आधुनिक दुनिया में अब गठबंधन विचारधारा से नहीं, बल्कि तात्कालिक सुरक्षा जरूरतों से तय होते…………………….

सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए पारस्परिक रक्षा समझौते ने दक्षिण एशिया और खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा संरचना को गहराई से प्रभावित करने की संभावना पैदा कर दी है। समझौते में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी एक देश पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा। यह केवल भाईचारे […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
मंगलवार, 23 सितंबर 2025, 07:49 AM 6 मिनट read
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आधुनिक दुनिया में अब गठबंधन विचारधारा से नहीं, बल्कि तात्कालिक सुरक्षा जरूरतों से तय होते…………………….
Photo: UB India News Archive

सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए पारस्परिक रक्षा समझौते ने दक्षिण एशिया और खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा संरचना को गहराई से प्रभावित करने की संभावना पैदा कर दी है। समझौते में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी एक देश पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा। यह केवल भाईचारे का प्रतीक नहीं, बल्कि एक ऐसी रणनीतिक पुनर्संरचना है, जो युद्ध, शक्ति शून्यता और बदलते गठबंधनों से जूझ रहे क्षेत्र में नई चुनौतियां उत्पन्न करती है और भारत की सुरक्षा व कूटनीतिक रणनीति के लिए गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

इस समझौते की तात्कालिक पृष्ठभूमि पश्चिम एशिया की उथल-पुथल है। हाल ही में इस्राइल द्वारा कतर की राजधानी दोहा पर किया गया हमला, जिसमें वरिष्ठ हमास नेताओं के ठिकाने को निशाना बनाया गया और छह लोगों की मौत हुई, ने अरब जगत को झकझोर दिया।  महत्वपूर्ण यह रहा कि इस हमले पर अमेरिका, जो परंपरागत रूप से खाड़ी क्षेत्र का सुरक्षा प्रदाता माना जाता रहा है, ने लगभग चुप्पी साधे रखी। 2019 में सऊदी तेल ठिकानों पर ईरान समर्थित बलों के हमले के बाद से ही अमेरिकी सुरक्षा गारंटी को लेकर शंकाएं बढ़ रही थीं। इस बार की चुप्पी ने यह संदेश और स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका अब पहले जैसी सुरक्षा छतरी देने में इच्छुक या सक्षम नहीं है। सऊदी अरब के लिए यह एक बड़ा संकेत था कि उसे अपने सुरक्षा विकल्पों का दायरा बढ़ाना होगा और अमेरिकी अनिश्चितता के बीच वैकल्पिक साझेदारों को खोजना होगा।

यहीं पर पाकिस्तान एक स्वाभाविक सहयोगी के रूप में सामने आता है। लंबे समय से रियाद का निकट साझेदार और एकमात्र मुस्लिम बहुल परमाणु शक्ति होने के कारण पाकिस्तान सऊदी अरब के लिए विशेष महत्व रखता है। समझौता भले ही रक्षात्मक भाषा में प्रस्तुत किया गया हो, पर इसका रणनीतिक अर्थ कहीं अधिक गहरा है। पाकिस्तानी अधिकारी कहते हैं कि यह समझौता किसी विशेष देश के खिलाफ नहीं है और इसकी तुलना नाटो के सामूहिक सुरक्षा सिद्धांत से की जा सकती है। इसके बावजूद, इसका समय और प्रसंग स्पष्ट रूप से बताता है कि यह इस्राइल की हालिया कार्रवाइयों और बदलते क्षेत्रीय समीकरणों की प्रतिक्रिया है। इस समझौते के प्रभाव अनेक स्तरों पर दिख सकते हैं। खाड़ी में यह पहले से अस्थिर माहौल को और जटिल बनाता है। अमेरिका द्वारा कराए गए अब्राहम समझौते, जिनका उद्देश्य अरब देशों और इस्राइल को ईरान विरोधी मोर्चे में जोड़ना था, गाजा संघर्ष और इस्राइल की आक्रामक कार्रवाइयों से कमजोर पड़ चुके हैं। सऊदी अरब और इस्राइल के बीच संबंध सामान्य करने की योजनाएं अब ठंडी पड़ गई हैं। पाकिस्तान के साथ रक्षा गठबंधन कर रियाद यह संकेत दे रहा है कि वह अमेरिकी और इस्राइली प्रभाव से बाहर अपनी स्वतंत्र सुरक्षा नीति अपनाएगा। इससे अन्य खाड़ी देश भी इसी तरह की व्यवस्थाओं की ओर बढ़ सकते हैं, जिससे पुरानी सुरक्षा संरचना और अधिक ढीली पड़ सकती है।

दक्षिण एशिया के लिए भी यह विकास कम महत्वपूर्ण नहीं है। पाकिस्तान द्वारा सऊदी अरब को परमाणु छतरी देने की पेशकश पहले से तनावपूर्ण परमाणु संतुलन को और जटिल बनाती है। भारत, जिसके पास अनुमानतः लगभग 172 परमाणु हथियार हैं, अब ऐसी स्थिति का सामना करेगा, जिसमें पाकिस्तान की परमाणु क्षमताएं अप्रत्यक्ष रूप से एक बड़े खाड़ी देश की सुरक्षा से जुड़ सकती हैं। यद्यपि कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है कि सऊदी अरब को परमाणु हथियारों तक पहुंच मिलेगी, परंतु पाकिस्तानी परमाणु सुरक्षा की संभावना ही निवारक समीकरण को बदलने के लिए पर्याप्त है। भारत की कूटनीतिक स्थिति अब और संवेदनशील हो गई है। पिछले एक दशक में नई दिल्ली ने सऊदी अरब के साथ ऊर्जा, व्यापार और आतंकवाद निरोध में मजबूत साझेदारी बनाने में काफी निवेश किया है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वह इस समझौते के प्रभावों का अध्ययन करेगा और उम्मीद करता है कि रियाद दोनों देशों के हितों और संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखेगा। पर हकीकत यह है कि यह समझौता नई अनिश्चितताओं को जन्म देता है। भारत को अब रियाद के साथ अपने रिश्ते बनाए रखते हुए पाकिस्तान–सऊदी रिश्तों से पैदा हो सकने वाले सुरक्षा जोखिमों से सतर्क रहना होगा।

यह समझौता व्यापक भू-राजनीतिक संकेत भी देता है। यह दर्शाता है कि दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया, दोनों में अमेरिकी प्रभाव धीरे-धीरे घट रहा है। वाशिंगटन की अनिर्णयता ने एक शून्य पैदा किया है, जिसे क्षेत्रीय शक्तियां भरने की कोशिश कर रही हैं। चीन, जो पहले से ही पाकिस्तान और सऊदी अरब, दोनों का करीबी साझेदार है, इन घटनाओं को ध्यान से देखेगा, जबकि ईरान भी सतर्क रहेगा, क्योंकि वह रियाद और इस्लामाबाद, दोनों का प्रतिद्वंद्वी है। एक संभावित परमाणु आयाम वाले सऊदी–पाक सुरक्षा अक्ष का उभार तेहरान के लिए भी चिंता का कारण बनेगा।

भारत के लिए आगे की राह में रणनीतिक धैर्य और संतुलन आवश्यक होगा। वह सऊदी अरब को नाराज नहीं कर सकता, जो ऊर्जा आपूर्ति और आतंकवाद विरोधी सहयोग का अहम भागीदार है। साथ ही, उसे पाकिस्तान की खाड़ी में बढ़ती भूमिका को लेकर सजग रहना होगा। हाल के वर्षों में भारत का इस्राइल के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग भी सावधानी से आगे बढ़ाना होगा, ताकि अरब देशों में गलत संदेश न जाए। चुनौती यही है कि भारत इस्राइल और अरब जगत, दोनों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखते हुए अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं से समझौता न करे।

सऊदी–पाक रक्षा समझौता याद दिलाता है कि आधुनिक दुनिया में गठबंधन अक्सर विचारधारा से नहीं, बल्कि तात्कालिक सुरक्षा आवश्यकताओं से तय होते हैं। यह लंबे समय से परदे के पीछे मौजूद रिश्ते को औपचारिक रूप देता है और इसके पीछे की रणनीतिक गणनाओं को उजागर करता है। भारत के लिए यह कोई संकट नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि बदलते क्षेत्रीय परिदृश्य में पुरानी धारणाओं पर भरोसा नहीं किया जा सकता। आने वाले महीने बताएंगे कि नई दिल्ली इस नए और अनिश्चित सुरक्षा परिदृश्य में कितनी कुशलता से संतुलन साध पाती है, जहां दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की सीमाएं धुंधली होती जा रही हैं और दूरस्थ राजधानियों की गतिविधियां तत्काल प्रभाव डाल रही हैं।

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