‘वन नेशन वन इलेक्शन’ संविधान के मूल ढांचे का खुला उल्लंघन है,

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव का सोमवार को संसद की संयुक्त समिति के समक्ष पुरजोर विरोध किया और इस विचार को ही ‘विकृत’ तथा ‘असंवैधानिक’ करार दिया. पूर्व गृह एवं वित्त मंत्री ने कहा कि ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के तहत देशभर […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
मंगलवार, 25 अगस्त 2026, 09:02 AM 6 मिनट read
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‘वन नेशन वन इलेक्शन’ संविधान के मूल ढांचे का खुला उल्लंघन है,
Photo: UB India News Archive
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव का सोमवार को संसद की संयुक्त समिति के समक्ष पुरजोर विरोध किया और इस विचार को ही ‘विकृत’ तथा ‘असंवैधानिक’ करार दिया. पूर्व गृह एवं वित्त मंत्री ने कहा कि ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के तहत देशभर में एक साथ चुनाव कराने की कवायद ‘बिना सोचे-समझे’ उठाया गया कदम है. सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस नेता ने संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 पर विचार कर रही संसद की संयुक्त समिति के समक्ष अपनी राय रखी. इन विधेयकों का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों को एक साथ कराना है.

सूत्रों के मुताबिक, चिदंबरम ने समिति से कहा कि एक साथ चुनाव कराने से संबंधित विधेयक ‘असंवैधानिक’ हैं. उन्होंने तर्क दिया कि प्रत्येक विधानमंडल का कार्यकाल पांच वर्ष के लिए होता है और उसके कार्यकाल को कम करना संविधान के मूल ढांचे का सीधे तौर पर उल्लंघन होगा. वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि उनकी अंतररात्मा उन्हें इन विधेयकों का समर्थन करने की अनुमति नहीं देती. उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार के पास कानून पारित कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत नहीं है.
चुनावी खर्चे का तर्क बेतुका
चिदंबरम ने इस बिल को लोकतंत्र के खिलाफ बताया और समिति को चेताया कि यह बिल कानून के कसौटी पर खरा नहीं उतरता. चिदंबरम ने सवाल भी किया कि 2029 में यदि सभी राज्यों और लोकसभा के चुनाव साथ कराए जाए और उसी चुनाव में केंद्र में किसी को बहुमत नहीं मिला तो क्या होगा? चिदंबरम ने यह भी कहा कि सरकार एक साथ चुनाव करा कर खर्च कम करने की बात करती है तो चुनाव में सरकार की तरफ से कोई ज्यादा खर्च नहीं किया जाता, जो भी खर्च होता है वो उम्मीदवार करते हैं और उसमें भी सरकार की ओर से दिए गए लिमिट से बहुत अधिक खर्च होता है और सरकार को इस पर अंकुश लगाने की जरूरत है.
टीएमसी ने भी किया बिल का विरोध
समिति की सदस्य और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की नेता सागरिका घोष ने भी विधेयक का विरोध किया और कहा कि इससे निर्वाचन आयोग को ‘बेलगाम’ अधिकार मिल जाएंगे. करीब 10 पद्म पुरस्कार से सम्मानित हस्तियों के एक समूह ने भी समिति के समक्ष अलग-अलग अपनी राय रखी. इनमें तरलोचन सिंह, नवीन खन्ना, मीनाक्षी जैन और नीरू कुमार शामिल थे. पद्म पुरस्कार से सम्मानित कुछ लोगों ने एक साथ चुनाव कराने की पहल का समर्थन किया, जबकि अन्य ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इससे देश में ‘अराजकता’ पैदा हो सकती है.
2029 से लागू करने की चर्चा
जेपीसी की बैठक में कुछ सदस्यों ने कहा कि चुनाव आयोग को असीमित अधिकार देना लोकतंत्र के लिए सही नहीं होगा. कांग्रेस एक देश एक चुनाव बिल के खिलाफ है और कांग्रेस की तरफ से प्रियंका गांधी, मनीष तिवारी, रणदीप सुरजेवाला और मुकुल वासनिक जेपीसी के सदस्य हैं. हालांकि, चर्चा है कि एक देश एक चुनाव को सरकार 2029 से ही लागू करना चाहती है. लेकिन संसदीय समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी कह चुके हैं कि उनका काम रिपोर्ट तैयार करना है, यह कब से लागू होगा सरकार तय करेगी.
जेपीसी ने किया कई राज्यों का दौरा
‘एक देश एक चुनाव’ को लेकर जेपीसी कई राज्यों का दौरा कर चुकी है. संयुक्त संसदीय समिति ने महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल, कनार्टक, गुजरात, दिल्ली और गोवा जैसे राज्यों का दौरा कर लिया है. विपक्ष शासित राज्यों ने बिल का विरोध किया है जिसमें पंजाब, हिमाचल और कर्नाटक शामिल हैं. 2024 में जब ‘एक देश एक चुनाव’ का बिल संसद में लाया गया था तब डीएमके ने भी इसका विरोध किया था.
‘एक देश एक चुनाव’ बिल के लिए सरकार को दो-तिहाई बहुमत की जरूरत
कांग्रेस पार्टी ‘एक देश एक चुनाव’ के बिल का विरोध कर रही है और ‘एक देश एक चुनाव’ का बिल 129 संविधान संशोधन विधेयक है. ऐसे में इसको पास कराने के लिए सरकार के दो तिहाई बहुमत चाहिए जिसके लिए उसे डीएमके जैसी पार्टियों की आवश्यकता होगी. यही नहीं परिसीमन बिल को लेकर भी यही स्थिति है. सरकार ने अभी तक संसद के मानसून सत्र का सत्रावसान नहीं किया गया. मतलब सरकार कभी भी कम दिनों के नोटिस पर सत्र बुला सकती है.
ये विधेयक दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किए गए थे, जिसके बाद इन्हें विचार के लिए संयुक्त समिति के पास भेज दिया गया था. इन विधेयकों को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया है. समिति ने चरणबद्ध तरीके से लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराने की सिफारिश की थी. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी कोविंद की अध्यक्षता वाली इस उच्चस्तरीय समिति के सदस्य थे.
संविधान लागू होने के बाद 1951 से 1967 तक लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हुए थे. पहला आम चुनाव 1951-52 में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ हुआ था. यह व्यवस्था 1957, 1962 और 1967 के अगले तीन आम चुनावों में भी जारी रही. हालांकि, कुछ राज्य विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने के कारण 1968 और 1969 में एक साथ चुनावों का यह चक्र बाधित हो गया.
फिर चौथी लोकसभा भी 1970 में समय से पहले भंग कर दी गई और 1971 में नए चुनाव हुए. पहली, दूसरी और तीसरी लोकसभा के विपरीत पांचवीं लोकसभा का कार्यकाल आपातकाल लागू किए जाने के कारण संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत 1977 तक बढ़ाया गया था. इसके बाद लोकसभा के केवल कुछ कार्यकाल ही पूरे पांच वर्ष चले, जिनमें आठवीं, दसवीं, 14वीं और 15वीं लोकसभा शामिल हैं. छठी, सातवीं, नौवीं, 11वीं, 12वीं और 13वीं लोकसभा सहित अन्य सदनों को समय से पहले भंग कर दिया गया था.
राज्य विधानसभाओं को भी इसी तरह के व्यवधानों का सामना करना पड़ा है. समय से पहले विधानसभा भंग होने और कार्यकाल बढ़ाए जाने की घटनाएं वर्षों से सामने आती रही हैं. इन घटनाक्रमों ने एक साथ चुनाव के चक्र को पूरी तरह बाधित कर दिया और इसके परिणामस्वरूप देश में अलग अलग समय पर चुनाव होने लगे.
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