बीएनपी को मिली प्रचंड जीत ने दक्षिण एशिया की राजनीति में एक नया अध्याय खोला …………………….

बांग्लादेश के आम चुनाव में तारिक रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को मिली प्रचंड जीत ने दक्षिण एशिया की राजनीति में एक नया अध्याय तो खोला ही है, जनता ने भी स्पष्ट जनादेश देकर यह संकेत दिया है कि वह निर्णायक नेतृत्व और स्थिर शासन चाहती है। ऐसा तकरीबन बीस वर्ष बाद […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शनिवार, 14 फरवरी 2026, 04:02 AM 6 मिनट read
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बीएनपी को मिली प्रचंड जीत ने दक्षिण एशिया की राजनीति में एक नया अध्याय खोला …………………….
Photo: UB India News Archive

बांग्लादेश के आम चुनाव में तारिक रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को मिली प्रचंड जीत ने दक्षिण एशिया की राजनीति में एक नया अध्याय तो खोला ही है, जनता ने भी स्पष्ट जनादेश देकर यह संकेत दिया है कि वह निर्णायक नेतृत्व और स्थिर शासन चाहती है। ऐसा तकरीबन बीस वर्ष बाद होगा, जब बांग्लादेश में बीएनपी की सरकार बनेगी, क्योंकि 2008 से 2024 के दौरान वहां शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सत्ता में रही थी। तारिक ऐसे वक्त में सत्ता संभालने जा रहे हैं, जब बांग्लादेश के भारत के साथ रिश्ते नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। दोनों देश चार हजार किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं, लिहाजा घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं। हालांकि, तारिक बांग्लादेश की नब्ज भी समझते हैं, जहां युवा शेख हसीना के प्रत्यर्पण के मुद्दे पर भारत के रुख को लेकर शंकित हैं। शायद इसीलिए, चुनाव में जीत के बाद बीएनपी ने हसीना को भारत से वापस बांग्लादेश लाकर मुकदमा चलाने की मांग पर फिर जोर दिया है। यह भी नहीं भूला जा सकता कि 2001 से 2006 के बीच बीएनपी का शासनकाल भारत-बांग्लादेश संबंधों के सबसे बुरे दौरों में से एक था। यही नहीं, पाकिस्तान का मुखौटा मानी जाने वाली जमात भी उस वक्त बीएनपी की सहयोगी थी। अच्छी बात यह है कि तारिक के नेतृत्व में बीएनपी का ताजा रुख न तो स्पष्ट रूप से भारत-विरोधी दिखा है और न ही खुल कर चीन का समर्थक। यह अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस की नीति से अलग है, जिन्होंने परंपराओं से अलग हटते हुए अपनी महत्वपूर्ण विदेश यात्रा के लिए चीन को भारत पर तरजीह दी थी और अपने पूरे कार्यकाल में पाकिस्तान को खुश करने का कोई मौका नहीं छोड़ा था। बांग्लादेश में सत्ता के परिवर्तन की अहमियत भारत भली-भांति समझता है, इसकी झलक तब मिली थी, जब खालिदा जिया खराब तबियत से जूझ रही थीं, और प्रधानमंत्री मोदी ने सार्वजनिक रूप से चिंता व्यक्त की थी, जिस पर बीएनपी ने तुरंत ही आभार भी व्यक्त किया था। इसी तरह, जिया के निधन के बाद भी विदेश मंत्री जयशंकर 2024 की अराजकता के बाद ढाका का दौरा करने वाले पहले भारतीय नेता बने थे। वस्तुत: बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के अंतरिम शासन वाले दौर, जो साफ तौर पर कट्टरता को प्रोत्साहन देने वाला था, के बाद तारिक रहमान की जीत भारत के लिए एक अवसर हो सकती है, बशर्ते सक्रिय, सतर्क और दूरदर्शी कूटनीति अपनाई जाए। विवाद के मुद्दों पर दोनों देशों को संवाद बढ़ाना होगा, ताकि अतीत की आशंकाओं को पीछे छोड़ा जा सके।

दोस्ती का संदेश, मगर नई सरकार के भावी रुख पर रहेगी पैनी नजर

आवामी लीग की अनुपस्थिति में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को बांग्लादेश आम चुनाव में मिली प्रचंड जीत पर भारत ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। जनादेश आने के बाद भावी पीएम नरेंद्र मोदी की बीएनपी के मुखिया तारिक रहमान से बात और उससे पहले दोनों देशों के बहुआयामी संबंधों को मजबूत करने की इच्छा जता कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पड़ोसी देश को सकारात्मक संदेश दिया है। हालांकि शेख हसीना के तख्तापलट के बाद निम्रतम स्तर पर पहुंचे दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्ते को पटरी पर लाने के लिए भारत चरणबद्ध तरीके से सावधानी के साथ कदम आगे बढ़ाएगा।

सरकारी सूत्र ने कहा कि भले ही चुनाव से मुख्य धारा की अहम पार्टी अवामी लीग अनुपस्थित रही, मगर उम्मीद है कि एक चुनी हुई सरकार अंतरिम सरकार की तरह व्यवहार नहीं करेगी। चूंकि अंतरिम सरकार का रुख एकपक्षीय था, इसलिए दोनों देशों के संबंध बेपटरी हो गए। अब जबकि एक चुनी हुई सरकार आने वाली है, तब उम्मीद है कि दोनों देशों के रिश्ते धीरे-धीरे पटरी पर आ सकते हैं। हालांकि जहां तक भारत के रुख की बात है तो हम नई सरकार का उन मुद्दों पर स्पष्ट रुख जानना चाहेंगे, जिसके कारण अंतरिम सरकार के रहते दोनों देशों के संबंध अपने निम्रतम स्तर पर पहुंच गए।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
कूटनीतिक विशेषज्ञ का मानना है कि अभी बहुत कुछ साफ होना जरूरी है। जहां तक आम चुनाव की बात है तो इसमें मुख्य खिलाड़ी अवामी लीग प्रतिबंधित था। इसकी जगह शेख हसीना के रहते अप्रत्यक्ष गठजोड़ से चलने वाली बीएनपी और जमात ए इस्लामी आमने सामने थी। खास बात यह है कि इस चुनाव में 2008 और 2018 की 80 फीसदी से अधिक की तुलना में महज 48 फीसदी मतदान हुए। ठीक उसी तरह जैसे 2024 में बीएनपी के बहिष्कार के कारण कम वोट पड़े। इसका मतलब है कि बीते दो चुनाव में क्रमश: बीएनपी और अवामी लीग के समर्थकों ने मतदान से दूरी बना ली थी। फिर जमात ए इस्लामी बीएनपी पर चुनाव में धांधली का आरोप लगा रहा है। उसका कहना है कि शेख हसीना के विरोध में फूटे आक्रोश के केंद्र में बीएनपी नहीं जमात ए इस्लामी है। ऐसे में सवाल है कि तारिक इस परिस्थिति से कैसे निपटेंगे। फिर उन पर युवाओं के आक्रोश के बीच उनकी इच्छा के अनुरूप नया बांग्लादेश बनाने का दबाव होगा। इसलिए हमें किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले थोड़ा इंतजार करना होगा।

नई सरकार की राह, चुनौतियों से भरी
मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार के अतार्किक और अपरिपक्वता के कारण रिश्ते पटरी से उतरे। सूत्र का मानना है कि चूंकि भौगोलिक जुड़ाव, सीमा प्रबंधन, साझा सुरक्षा, व्यापार, खाद्य सुरक्षा जैसे कई अहम मामले में जिस क्षेत्र में बांग्लादेश भारत की अनदेखी नहीं कर सकता। चुनी हुई सरकार की जिम्मेदारी अंतरिम सरकार की तुलना में ज्यादा है। ऐसे में नई सरकार को भारत के संदर्भ में परिपक्व भूमिका निभानी होगी।

यहां से मिलेंगे संकेत
सूत्र ने कहा कि अगर नई सरकार ने आते ही पूर्व पीएम शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मामला उठाया तो द्विपक्षीय रिश्ते में खटास बनी रहेगी। जिस प्रकार अंतरिम सरकार में रहते बांग्लादेश में कई तत्वों ने भारतीय भूभाग पर दावा जताया। अपने यहां हुई हत्याओं के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया, भारत की तुलना में पाकिस्तान और चीन को तरजीह दी, उससे स्थिति और बिगड़ गई। अब देखना होगा कि नई सरकार रिश्ते बिगाड़ने वाले इन मुद्दों पर क्या रुख अपनाती है।

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