प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान का दौरा केवल एक सामान्य राजनयिक यात्रा नहीं है। यह उस बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की सक्रिय भूमिका का संकेत है, जहां मध्य एशिया अब केवल भूगोल का हिस्सा नहीं, बल्कि सुरक्षा, ऊर्जा, व्यापार, कनेक्टिविटी और रणनीतिक संतुलन का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।
29 अगस्त 2026 को प्रधानमंत्री मोदी उज्बेकिस्तान के लिए रवाना हुए हैं। ताशकंद में वे राष्ट्रपति शावकत मिर्जियोयेव के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे और इसके बाद बिश्केक में SCO के 26वें शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे। विदेश मंत्रालय के अनुसार, SCO मंच पर भारत अपनी प्राथमिकताओं को Security, Connectivity और Opportunity के रूप में आगे बढ़ाएगा।
यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब दुनिया एक साथ कई संकटों से गुजर रही है—आतंकवाद, क्षेत्रीय संघर्ष, ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति शृंखला में बदलाव और महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा। ऐसे वातावरण में भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह किसी एक शक्ति-समूह का हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप बहु-ध्रुवीय और संतुलित विदेश नीति को मजबूत करे।
उज्बेकिस्तान क्यों महत्वपूर्ण है?
मध्य एशिया में उज्बेकिस्तान का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से भारत और मध्य एशिया के बीच व्यापार, संस्कृति और सभ्यतागत संपर्क का मार्ग रहा है। आज यही क्षेत्र आधुनिक भू-राजनीति में ऊर्जा, खनिज, परिवहन और सुरक्षा के कारण महत्वपूर्ण हो गया है।
भारत के लिए उज्बेकिस्तान के साथ संबंध केवल राजनीतिक नहीं हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, रक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, डिजिटल तकनीक, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज और उभरती तकनीकों में सहयोग की संभावनाएं हैं। प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान इन क्षेत्रों पर चर्चा होने की संभावना है।
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मध्य एशिया भारत को एक ऐसे क्षेत्र से जोड़ता है जहां ऊर्जा संसाधन, प्राकृतिक संपदा और यूरोप-एशिया के बीच परिवहन मार्गों की बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं।
SCO: भारत के लिए सिर्फ एक संगठन नहीं
शंघाई सहयोग संगठन भारत की विदेश नीति में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भारत 2017 में SCO का पूर्ण सदस्य बना और तब से इस मंच का उपयोग क्षेत्रीय सुरक्षा तथा आर्थिक एवं राजनीतिक सहयोग के लिए करता रहा है।
SCO में भारत, रूस, चीन और मध्य एशिया के कई महत्वपूर्ण देश शामिल हैं। इसलिए यह मंच भारत को एक ही टेबल पर उन शक्तियों के साथ संवाद करने का अवसर देता है जिनके साथ भारत के संबंध अलग-अलग स्तरों पर महत्वपूर्ण हैं।
यही SCO की सबसे बड़ी विशेषता है।
भारत अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहा है, वहीं रूस के साथ ऐतिहासिक संबंध बनाए हुए है और चीन के साथ प्रतिस्पर्धा तथा संवाद—दोनों को साथ लेकर चल रहा है। ऐसे में SCO भारत के लिए रणनीतिक संवाद का एक महत्वपूर्ण मंच है।
आतंकवाद के खिलाफ भारत का स्पष्ट संदेश
SCO सम्मेलन में भारत के लिए सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक है।
प्रधानमंत्री मोदी पहले भी आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक सहयोग और आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकने की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं। इस यात्रा के दौरान भी भारत का प्रयास रहेगा कि SCO क्षेत्र को आतंकवाद और कट्टरपंथ से मुक्त बनाने के लिए सदस्य देश अधिक प्रभावी सहयोग करें।
भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट है—आतंकवाद को किसी राजनीतिक या रणनीतिक सुविधा के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता।
मध्य एशिया की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि अफगानिस्तान की परिस्थितियां सीधे इस पूरे क्षेत्र की सुरक्षा को प्रभावित करती हैं। इसलिए भारत के लिए मध्य एशिया के देशों के साथ सुरक्षा सहयोग केवल राजनयिक विषय नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न भी है।
चीन और रूस के बीच भारत की स्थिति
SCO का सबसे संवेदनशील पक्ष भारत, चीन और रूस के बीच संबंध हैं।
चीन भारत का पड़ोसी और प्रमुख आर्थिक साझेदार है, लेकिन सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण दोनों देशों के संबंधों में जटिलता बनी हुई है। दूसरी ओर रूस भारत का लंबे समय से रणनीतिक साझेदार रहा है।
ऐसे में SCO भारत के लिए एक ऐसा मंच बन जाता है जहां भारत प्रतिस्पर्धा के साथ संवाद की नीति अपना सकता है।
भारत का उद्देश्य किसी देश के विरुद्ध गठबंधन बनाना नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखते हुए सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संवाद बनाए रखना है।
यही भारत की वर्तमान विदेश नीति की एक प्रमुख विशेषता दिखाई देती है।
रूस के साथ संवाद भी महत्वपूर्ण
SCO सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ संभावित मुलाकात को भी काफी महत्व दिया जा रहा है।
भारत-रूस संबंधों में रक्षा, ऊर्जा, परमाणु सहयोग और भू-राजनीतिक मुद्दों का विशेष महत्व है। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में रूस के साथ संवाद बनाए रखना भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
हालांकि भारत की विदेश नीति का उद्देश्य केवल रूस के साथ संबंध बनाए रखना नहीं है। भारत अमेरिका, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया, पश्चिम एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ भी अपने संबंध लगातार मजबूत कर रहा है।
इसका अर्थ है कि भारत अब किसी एक ध्रुव पर निर्भर रहने के बजाय रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता दे रहा है।
कनेक्टिविटी: भारत की बड़ी चुनौती और बड़ा अवसर
मध्य एशिया के साथ भारत के संबंधों में सबसे बड़ी चुनौती भौगोलिक दूरी और सीधी भूमि कनेक्टिविटी की कमी है।
भारत यदि मध्य एशिया के साथ व्यापार को तेजी से बढ़ाना चाहता है तो उसे वैकल्पिक परिवहन मार्गों और बहु-माध्यमीय कनेक्टिविटी पर ध्यान देना होगा।
इसीलिए SCO के मंच पर कनेक्टिविटी का मुद्दा भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भारत के लिए कनेक्टिविटी का अर्थ केवल सड़क या रेल मार्ग नहीं है। इसमें डिजिटल कनेक्टिविटी, ऊर्जा कॉरिडोर, व्यापारिक मार्ग और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क भी शामिल हैं।
मध्य एशिया से बेहतर जुड़ाव भारत को यूरोप और यूरेशिया के बाजारों तक नए अवसर दे सकता है।
ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों पर नजर
21वीं सदी की अर्थव्यवस्था में तेल और गैस के साथ-साथ Critical Minerals का महत्व तेजी से बढ़ रहा है।
इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सेमीकंडक्टर, नवीकरणीय ऊर्जा और आधुनिक रक्षा तकनीक के लिए कई महत्वपूर्ण खनिज आवश्यक हैं। मध्य एशिया ऐसे संसाधनों के कारण भारत के लिए महत्वपूर्ण साझेदार बन सकता है।
उज्बेकिस्तान के साथ महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा और तकनीकी सहयोग इसलिए आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
भारत का लक्ष्य केवल संसाधन खरीदना नहीं होना चाहिए, बल्कि तकनीक, निवेश और मूल्य-वर्धित उत्पादन के माध्यम से दीर्घकालीन साझेदारी बनाना होना चाहिए।
भारत के लिए आर्थिक अवसर
SCO भारत के लिए एक बड़ा आर्थिक बाजार भी है।
यदि भारत मध्य एशिया के देशों के साथ व्यापारिक संबंधों को मजबूत करता है तो भारतीय फार्मास्यूटिकल्स, आईटी सेवाओं, मशीनरी, कृषि उत्पादों, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और डिजिटल समाधानों के लिए नए बाजार खुल सकते हैं।
उज्बेकिस्तान के साथ स्वास्थ्य, शिक्षा और तकनीक के क्षेत्र में सहयोग विशेष महत्व रखता है। क्षेत्र में बड़ी संख्या में भारतीय छात्र भी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, जिससे लोगों के बीच संपर्क मजबूत होता है।
भारत की Digital Public Infrastructure और डिजिटल भुगतान से जुड़ी क्षमताएं भी मध्य एशियाई देशों के लिए सहयोग का नया क्षेत्र बन सकती हैं।
सभ्यतागत संबंधों की वापसी
भारत और मध्य एशिया के संबंध केवल आधुनिक कूटनीति से शुरू नहीं हुए हैं।
सदियों से भारत का मध्य एशिया के साथ व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क रहा है। भारतीय मसाले, वस्त्र और हस्तशिल्प से लेकर विचारों और ज्ञान की परंपरा तक इन क्षेत्रों के बीच संबंध रहे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी का उज्बेकिस्तान दौरा इस ऐतिहासिक जुड़ाव को आधुनिक रणनीतिक साझेदारी में बदलने का अवसर भी है।
ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री स्मारक और महात्मा गांधी केंद्र से जुड़ी गतिविधियां इस बात का प्रतीक हैं कि भारत अपने संबंधों में इतिहास, संस्कृति और आधुनिक कूटनीति—तीनों को साथ लेकर चलना चाहता है।
भारत के लिए असली परीक्षा
हालांकि केवल शिखर सम्मेलन में भाग लेना पर्याप्त नहीं है।
भारत के सामने असली चुनौती यह होगी कि वह SCO के मंच पर उठाए गए मुद्दों को ठोस परिणामों में बदल पाए।
क्या व्यापार बढ़ेगा?
क्या कनेक्टिविटी बेहतर होगी?
क्या आतंकवाद के खिलाफ वास्तविक सहयोग बढ़ेगा?
क्या ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों में दीर्घकालीन समझौते होंगे?
क्या भारतीय कंपनियों को मध्य एशिया में नए अवसर मिलेंगे?
इन प्रश्नों के उत्तर आने वाले समय में इस यात्रा की वास्तविक सफलता तय करेंगे।
भारत का संदेश: न किसी के खिलाफ, न किसी पर निर्भर
प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा भारत की उस विदेश नीति को भी रेखांकित करती है जिसमें भारत किसी एक शक्ति के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय अपने हितों के आधार पर संबंधों को संतुलित करता है।
भारत रूस से संबंध रखता है, अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी करता है, यूरोप के साथ आर्थिक संबंध बढ़ाता है, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ सहयोग करता है तथा चीन के साथ संवाद बनाए रखता है।
मध्य एशिया में भी भारत का यही दृष्टिकोण है—साझेदारी, लेकिन रणनीतिक स्वायत्तता के साथ।
निष्कर्ष: ताशकंद से बिश्केक तक भारत की नई रणनीतिक यात्रा
प्रधानमंत्री मोदी का उज्बेकिस्तान और SCO शिखर सम्मेलन का यह दौरा भारत की विदेश नीति के लिए कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है।
यह यात्रा केवल प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा नहीं बल्कि मध्य एशिया में भारत की बढ़ती रणनीतिक उपस्थिति का संकेत है।
भारत के लिए SCO का अर्थ आतंकवाद के खिलाफ सहयोग, क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक अवसर, ऊर्जा सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, डिजिटल सहयोग और बेहतर कनेक्टिविटी है।
आज विश्व व्यवस्था तेजी से बदल रही है। ऐसे समय में भारत के सामने सबसे बड़ा अवसर यह है कि वह केवल घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने वाला देश न बने, बल्कि वैश्विक और क्षेत्रीय एजेंडा तय करने वाले देशों में अपनी भूमिका मजबूत करे।
ताशकंद से बिश्केक तक प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखी जा सकती है।
भारत की प्राथमिकता स्पष्ट है—सुरक्षित क्षेत्र, मजबूत कनेक्टिविटी और साझा विकास के अवसर।
और यदि भारत इन तीनों मोर्चों पर मध्य एशिया के साथ मजबूत साझेदारी बनाने में सफल होता है, तो आने वाले वर्षों में मध्य एशिया भारत की विदेश नीति और आर्थिक रणनीति का एक और महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकता है।








