योंकि इस से उनमें अलग इकाई बने रहने के निहित स्वार्त पैदा होंगे, इस से समाज के बाकी हिस्सों के साथ उनका समन्वय और एकीकरण प्रभावित होगा, सहायता सभी लोगों को मिलनी चाहिए, चाहे वो किसी भी जाति या वर्ग से संबंध रखते हों
इसी तरह से 1967 के चुनाव में जनसंघ ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में आरक्षण का मुद्दा शामिल किया था. घोषणा पत्र में जनसंघ ने लिखा था कि भारतीय जनसंघ एक कार्यक्रम बनाएगा ताकि समाज के पिछड़े वर्ग को बाकी सेक्शन के समकक्ष लाया जा सके वो भी निर्धारित समय में. हालांकि जिन वर्ग का पहले ही उत्थान हो चुका है, उनके अंदर पिछड़े ही रहने के भाव को बढ़ने नहीं दिया जाएगा. कम आय वाले लोगों को भी वो सारी सुविधाएं मिलेंगी जो पिछड़े वर्ग के लोगों को मिल रही हैं
दरअसल पिछले एक हफ्ते से आरक्षण का मुद्दा लगातार जोर पकड़ रहा है. दिल्ली के जंतर मंतर पर आरक्षण के मुद्दे पर तगड़ा प्रोटेस्ट हुआ. सैकड़ों की संख्या में लोग यहां आए. और आरक्षण के मुद्दे पर अपनी बात बेबाकी से रखी. इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने कोई हंगामा नहीं किया. शांति के साथ अपनी डिमांड करते रहे.
कॉकरोच पार्टी वालों के प्रोटेस्ट की तरह इस प्रोटेस्ट में कोई बवाल नहीं, किसी को गाली नहीं दी गई. किसी के खिलाफ अभद्र शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया. प्रदर्शनकारी आरक्षण नीति में सुधार की मांग कर रहे थे.
आरक्षण के मुद्दे पर हुए इस प्रोटेस्ट में हनुमान चालीसा का पाठ किया गया. सैकड़ों लोगों ने एक सुर में हनुमान चालीसा का पाठ किया.
जंतर मंतर पर आरक्षण के मुद्दे पर जो लोग प्रोटेस्ट कर रहे थे. उनकी डिमांड क्या हैं ये बताऊंगा. लेकिन पहले देखिए कि शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट पर पुलिस ने कैसे एक्शन लिया.
पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को जबरन जंतर मंतर से हटा दिया. पहले तो प्रदर्शन की अनुमति बड़ी मुश्किल से मिली थी. औ र उसके बाद पुलिस ने शाम होते होते प्रदर्शनकारियों को जबरन वहां से हटा दिया. आप खुद देखिए पुलिस किस तरह से पकड़ पकड़ के लोगों को हटा रही थी.
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वो शांति पूर्ण तरीके से प्रोटेस्ट कर रहे थे. फिर भी पुलिस और RAFके जवानों ने सभी को बलपूर्वक वहां से हटा दिया.
कई प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने डीटेन भी किया. बसों में भर कर प्रदर्शनकारियों को जंतर मंतर से हटाया गया. आपको सुनाते हैं कि प्रदर्शनकारी क्या कह रहे थे.
प्रदर्शनकारियों ने क्या बताया?
पुलिस प्रशासन ने बहुत ही बर्बरता के साथ शांतिपूर्ण प्रदर्शन को भंग करने की कोशिश की. इतने लोग जंतर-मंतर पर पहुंचे जितने कभी नहीं पहुंचे. पहली बार में इतने लोग आए थे. सभी को लाठियां मार-मार कर उठा-उठाकर फेंक-फेंककर बाहर कर दिया.
आरक्षण को लेकर जो प्रोटेस्ट जंतर मंतर पर हुआ वो खत्म नहीं हुआ है. भले ही प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने हटा दिया हो. लेकिन आरक्षण को लेकर जो डिमांड हैं उसकी चर्चा अब हर तरफ हो रही है. प्रदर्शनकारियों की डिमांड है
  1. सबसे पहली मांग ये है कि आरक्षण नीति की समीक्षा की जाए
  2. आरक्षण में आथिक स्थिति को प्राथमिकता दी जाए
  3. सरकार आरक्षण पर श्वेतपत्र जारी करे, जिस से आरक्षण के प्रभाव की पूरी जानकारी मिल सके
  4. उच्च शिक्षा में न्यूनतम अंक की मांग, यानी हायर स्टडीज में मिनिमम मार्क का एक क्राइटेरिया तय हो जिस से हर जाति वर्ग के लोगों को कम से कम इतने अंक लाना जरूरी हो
  5. EWS वर्ग के लाभ को बढ़ाने की मांग भी की गई है
  6. इसके अलावा UGC इक्विटी रेगुलेशन का विरोध किया गया
  7. प्रदर्शनकारियों ने ये डिमांड नहीं की है कि आरक्षण को ही खत्म कर दिया जाए. वो तो सिर्फ आरक्षण नीति की समीक्षा और उस में सुधार की मांग कर रहे हैं.
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