कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कनाडा की मेजबानी में आयोजित होने जा रहे जी-7 सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी को भी शामिल होने का न्योता दिया है। भारत जी-7 समूह का हिस्सा नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी आमंत्रण स्वीकार कर लिया है और सम्मेलन में जाने की पुष्टि की है। अब इसे लेकर कनाडा के नेताओं की प्रतिक्रिया सामने आई है। कनाडा के एक वकील और ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत के विधायक डलास ब्रोडी ने पीएम मोदी को जी-7 सम्मेलन में आमंत्रित करने के कनाडा सरकार के फैसले की तारीफ की।
G-7 की बैठक में भारत को न्योता
अलबर्टा प्रांत के कनानैसिक्स में 15 से 17 जून को होने वाले G-7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री को न्योता मिल गया है. विश्व के सात विकसित देशों G-7 गुट के शिखर सम्मेलन में भारत को पिछले छह वर्षों से लगातार विशेष आमंत्रित देशों के तौर पर बुलाया जा रहा था. इस बार अभी तक यह निमंत्रण न मिलने भारत के शत्रु देश मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे. यह सच है कि 2018 से भारत और कनाडा के रिश्ते सामान्य नहीं थे. वहां पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो किसी न किसी बहाने भारत पर आरोप लगाते ही रहते थे. भारत की सरकार उन्हें पसंद नहीं करती थी. 2023 की सितंबर में G-20 देशों के सम्मेलन में भाग लेने जब जस्टिन ट्रूडो नई दिल्ली आए थे तब उनका स्वागत बहुत फीके तरीके से हुआ था. मगर मौजूदा प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अलग राह पकड़ी.
भारत से सौहार्दपूर्ण रिश्ते बनाने का वायदा
कनाडा में मार्क कार्नी इसी वर्ष 14 मार्च को अंतरिम प्रधानमंत्री बने थे. जस्टिन ट्रूडो की अलोकप्रियता को देखते हुए लिबरल पार्टी ने जस्टिन ट्रूडो को इस्तीफा देने के लिए विवश किया. उनके विरुद्ध कंजर्वेटिव पार्टी के नेता पियरे पोइलिव्रे और NDP ने अविश्वास प्रस्ताव लाने का इरादा जाहिर किया था. इसलिए भी ट्रूडो ने इस्तीफा दे दिया था. मार्क कार्नी को लिबरल पार्टी ने नेता चुना और उन्हीं की अगुआई में मई में पार्टी ने पार्लियामेंट का चुनाव लड़ा. लिबरल पार्टी ने यह चुनाव जीता. मार्क कार्नी बैंक ऑफ कनाडा के अध्यक्ष और बैंक ऑफ इंग्लैंड के गवर्नर रह चुके थे. वे शांत प्रकृति के नेता हैं. वैसे वे राजनेता कम आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ अधिक हैं. ट्रंप के टैरिफ प्लान से निपटने के लिए उन्होंने नई रणनीति बनाई. उन्होंने भारत के सौहार्दपूर्ण रिश्ते रखने का वायदा भी किया था.
ट्रूडो ने चला था सिख दांव
कनाडा रूस के बाद दुनिया का दूसरे नम्बर का विशाल देश है. मगर जनसंख्या बहुत कम है. उसकी आबादी चार करोड़ से कुछ अधिक है. इसमें भी भारत वंशी लोगों की आबादी आठ प्रतिशत के आसपास है. पंजाबियों के लिए तो वह भारत के बाद दूसरा सबसे बड़ा निकट का देश है. ओंटारियो में टोरंटो के पास ब्रम्पटन और ब्रिटिश कोलम्बिया (BC) में वैंकूवर के करीब हरे में तो 90 प्रतिशत आबादी सिख है. गरमुखी लिपि में लिखी पंजाबी भाषा को वहां मान्यता मिली हुई है. अंग्रेजी और फ्रेंच के बाद गरमुखी पंजाबी भाषा का ज्ञान कनाडा में नौकरी पाने के लिए सहायक होता है. इसलिए पंजाबी हर वर्ष हजारों की संख्या में कनाडा चले जाते हैं. सिखों की आबादी अधिक होने के कारण जस्टिन ट्रूडो 2018 में जब भारत आए तो स्वर्ण मंदिर भी गए और ऑपरेशन ब्लू स्टार की याद उन्हें दिला आए.
भारत के अंदरूनी मामलों में दखल
इसके बाद 2020 में जब कृषि कानूनों की वापसी को लेकर किसानों ने दिल्ली के किनारों पर धरना दिया तब सिख किसानों की तरफ़ से ट्रूडो ने फिर भारत सरकार के विरुद्ध एक बयान दे दिया. इससे नरेंद्र मोदी सरकार नाराज हो गई और उन्होंने ट्रूडो को दूसरे संप्रभु देश के अंदरूनी मामले में दखल देने का आरोप लगाया. जस्टिन ट्रूडो की सरकार सिख सांसदों और अतिवादी पार्टी NDP के उस वक्त के अध्यक्ष जगमीत सिंह के सहयोग से चल रही थी इसलिए वे वही करते जो जगमीत उनसे कहते. इसके अलावा वे अमेरिकी प्रेसिडेंट जो बाइडेन के मोहरे थे. इसलिए उन्होंने एक कनाडाई सिख नागरिक निज्जर की हत्या में भारत पर अंगुली उठाई. इस वजह से भारत से उनके रिश्ते बहुत कटु हो गए थे. नवंबर में जब USA में बाइडेन हारे तब ट्रूडो की विदाई भी तय मानी जा रही थी.
सिख अतिवादियों के हौसले पस्त
नए प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने आते ही भारत के साथ सहयोग पर जोर दिया. उनके इस भरोसे के साथ ही कनाडा में पल रहे सिख उग्रवादियों के हौसले पस्त हो गए. फिर ट्रंप के टैरिफ वार ने भी कनाडा को दुनिया में अन्य देशों के साथ दोस्ती और भरोसे का रिश्ता बनाने की तरफ प्रेरित किया. भारत एशिया में तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था है. हालांकि चीन से वह पीछे है. लेकिन चीनी चालबाजियों से कार्नी भी वाकिफ हैं. टोरंटो के कई इलाकों में चीन ने अपने थाने खोल रखे हैं. तीन साल पहले जब यह खबर मीडिया में आई तब कनाडा सरकार के कान खड़े हुए. चीन ने सफाई दी कि ऐसा उसने अपने देश के प्रवासियों की सुरक्षा के लिए किया था. किंतु इसके बाद शक की सुई चीन की तरफ मुड़ गई थी.
कार्नी भारत से अच्छे संबंध रखेंगे
कनाडा की नई संसद के पहले सत्र का उद्घाटन करने जब किंग जॉर्ज ऑटवा गए, तब उन्होंने कार्नी को भारत से बेहतर रिश्ते रखने को भी कहा था. इंग्लैंड के संवैधानिक प्रमुख किंग जॉर्ज कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और कुछ अफ्रीकी तथा कुछ दक्षिण अमेरिकी देशों के भी संविधान प्रमुख हैं. उनकी संसद को शुरू करने वे या उनका कोई प्रतिनिधि इन देशों में जाता है. पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो भी किंग से मिलने के लिए उनके पास पहुंचे पर उन्होंने अलग से समय नहीं दिया. कार्नी अपने देश में भारतवासियों की ताकत पहचानते हैं, इसीलिए उन्होंने अनिता आनंद को अपना विदेश मंत्री बनाया हुआ है. जो लोग नरेंद्र मोदी को G-7 में अभी तक न बुलाए जाने से खुशियां मना रहे थे, उन पर जरूर वज्रपात हुआ है.
कनाडाई विधायक ने कहा कि भारत और कनाडा के नेताओं की मुलाकात से दोनों देशों के संबंध बेहतर होंगे। भारत एक महान देश है और भारत के शिक्षित, शानदार, प्रेरक लोगों और लोकतांत्रिक और एक विशाल बाजार वाले देश के साथ व्यापार समझौता कनाडा के हित में है।
खालिस्तानी कट्टरपंथ को लेकर कही बड़ी बात
भारत और कनाडा के संबंधों में खटास की वजह कनाडा की पूर्व की सरकार द्वारा खालिस्तानी कट्टरपंथियों को संरक्षण देना था। जब इसे लेकर ब्रोडी से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि ‘खालिस्तानी कट्टरपंथ एक बड़ी समस्या है। इसमें कोई शक नहीं है कि कनाडा में रहने वाले हिंदू और सिख समुदाय के लोग इन हालातों से खुश नहीं हैं। उम्मीद है कि संघीय सरकार और भारत के बीच इस मुद्दे पर बात होगी। ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत में भी खालिस्तानी कट्टरपंथ बड़ी समस्या है। यह कई लोगों के लिए डरावना है और अब समय आ गया है कि इससे सख्ती से निपटा जाए। मुझे उम्मीद है कि दोनों देशों के नेताओं की मुलाकात में इस मुद्दे पर भी बात होगी।’








