पूर्व सीडीएस जनरल अनिल जौहान के एक बयान के बाद पाकिस्तान के किराना हिल्स की चर्चा जोरों पर है. भारत ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि बीते साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उस किराना हिल्स पर कोई हमला नहीं किया गया. बल्कि भारत ने ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान के सरगोधा इलाके में तैनात […]
By UB India News • Patna, Bihar बुधवार, 26 अगस्त 2026, 06:17 AM • 5 मिनट read
पूर्व सीडीएस जनरल अनिल जौहान के एक बयान के बाद पाकिस्तान के किराना हिल्स की चर्चा जोरों पर है. भारत ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि बीते साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उस किराना हिल्स पर कोई हमला नहीं किया गया. बल्कि भारत ने ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान के सरगोधा इलाके में तैनात रडारों के बारे में पता करने के लिए अपने ड्रोन भेजे थे. ऐसे में संभव है कि इन्हीं ड्रोन्स में से कोई एक पास के किराना हिल्स इलाके में पहाड़ियों से टकरा गया हो. इसी कारण वहां से धुआं उठता हुआ दिखा हो. पाकिस्तान के लिए किराना हिल्स रणनीतिक रूप से बेहद अहम है. बताया जाता है कि यहां उसका परमाणु ढांचा मौजूद है. लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि अगर भारतीय ड्रोन वास्तव में किराना हिल्स में गिरा था, तो क्या इससे भारत-पाकिस्तान के बीच परमाणु ठिकानों पर हमला न करने की संधि का उल्लंघन हुआ? आखिर यह संधि क्या कहती है? किराना हिल्स कहां है और पाकिस्तान के लिए इसका महत्व कितना बड़ा है? आइए समझते हैं पूरा मामला.
कहां स्थिति है किराना हिल्स
किराना हिल्स पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में सरगोधा के पास स्थित पहाड़ियों का इलाका है. यह सरगोधा से करीब 10 किलोमीटर उत्तर में है. यही वजह है कि सैन्य नजरिए से इस इलाके को बेहद संवेदनशील माना जाता है. किराना हिल्स कोई बहुत बड़ा पर्वतीय क्षेत्र नहीं है. लेकिन इसकी अहमियत इसके आकार से कहीं ज्यादा है. इसकी वजह है इसका सरगोधा के बेहद करीब होना. सरगोधा पाकिस्तान की वायुसेना के महत्वपूर्ण ठिकानों में शामिल है.
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने सरगोधा और उसके आसपास पाकिस्तानी रडारों को निशाना बनाने की कोशिश की थी. इसी अभियान के दौरान कई ऐसे हथियार भेजे गए थे जो हवा में कुछ समय तक घूमकर अपने लक्ष्य की तलाश कर सकते हैं. पूर्व सीडीएस जनरल अनिल चौहान के मुताबिक, इन्हीं में से एक ड्रोन अपने लक्ष्य की तलाश करते हुए अपनी तय उड़ान अवधि तक हवा में रहा. करीब दो घंटे बाद लक्ष्य नहीं मिलने पर उसके किराना हिल्स की किसी पहाड़ी से टकराने की संभावना है. उन्होंने साफ कहा कि किराना हिल्स भारत का तय निशाना नहीं था.
रणनीतिक रूप से पाकिस्तान के लिए कितना अहम
किराना हिल्स को पाकिस्तान के परमाणु ढांचे से जोड़कर लंबे समय से चर्चा होती रही है. यही वजह है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वहां से धुआं उठने की तस्वीरों ने काफी सवाल खड़े किए थे. हालांकि, यहां एक बात समझना जरूरी है. किराना हिल्स को लेकर पाकिस्तान के परमाणु ढांचे से जुड़ी तमाम जानकारियां आधिकारिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं. मीडिया और रणनीतिक विशेषज्ञों की रिपोर्टों में इसे पाकिस्तान के परमाणु भंडारण और सैन्य ढांचे से जोड़कर देखा जाता है. इसी संवेदनशीलता की वजह से वहां किसी भी सैन्य गतिविधि को सामान्य घटना नहीं माना जा सकता.
परमाणु ठिकानों पर हमला न करने की क्या है संधि
भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला न करने की एक खास संधि है. इसका आधिकारिक नाम परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं पर हमले के निषेध संबंधी समझौता है. यह समझौता 31 दिसंबर 1988 को हुआ था. भारत की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और पाकिस्तान की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने इस पर हस्ताक्षर किए थे. यह 27 जनवरी 1991 से प्रभावी हुआ. इस समझौते का मूल उद्देश्य बेहद साफ है. दोनों देश एक-दूसरे के परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं को नष्ट या नुकसान पहुंचाने वाली कार्रवाई नहीं करेंगे. न ही किसी दूसरे देश को ऐसी कार्रवाई में मदद करेंगे. संधि की एक खास व्यवस्था हर साल 1 जनवरी को दोनों देशों की ओर से परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं की सूची साझा करना है. 2026 में भी दोनों देशों ने यह सूची साझा की. यह लगातार 35वीं बार हुआ. यानी दोनों देशों के बीच दुश्मनी कितनी भी बढ़ जाए, परमाणु ठिकानों को लेकर एक अलग सुरक्षा व्यवस्था बनी रहती है.
क्या इस दायरे में आता है किराना हिल्स?
यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम सवाल है. संधि में केवल परमाणु बिजलीघरों की बात नहीं है. इसके दायरे में परमाणु ऊर्जा और अनुसंधान रिएक्टर, ईंधन बनाने वाले प्रतिष्ठान, यूरेनियम संवर्धन, परमाणु सामग्री के पुनर्संसाधन और बड़ी मात्रा में रेडियोधर्मी सामग्री रखने वाली सुविधाएं भी शामिल हैं. इसलिए अगर किराना हिल्स में ऐसी कोई सुविधा मौजूद है जो इस परिभाषा के तहत आती है और वह दोनों देशों द्वारा साझा की गई संरक्षित सूची में शामिल है, तो उस पर जानबूझकर हमला संधि के गंभीर उल्लंघन का सवाल पैदा कर सकता है. लेकिन, मौजूदा मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात है इरादा. जनरल अनिल चौहान ने कहा है कि भारतीय ड्रोन किराना हिल्स को निशाना बनाने के लिए नहीं भेजा गया था. यानी यह किसी परमाणु प्रतिष्ठान पर किया गया सुनियोजित हमला नहीं था. यही वजह है कि इसे सीधे-सीधे संधि तोड़ने की घटना कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी.
फिर क्यों मचा इतना बवाल?
बवाल की असली वजह किराना हिल्स का परमाणु महत्व है. अगर कोई सामान्य सैन्य ठिकाना होता तो किसी ड्रोन के वहां गिरने की खबर इतनी बड़ी नहीं बनती. लेकिन परमाणु ढांचे से जुड़े इलाके में किसी दूसरे देश का हथियार पहुंचना अपने आप में बेहद संवेदनशील घटना है. भारत का पक्ष यह है कि किराना हिल्स कोई तय निशाना नहीं था. असली सवाल अब यह है कि जिस जगह ड्रोन गिरा, वह 1988 की संधि के तहत साझा की गई संरक्षित सूची में शामिल थी या नहीं. इस सवाल का सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जवाब फिलहाल स्पष्ट नहीं है.