क्या यूजीसी के नाम पर सवर्णों को क्या डर?

1990 का साल था. देश में राम लहर चल रही थी. इस राम लहर के बीच केंद्र की वीपी सिंह सरकार ने बीपी मंडल की अध्यक्षता वाली मंडल कमेटी की शिफारिशों को मानने का फ़ैसला कर लिया. देशभर में मानों बवाल मच गया. सवर्ण सड़कों पर थे. सवर्णों के बच्चों के भविष्य के खतरे के […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
बुधवार, 28 जनवरी 2026, 05:17 AM 5 मिनट read
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क्या यूजीसी के नाम पर सवर्णों को क्या डर?
Photo: UB India News Archive

1990 का साल था. देश में राम लहर चल रही थी. इस राम लहर के बीच केंद्र की वीपी सिंह सरकार ने बीपी मंडल की अध्यक्षता वाली मंडल कमेटी की शिफारिशों को मानने का फ़ैसला कर लिया. देशभर में मानों बवाल मच गया. सवर्ण सड़कों पर थे. सवर्णों के बच्चों के भविष्य के खतरे के नाम पर कहीं विरोध प्रदर्शन हुआ तो कहीं पुतले जलाये गए. किसी ने मशाल जुलूस निकाला, तो कोई खून से चिट्ठी लिखकर अपना विरोध दर्ज करा रहा था. नौबत ये आ गई थी कि प्रदर्शनकारी आगजनी और तोड़ फोड़ करने लगे. कुछ-कुछ वैसा ही माहौल 36 साल बाद यूजीसी की गाइडलाइन को बनाए जाने की कोशिश होती दिखाई दे रही है.

जाति है जो जाती नहीं

सड़कों पर सवर्णों का विरोध प्रदर्शन हो रहा है. 1990 की ही तरह 2026 में भी सवर्ण सड़कों पर आ गए हैं. कोई खून से चिट्ठी लिख रहा, कोई मशाल जला रहा, कोई नारे लगा रहा तो कोई मुंडन करा रहा. ये सब करने वाले सवर्ण यानी सामान्य वर्ग के लोग हवाला यूजीसी की नई गाइडलाइन का दे रहे हैं. निशाने पर केंद्र सरकार ही है. आरोप सवर्णों के भविष्य से खिलवाड़ करने का है. फर्क ये है कि 1990 वाला आंदोलन आरक्षण को लेकर था, ये गाइडलाइन में भेदभाव के दावे को लेकर है.

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गाइडलाइन की तुलना रॉलेट एक्ट से 

यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन यानी यूजीसी की नई गाइडलाइन की तुलना रॉलेट एक्ट 1919 से की जा रही है. प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी देते हुए कहा है कि सवर्ण आँखें मूंदकर बीजेपी का समर्थन करता रहा है लेकिन अब अगर ये गाइडलाइन रोल बैक नहीं की गई तो सवर्ण समाज बीजेपी का बहिष्कार करेगा. सवर्णों में सबसे मुखर ब्राह्मण और क्षत्रिय संगठन हैं. इनका कहना है कि इस नई गाइडलाइन को लाने की कोई ज़रूरत नहीं थी लेकिन बीजेपी ने आरक्षित वर्ग को साधने के लिए सवर्णों के हितों को दरकिनार कर दिया.

सवर्णों को डर क्या है? 

सवाल ये है कि आख़िर वो कौन सा डर है जो सवर्णों को प्रदर्शन करने को मजबूर कर रहा. दरअसल सवर्णों का दावा है कि यूजीसी गाइडलाइन 2012 और नई गाइडलाइन में दो चीज़ें ऐसी हैं, जो सवर्णों के बच्चों का भविष्य ख़राब कर सकती हैं. पहली है झूठी शिकायत पर कार्रवाई ना होने का डर. पहले कोई आरक्षित वर्ग का व्यक्ति अगर शिकायत करता था तो शिकायत झूठी पाये जाने पर उस पर कार्रवाई का प्रावधान था. अब स्पष्टता ना होने की वजह से शिकायतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है. दूसरा मुद्दा है उस समिति का जिसमें एससी, एसटी, ओबीसी, महिला और दिव्यांग का प्रतिनिधित्व ज़रूरी बताया गया है. सवर्णों को लगता है कि समिति में बहुमत आरक्षित वर्ग का होने से झूठी शिकायतों को भी सच मानकर कार्रवाई की जा सकती है.

बीजेपी फिलहाल चुप, विपक्ष भी असमंजस में 

यूजीसी गाइडलाइन को लेकर बीजेपी बैकफुट पर है. हैरानी इस बात को लेकर है कि विपक्ष भी खुलकर इस मुद्दे पर कुछ बोल नहीं पा रहा. वजह ये है कि सवर्णों का समर्थन करें तो आरक्षित वर्ग नाराज़ हो जाये और नई गाइडलाइन का विरोध करें तो सवर्ण छिटक जायेंगे. इसी वजह से विपक्ष ने भी इतने बड़े आंदोलन के बावजूद पर्याप्त चुप्पी साध रखी है. कांग्रेस के कुछ नेता ये ज़रूर कह रहे कि उनके शासनकाल के दौरान बनी गाइडलाइन को लागू किया जाना चाहिए लेकिन कांग्रेस पार्टी ने कोई लाइन तय नहीं की है. सपा के नेताओं का हाल ये है कि वो सफ़ाई दे रहे हैं कि उनकी पार्टी इस मुद्दे पर कोई बयान नहीं देगी. यानी सत्ता और विपक्ष, दोनों के गले की हड्डी बन गई है ये नई गाइडलाइन.

अब आगे क्या होगा? 

यूजीसी गाइडलाइन को लेकर तमाम संगठन सड़कों पर हैं. ऐसे में सरकारी सूत्रों का दावा है कि सरकार जल्द यूजीसी गाइडलाइन के रिव्यू के लिए एक समिति का गठन कर सकती है. ये समिति गाइडलाइन का रिव्यू करने के बाद आपत्तियों पर सुधार करने का प्रस्ताव सरकार को दे सकती है. उन प्रस्तावों को मानकर सरकार यूजीसी से नई गाइडलाइन जारी करने को कह सकती है. यानी अमेंडमेंट करके गलती का सुधार करने की कोशिश की जाएगी. इस बीच विरोध प्रदर्शन करने वाले संगठनों का कहना है कि उन्हें अमेंडमेंट नहीं बल्कि रोल बैक (गाइडलाइन को वापस लेने) से कम कुछ स्वीकार नहीं है. फिलहाल बीजेपी ने अपने नेताओं को यूजीसी पर चुप रहने को कहा है. पार्टी स्थितियों का आंकलन करके आगे की रणनीति तय करेगी. इसी वजह से विवादों से बचने के लिए नेताओं को चुप कराया गया है.

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