आज की राजनीति में महिलाएं सबसे मजबूत वोट बैंक के रूप में उभरी हैं. उन्हें अब केवल समाज का हिस्सा नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति माना जा रहा है. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनावों में यह साफ नजर आया कि महिलाएं किसी भी चुनाव में जीत-हार का फैसला करने में अहम भूमिका निभा रही हैं. इसका मतलब है कि महिलाएं अब अपने आप में एक मजबूत वोट बैंक बन चुकी हैं.
दिल्ली में आगामी चुनावों को देखते हुए आम आदमी पार्टी (AAP) और कांग्रेस दोनों ने महिलाओं को लुभाने के लिए मासिक भत्ते की घोषणा की है. आम आदमी पार्टी ने महिला सम्मान योजना के तहत 2100 रुपये प्रति माह देने का वादा किया है. कांग्रेस ने प्यारी दीदी योजना के तहत 2500 रुपये प्रति माह का वादा किया है. इन योजनाओं का उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना और उनके परिवारों को राहत देना है.
2024 के आम चुनाव में 2019 की तुलना में 1.8 करोड़ ज्यादा महिलाएं मतदान करने पहुंचीं. एसबीआई रिसर्च रिपोर्ट में बताया गया है कि यह बदलाव महिलाओं पर केंद्रित योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का नतीजा है. एसबीआई के अर्थशास्त्रियों ने बताया है कि ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ जिसमें महिलाओं को घर खरीदने में मदद मिलती है और ‘मुद्रा योजना’ ने महिलाओं को वोट देने के लिए प्रोत्साहित किया है.
दिल्ली में अचानक क्यों बढ़ी महिला वोटर्स की संख्या?
दिल्ली में चुनाव से पहले वोटर लिस्ट में काफी ज्यादा नए नाम जुड़े हैं. चुनाव आयोग को पिछले तीन हफ्तों में नए वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए बहुत सारे आवेदन मिले हैं. खास बात यह है कि नए वोटरों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा है. दिल्ली के मुख्य चुनाव अधिकारी ने बताया कि वोटर लिस्ट में 3 लाख से ज्यादा नए वोटर जुड़े हैं. इनमें 96,426 महिलाएं और 70,873 पुरुष हैं.
दिल्ली में अचानक मतदाता बनने की होड़ का कारण आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रमुख अरविंद केजरीवाल की महिलाओं के लिए बड़ी घोषणा को माना जा रहा है. केजरीवाल ने वादा किया है कि अगर उनकी पार्टी फिर से सत्ता में आई, तो मुख्यमंत्री महिला सम्मान योजना के तहत महिलाओं को दी जाने वाली राशि 1000 से बढ़ाकर 2100 प्रति माह कर दी जाएगी. इस योजना का फायदा उठाने के लिए दिल्ली का रजिस्टर्ड वोटर होना सबसे प्रमुख शर्त है.
आखिर चुनाव में रेवड़ियों से महिलाओं को ही क्यों किया जाता है टारगेट?
इस पर एबीपी न्यूज ने वरिष्ठ पत्रकार पंकज शुक्ल से बात की. उन्होंने बताया, असल में भारत शुरू से भावना प्रधान देश रहा है. टीवी पर जब रामायण-महाभारत या कोई धार्मिक सीरियल देखते हैं तो वहां भी महिलाओं को ही ज्यादा टारगेट किया जाता है. क्योंकि ये माना जाता है कि महिलाएं भावुक होती हैं. इन भावनाओं को कैश कराने का फॉर्मूला टेलीविजन से राजनीति को मिला है. हर महीने दो-ढाई हजार देकर साल का 24-30 हजार रुपये महिला को मिलता है, लेकिन अगर कैलकुलेटर किया जाए कि महिला साल में कितनी खरीददारी करती है और उसपर कितना टैक्स देती है तो पता चल जाएगा महिला का पैसा लेकर ही सरकार महिला को दे रही है.
वरिष्ठ पत्रकार पंकज शुक्ल ने आगे बताया, चुनाव आयोग की रिपोर्ट बताती है कि जहां-जहां महिलाओं के लिए रेवड़ियों की घोषणाएं हुई हैं, वहां महिलाओं की वोटिंग का परसेंटेज बढ़ गया है. महाराष्ट्र लाडली बहना योजना की घोषणा होने के बाद महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत बढ़ गया. माना जा सकता है कि ये भावनाओं को भड़काने की राजनीति है. इन भावनाओं का टारगेट कभी महिलाएं होती हैं, कभी पुरुष होते हैं. क्योंकि महिला घर की लक्ष्मी हैं और लक्ष्मी को लक्ष्मी मिले, इससे अच्छा भड़काने का काम क्या हो सकता है.
क्या यही महिला सशक्तिकरण है?
एबीपी न्यूज ने सामाजिक कार्यकर्ता शबनम खान से भी बात की. उन्होंने महिला सशक्तिकरण का मतलब बताया. उन्होंने कहा, ‘महिला सशक्तिकरण तब होगा जब उन्हें रोजगार मिलेगा, उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जाएगा. ऐसे फ्री किस्त की बात कहकर महिला सशक्तिकरण का ढोंग करने जैसा है.’
शबनम खान ने कहा, ‘महिला सशक्तिकरण के नाम पर तमाम तरह की योजनाओं का ऐलान किया जाता है. लेकिन असल में ये एक तरह से महिलाओं को अपमानित करना है. बात रोजगार की होनी चाहिए. अगर रोजगार होगा तो किसी तरह की ‘किस्त’ की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. क्योंकि, आज महिलाओं के पास रोजगार नहीं है, तभी ये नेता उन्हें ऐसे प्रलोभन देते हैं. रोजगार से चाहें 2100 रुपये कमाएं या 21 हजार कमाएं. ये हमारे मेहनत की कमाई होगी.’
महिलाओं को टारगेट करने की राजनीतिक सोच क्या है?
वरिष्ठ पत्रकार पंकज शुक्ल का कहना है कि महिलाएं सबसे सॉफ्ट टारगेट होती हैं. वह बहुत ज्यादा तर्कों में नहीं जाती हैं. वह ये देखती हैं कि त्वरित लाभ क्या हो रहा है. त्वरित लाभ के चलते ही शायद वह उन पार्टियों को वोट देती हैं जहां फ्रीबीज घोषणाएं होती हैं. इसमें कोई एक पार्टी दोषी नहीं है. पश्चिम बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक, यूपी से लेकर आंध्र प्रदेश, तेलंगाना तक हर पार्टी में हर जगह ही ऐसा होता आ रहा है. ये एक फॉर्मूला है जो बड़ी बीमारी बनता जा रहा है.
उन्होंने आगे कहा, ‘चुनाव के समय नेता घर-घर जाकर दौरा करते हैं. उस समय पुरुष बाहर होते हैं, महिलाएं घर में होती हैं तो महिलाओं को एक झुनझुना थमा दिया जाता है. जैसे बच्चा रो रहा होता है उसे झुनझुना दे दिया जाता है तो वह थोड़ी देर के लिए चुप हो जाता है. फ्रीबीज योजनाएं एक तरह का झुनझुना ही है.’
“ये एक ऐसा सिस्टम जिसकी जड़े हम खोखली कर रहे हैं. इससे देश को बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है. चुनाव आयोग को इस तरह नकदी योजनाओं पर रोक लगानी चाहिए. पैसा कोई भी नेता या पार्टी अपनी जेब से नहीं दे रहा है, आप जितना भी पैसा फ्री में पाएंगे, उतना ही आप खुद को एक उत्पाद में बदल रहे हैं. नेता आपको उत्पाद बना रहे हैं, आप इसे ले रहे हैं और बदले में टैक्स बढ़ता जा रहा है. हमारी जेब से लेकर हमें ही दिया जा रहा है.”
वहीं सामाजिक कार्यकर्ता शबनम खान ने कहा, ‘ऐसी रेवड़ियों की सोच यही होती है कि चुनाव में महिलाएं उन्हें बस वोट डाल दें. देश की 50 प्रतिशत आबादी को अपने काबू में करने का तरीका है. इसे लुभावना लालच कहते हैं.’
क्या महिलाएं वास्तव में इन योजनाओं से प्रभावित होकर वोट भी देती हैं?
वरिष्ठ पत्रकार पंकज शुक्ल ने कहा, ‘100 परसेंट महिलाएं वोट देती हैं. अगर महिलाएं वोट नहीं गे रही होतीं, तो ये स्कीमें एक राज्य से दूसरे राज्य, दूसरे से तीसरे राज्य में नहीं जाती. इस स्कीम का चलन दक्षिण भारत से शुरू हुआ है, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री जयाललिता ने साड़ी और कुकर बांटना शुरू किया था. इससे पहले वहां चावल फ्री में बंटता था.’
“दक्षिण भारत में बहुत पैसे वाले नेता रहे हैं, उनकी अपनी खदानें थी. इसलिए तब उन्हें फ्री में सामान बांटने में दिक्कत नहीं थी. लेकिन आज राजनीतिक पार्टियां सरकार के फंड से फ्री चीजें बांट रही है. पहले जयाललिता खुद के पैसे से साड़ी बांटती थी, लेकिन अब सरकारी फंड से पैसा बंट रहा है. अभी देश के लिए नुकसान दायक हैं और आगे चलकर समाज के लिए भी नुकसान दायक होंगी.”
आखिर क्यों फ्रीबीज योजनाएं महिलाओं को लुभाती हैं?
शबनम खान का कहना है कि महिलाएं बिल्कुल ऐसी रेवड़ियों से प्रभावित होती हैं. गरीब तबके की महिलाओं के लिए ये ‘रेवड़ियां’ बहुत बड़ी बात है. 2100 रुपये महीने मिलने का मतलब उन्हें ऐसा लगता है जैसे सरकार ने उनके लिए बहुत कुछ कर दिया. हालांकि महिलाएं अब पहले से ज्यादा स्वतंत्र हुई हैं, वह अपनी मर्जी से फैसले लेती हैं, किसी के दबाव में आकर वोट नहीं डालती. जाति-धर्म के मामले में भी महिलाएं ज्यादा सशक्त हैं जो जाति-धर्म नहीं देखती, वह एक्टिव उम्मीदवार देखकर वोट करती हैं.
राजनीतिक दलों को महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कौन से ठोस कदम उठाने चाहिए?
इस पर शबनम खान ने कहा, ‘रोजगार मुहैया कराया जाए और घरेलू हिंसा से बचाना चाहिए. अगर महिला आर्थिक रूप से संपन्न होगी, तो डरेगी नहीं. अगर मैं आर्थिक रूप से मजबूत हूं तो कोई मुझे डरा धमका नहीं करता, न ही शोषण कर सकता है. इसलिए आर्थिक रूप से संपन्न होना महिलाओं के लिए सबसे बड़ी जरूरत है.’
उन्होंने आगे कहा, ‘जब एक पढ़ी-लिखी औरत के पास रोजगार नहीं होता है, तो उसे किसी के सहारे की जरूरत पड़ती है. समान अधिकार की बात होनी चाहिए. हालांकि, अगर कोई महिला गलत काम करती है तो उसे सजा भी बराबर मिलनी चाहिए. लेकिन पहले महिला को पुरुष के बराबर लाकर तो खड़ा करिए.’
महिला शक्ति का उदय: अब ‘रेवड़ी’ नहीं, हक चाहिए!
पैसे कमाने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने से महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ रहा है और वे अपने फैसले खुद लेने लगी हैं. इसका असर राजनीति पर भी दिख रहा है, जहां महिलाएं अब अपने पतियों से अलग सोच रखती हैं और वोट भी उसी हिसाब से देती हैं. राजनीतिक दल महिलाओं को सिर्फ ‘लाभार्थी’ समझते हैं, लेकिन अब महिलाएं इससे ज्यादा चाहती हैं. वे समाज में अपना हक मांग रही हैं और सिर्फ ‘रेवड़ी’ यानी मुफ्त की चीजों से संतुष्ट नहीं हैं.
इस साल होने वाले दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनावों में महिलाएं निर्णायक भूमिका निभाएंगी. पिछले चुनावों में अरविंद केजरीवाल और नीतीश कुमार की जीत में महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान था. महिलाएं धर्म और जाति से ऊपर उठकर वोट देती हैं. आज महिलाएं उन कुछ वोटर ग्रुप्स में से एक हैं जो धर्म और जाति के बंधनों से मुक्त होकर अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट देती हैं.
महिलाओं का बढ़ता राजनीतिक प्रभाव यह साबित करता है कि वे अब सिर्फ समाज की परछाई नहीं, बल्कि एक अहम राजनीतिक ताकत बन गई हैं. चुनावी वादे उन्हें प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन असली बदलाव तभी आएगा जब उनकी बुनियादी समस्याओं को हल किया जाएगा.







