भारत भले ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी डिजिटल अर्थव्यवस्था बन चुका है, लेकिन डिजिटल खर्च के मामले में 28वें नंबर पर है. मतलब ये है कि भारत में लोग डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल तो खूब हो रहा है, लेकिन ऑनलाइन ज्यादा खर्च नहीं कर रहे हैं. जैसे, ऑनलाइन शॉपिंग, डिजिटल पेमेंट, ऑनलाइन सब्सक्रिप्शन में लोग उतना पैसा नहीं लगा रहे हैं जितना दूसरे देशों में लोग करते हैं.
भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (ICRIER) के प्रोसस सेंटर फॉर इंटरनेट एंड डिजिटल इकॉनमी (CIDE) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने कुल मिलाकर डिजिटलीकरण के मामले में अच्छी तरक्की की है, लेकिन एक आम भारतीय के लिए डिजिटलीकरण का स्तर अभी भी कम है.
रिपोर्ट में डिजिटल दुनिया को मापने के लिए CHIPS नाम का फंडा इस्तेमाल किया गया है, जो टेक्नोलॉजी, पैसे और समाज सब पर नजर रखता है.
भारत: डिजिटल दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा खिलाड़ी
डिजिटल रैंकिंग में भारत सिर्फ चीन और अमेरिका से पीछे है, जबकि दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और सिंगापुर जैसे देशों से आगे निकल चुका है. भारत में मोबाइल और इंटरनेट यूजर्स की संख्या दुनिया में दूसरे स्थान पर है. प्रति स्मार्टफोन डेटा खपत दुनिया के कई देशों से अधिक है. 5G नेटवर्क की शुरुआत और विस्तार अन्य देशों की तुलना में तेजी से हो रहा है. देश में रोजाना करोड़ों डिजिटल ट्रांजैक्शन किए जाते हैं.
डिजिटल अर्थव्यवस्था में तेजी से हुई प्रगति सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल साउथ (विकसित हो रहे देशों) के उदय की एक बड़ी कहानी का हिस्सा है. डिजिटल अर्थव्यवस्था में ब्राजील 10वें और थाईलैंड 12वें स्थान पर है. अफ्रीकी देश नाइजीरिया 18वें स्थान पर आ गया है और उसने कई G7 देशों (जैसे कनाडा, इटली और फ्रांस) को पीछे छोड़ दिया है. सिंगापुर इस पैमाने पर एक अलग उदाहरण है. उसकी जनसंख्या बहुत कम होने के बावजूद छठे स्थान पर है.
ग्लोबल साउथ के देश अब डिजिटल क्रांति में पश्चिमी देशों को टक्कर दे रहे हैं. भारत, चीन, ब्राजील, थाईलैंड और नाइजीरिया जैसे देशों का तेजी से आगे बढ़ना दिखाता है कि विकासशील देश वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका निभाएंगे.
भारत CHIPS कंबाइंड रैंकिंग में 8वें स्थान पर
CHIPS रैंकिंग देशों की डिजिटल अर्थव्यवस्था को मापने का एक तरीका है. भारत ने G32 देशों में CHIPS कंबाइंड रैंकिंग में आठवां स्थान हासिल किया है. यह रैंकिंग देशों की डिजिटलाइजेशन की स्थिति को दर्शाती है. भारत से आगे के सात देश हैं: संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, डेनमार्क, यूनाइटेड किंगडम और जर्मनी.
डिजिटल इंडिया: क्या है कमजोरियां?
भारत ने डिजिटल दुनिया में काफी तरक्की की है, लेकिन अभी भी कुछ कमजोरियां हैं जिन पर ध्यान देने की जरूरत है. खासतौर पर इंटरनेट कनेक्टिविटी के मामले में भारत को अभी भी काफी आगे बढ़ना बाकी है. 32 देशों के अध्ययन में भारत ‘कनेक्ट’ पैमाने पर 18वें स्थान पर है. भारत में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इंटरनेट और स्मार्टफोन यूजर्स का नेटवर्क है, लेकिन 40% से ज्यादा लोग अभी भी इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते हैं और 50% से ज्यादा लोगों के पास स्मार्टफोन नहीं है.
अच्छी बात यह है कि चीजें बेहतर हो रही हैं. गांवों में इंटरनेट यूजर्स की संख्या शहरों की तुलना में दोगुनी तेजी से बढ़ रही है और स्मार्टफोन यूजर्स की संख्या डेढ़ गुना तेजी से बढ़ रही है. यह दिखाता है कि शहरों और गांव के बीच डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल का अंतर कम हो रहा है.
क्या डिजिटल दुनिया में अमेरिका-चीन का दबदबा कायम रहेगा?
डिजिटल नवाचार के मामले में अमेरिका अभी भी बादशाह बना हुआ है और चीन तेजी से उसकी बराबरी करने की कोशिश में है. अमेरिका में दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियां हैं और वह नई-नई डिजिटल तकनीक बनाने में सबसे आगे है. चीन भी अब पीछे नहीं है. वह नई तकनीकें बनाने में तेजी से तरक्की कर रहा है और अमेरिका को टक्कर देने की कोशिश में है.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के मामले में तो दोनों देशों ने बाकी दुनिया को काफी पीछे छोड़ दिया है. अमेरिका और चीन में ही दुनिया की 70% यूनिकॉर्न कंपनियां हैं और AI में होने वाले 80% निवेश इन्हीं दोनों देशों में होते हैं. अमेरिका और चीन नई तकनीकों को अपनाने में भी सबसे आगे हैं, जैसे इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), मेटावर्स और ऑगमेंटेड एंड वर्चुअल रियलिटी (AR/VR).
वहीं, भारत ‘इनोवेशन’ के मामले में 9वें स्थान पर है, जबकि प्रति व्यक्ति आय इस समूह में सबसे कम है. भारत निवेश और स्टार्टअप के मामले में चौथे स्थान पर है, यानी यहां नई कंपनियां शुरू हो रही हैं और उनमें पैसा भी लग रहा है. दुनिया की तीसरी सबसे ज्यादा यूनिकॉर्न कंपनियां भारत में हैं. यहां डीसेन्ट्रलाइज़्ड फाइनेंस (DeFi) का भी काफी इस्तेमाल हो रहा है, जिसमें बिना किसी बैंक या दूसरे बिचौलिए के पैसे का लेन-देन होता है. लेकिन भारत AI के मामले में पीछे है (13वें स्थान पर). ऐसा इसलिए है क्योंकि यहां AI के लिए जरूरी आधारभूत सुविधाएं कम हैं और अभी उतनी रिसर्च नहीं हो रही है.
डिजिटलीकरण के लिए क्या मायने रखता है?
डिजिटल अर्थव्यवस्था को मापने वाले ज्यादातर वैश्विक इंडेक्स प्रति व्यक्ति आय पर जोर देते हैं लेकिन CHIPS इकॉनमी नामक नए तरीके से पता चलता है कि डिजिटलीकरण के लिए जनसंख्या और अर्थव्यवस्था का आकार (GDP) ज्यादा मायने रखते हैं.
अमेरिका, चीन और भारत इसी क्रम में बाकी सभी देशों से आगे हैं. भारत का ऊंचा स्कोर उसकी बड़ी जनसंख्या के कारण है, जबकि अमेरिका का ऊंचा स्कोर उसकी बड़ी अर्थव्यवस्था के कारण है. चीन को दोनों ही मामलों में फायदा है. प्रति व्यक्ति आय का CHIPS इकॉनमी स्कोर पर उतना असर नहीं दिखता है.
इसका मतलब है कि डिजिटलीकरण के लिए सिर्फ प्रति व्यक्ति आय ही काफी नहीं है. बड़ी जनसंख्या और बड़ी अर्थव्यवस्था भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. भारत जैसे देश जहां जनसंख्या ज्यादा है और अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, डिजिटल दुनिया में तेजी से आगे बढ़ सकते हैं.
डिजिटल इंडिया: आगे बढ़ने के लिए क्या ‘खर्च’ करना जरूरी है?
डिजिटल इंडिया को और आगे बढ़ाने के लिए सिर्फ पैसा खर्च करना ही नहीं, बल्कि सही दिशा में निवेश करना जरूरी है. ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में हाई-स्पीड इंटरनेट की पहुंच बढ़ाने के लिए निवेश करना जरूरी है. 5G और फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क को पहले से ज्यादा मजबूत बनाना होगा. क्लाउड स्टोरेज और डेटा सेंटर की क्षमता बढ़ानी होगी.
लोगों को डिजिटल टूल्स और इंटरनेट का इस्तेमाल करने के लिए प्रशिक्षित करना जरूरी है. स्कूलों में कंप्यूटर और डिजिटल टेक्नोलॉजी की शिक्षा को बढ़ावा देना होगा. डिजिटल सिस्टम को सुरक्षित बनाने के लिए साइबर सुरक्षा पर निवेश करना भी जरूरी है. इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, स्टार्टअप्स, साइबर सुरक्षा, सरकारी सेवाएं, हेल्थकेयर और कौशल विकास पर ध्यान देकर भारत अपनी डिजिटल अर्थव्यवस्था को और मजबूत कर सकता है.








