प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजरायल के 2 दिवसीय दौरे पर , क्या है भारत-इस्राइल के रिश्तों का इतिहास , कैसे बना वो भारत का अभिन्न मित्र?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार (25 फरवरी) को दो दिवसीय दौरे पर इस्राइल रवाना होंगे। पीएम करीब आठ साल बाद इस्राइल जा रहे हैं। इस दौरान पीएम मोदी इस्राइल के अपने समकक्ष बेंजामिन नेतन्याहू और इस्राइली राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग से भी मुलाकात करेंगे। इस्राइली संसद- नेसेट में भी उनका संबोधन हो सकता है। यह पीएम मोदी […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
बुधवार, 25 फरवरी 2026, 06:59 AM 15 मिनट read
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजरायल के 2 दिवसीय दौरे पर , क्या है भारत-इस्राइल के रिश्तों का इतिहास , कैसे बना वो भारत का अभिन्न मित्र?
Photo: UB India News Archive

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार (25 फरवरी) को दो दिवसीय दौरे पर इस्राइल रवाना होंगे। पीएम करीब आठ साल बाद इस्राइल जा रहे हैं। इस दौरान पीएम मोदी इस्राइल के अपने समकक्ष बेंजामिन नेतन्याहू और इस्राइली राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग से भी मुलाकात करेंगे। इस्राइली संसद- नेसेट में भी उनका संबोधन हो सकता है। यह पीएम मोदी की दूसरी इस्राइल यात्रा होगी। पहली यात्रा जुलाई 2017 में हुई थी, जो किसी भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा यहूदी राष्ट्र की पहली यात्रा थी।

ऐसे में यह जानना अहम है कि भारत और इस्राइल का इतिहास क्या है? कैसे इस्राइल के बनने का भारत ने विरोध किया? इसके अस्तित्व में आने के बाद दोनों देशों के रिश्ते कैसे संबंध स्थापित करने तक आगे बढ़े? क्यों कोई प्रधानमंत्री आजादी के बाद से करीब 60 साल तक इस्राइल नहीं गया? दोनों देशों के रिश्ते कब से प्रगाढ़ होना शुरू हुए और तब से अब तक यह संबंध कैसे बढ़े हैं?

1930-1940 का दौर: जब भारत ने किया इस्राइल के बनने का विरोध

1. यहूदियों पर अत्याचार और अलग देश की मांग
1920 और 1940 के दशक में यूरोप के कई क्षेत्रों में यहूदियों के खिलाफ अत्याचार बढ़ रहे थे। खासकर जर्मनी में, जहां हिटलर और नाजीवाद के उभार के साथ यहूदी आबादी पर सबसे ज्यादा जुर्म हुए। ऐसे में दुनियाभर में स्थित यहूदियों के बीच अपना एक अलग देश बनाने की मांग उठने लगी। यह देश यरुशलम के आसपास स्थापित किए जाने की आवाजें उठीं, जो कि यहूदी धर्म का प्रमुख केंद्र माना जाता है। हालांकि, उस वक्त फलस्तीन इस्लाम बहुल देश बन चुका था। यह देश उस दौरान ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत आता था।

2. भारत ने किया फलस्तीन के टुकड़े कर अलग देश बनाने का विरोध
यहूदियों पर बढ़ते हुए जुर्म को देखते हुए ब्रिटिश शासन ने 1917 के बैलफोर घोषणा (बैलफोर डेक्लेरेशन) में वादा किया कि यहूदियों के लिए फलस्तीन में ही एक अलग देश स्थापित किया जाएगा। हालांकि, फलस्तीन के टुकड़े कर एक अलग देश बनाने का दुनियाभर में पुरजोर विरोध हुआ। खुद ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आने वाले भारत ने उस वक्त यहूदियों का अलग देश बनाने की मांग और इसकी एवज में ब्रिटिश शासन की तरफ से बैलफोर घोषणा का विरोध किया था। इसकी वजह यह थी कि भारत अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई ब्रिटिश शासन से लड़ रहा था, इसलिए वह फलस्तीनी स्वतंत्रता संघर्ष के साथ गहराई से जुड़ा हुआ महसूस करता था।
3. महात्मा गांधी बने अलग देश के खिलाफ आवाज उठाने वाला चेहरा
1930-40 का दौर आते-आते भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी एक प्रमुख चेहरा बन चुके थे। उन्होंने 26 नवंबर 1938 को अपने साप्ताहिक समाचार पत्र ‘हरिजन’ में लिखा था, “फलस्तीन अरबों का है, ठीक उसी तरह जैसे इंग्लैंड अंग्रेजों का और फ्रांस फ्रांसीसियों का है।” हालांकि उन्होंने यूरोप में एडोल्फ हिटलर के अत्याचारों का सामना कर रहे यहूदियों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि यहूदियों को अरबों पर थोपना गलत और अमानवीय होगा।

1947-1950: आजादी के बाद का दौर

भारत ने यूएन के प्रस्ताव के खिलाफ किया था वोट
1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, उसी साल फलस्तीन को एक यहूदी देश (इस्राइल) और एक अरब राज्य (फलस्तीन) में विभाजित करने वाली संयुक्त राष्ट्र की विभाजन योजना (यूएन पार्टिशन प्लान) के खिलाफ मतदान किया। किताब- सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू, वॉल्यूम 5 के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र में भारत की तत्कालीन दूत और जवाहरलाल नेहरू की बहन- विजयलक्ष्मी पंडित पर विभाजन के पक्ष में वोट देने के लिए दबाव बनाया गया और उन्हें जान से मारने की धमकियां तक मिली थीं, लेकिन नेहरू सरकार अपने फैसले पर अडिग रही।

एक अलग फॉर्मूले के साथ था भारत
भारत ने विभाजन के बजाय यूगोस्लाविया और ईरान के साथ मिलकर एक एकल संघीय राज्य की वकालत की थी। नेहरू का मानना था कि एक ही देश में उन क्षेत्रों को स्वायत्तता दी जानी चाहिए जहां यहूदी और अरब बहुमत में हों। नेहरू ने 1948 में कहा था कि कोई भी समाधान तब तक स्थायी नहीं हो सकता, जब तक वह अरबों और यहूदियों दोनों की सहमति पर आधारित न हो और बलपूर्वक थोपा न जाए।

इस्राइल अलग देश बना, भारत का विरोध जारी रहा
इसी साल संयुक्त राष्ट्र (यूएन) में मंजूरी मिलने के बाद इस्राइल के गठन के बाद भी भारत का विरोध जारी रहा और 1949 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इस्राइल की सदस्यता के खिलाफ मतदान किया। इन शुरुआती दशकों में भारत का रुख पूरी तरह से फलस्तीनी हितों के समर्थन में और इस्राइल के निर्माण के विरोध में था, जिसे नेहरू ने अरब देशों की भावनाओं को ठेस न पहुंचाने की इच्छा के रूप में भी स्पष्ट किया था।

1950 का दशक: भारत ने इस्राइल को दी मान्यता, पर राजनयिक संबंध नहीं

1950 के दशक में भारत और इस्राइल के संबंधों में एक अहम मोड़ आया। दरअसल, भारत ने इस्राइल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता तो दी, लेकिन पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए। हालांकि, इस्राइल को सिर्फ मान्यता मिलने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। दरअसल, 1947 में जब इस्राइल अलग-अलग देशों से मान्यता हासिल करने के लिए भरसक कोशिशें कर रहा था। इन्हीं प्रयासों के तहत उसने भारत को मनाने के लिए कई बड़े नेताओं को भेजा। बताया जाता है कि 1947 में ही दुनियाभर में लोकप्रिय वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर आग्रह किया था कि वे ताकत की राजनीति की प्रतिद्वंद्विता को समाप्त करें और फलस्तीन में हो रहे यहूदी पुनर्जागरण का समर्थन करें।

बताया जाता है कि शुरुआत में तो नेहरू सहमत नहीं थे, लेकिन बाद में वे इस्राइल को अलग देश के तौर पर स्वीकार करने के लिए तैयार हो गए और इस तरह 17 सितंबर 1950 को भारत ने इस्राइल को मान्यता दे दी। मान्यता देने के बाद नेहरू ने कहा था, “हमने बहुत पहले ही मान्यता दे दी होती, क्योंकि इस्राइल एक वास्तविकता है। हमने ऐसा करने से इसलिए परहेज किया क्योंकि हम अपने अरब मित्र देशों की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते थे।”

गौर करने वाली बात यह है कि भारत ने इस्राइल को मान्यता तो दे दी, लेकिन औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित करने से दूरी बनाए रखी। भारत अपनी राजनीतिक और राजनयिक सहानुभूति पूरी तरह से फिलिस्तीनी मुद्दे के साथ रखता था। संबंधों में इस दूरी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अगले चार दशकों तक भारत ने इस्राइल की यात्रा के लिए अपने पासपोर्ट के इस्तेमाल तक पर प्रतिबंध लगा रखा था।

1960 का दशक: जब चीन के खिलाफ इस्राइल ने की मदद की पेशकश

1960
भारत की राजनीतिक और राजनयिक सहानुभूति पूरी तरह से फिलिस्तीनी हितों के साथ बनी रही। पीएम नेहरू मई में गाजा में तैनात यूएन सैनिकों से मिलने भी पहुंचे।

1962

  • भारत-इस्राइल के रिश्तों में बड़ा मोड़ 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान आया। इस्राइल के पीएम डेविड बेन-गुरियन ने नेहरू को हथियारों की मदद की पेशकश की।
  • भारत ने इस्राइल से हथियार और गोला-बारूद लेना स्वीकार किया, लेकिन अनुरोध किया कि हथियारों की आपूर्ति करने वाले जहाजों पर इस्राइल का झंडा न लगा हो।
  • पीएम नेहरू का इस गुपचुप ढंग से मदद लेने के पीछे का तर्क यह था कि इस्राइल से मदद लेने के एवज अरब देशों के साथ भारत के संबंधों में कड़वाहट न आए।
  • यरूशलम के आर्काइव्स में मौजूद दस्तावेजों के अनुसार, यह भारत और इस्राइल के बीच दशकों तक चलने वाले गुप्त संबंधों की शुरुआत थी।

1965
इस्राइल ने भारत के लिए अपनी सैन्य सहायता को जारी रखा और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भी भारत को सैन्य उपकरण और गोला-बारूद की आपूर्ति की।

1970 का दशक: इंदिरा गांधी ने भी नहीं स्थापित किए राजनयिक रिश्ते

1971 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर था, तब फ्रांस में भारत के राजदूत डीएन. चटर्जी ने भारत सरकार को इस्राइल से मदद लेने की सलाह दी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार भी कर लिया। इसके बाद भारत की विदेशी खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ के जरिए लिकटेंस्टीन जैसे देश से इस्राइल से हथियार हासिल करने की शुरुआत हुई।

बताया जाता है कि इस सैन्य सहायता के बदले इस्राइल की तत्कालीन प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर ने इंदिरा गांधी को चिट्ठी लिखकर इस्राइल के लिए औपचारिक राजनयिक मान्यता मांगी थी।

1974 में, भारत पहला गैर-अरब देश बना जिसने फलस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (पीएलओ) को फलस्तीनी लोगों के इकलौते प्रतिनिधि के तौर पर मान्यता दी।

इसके बाद 1975 में पीएलओ ने भारत में अपना कार्यालय खोला। इसी दौरान भारत और फलस्तीन के बीच शैक्षिक स्तर पर भी संबंध मजबूत हुए और हजारों फलस्तीनी छात्र उच्च शिक्षा के लिए भारत आने लगे।

1980 का दशक: इस्राइल की पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों के खिलाफ साझा अभियान की पेशकश

1980 का दशक आते-आते भारत के फलस्तीन और इस्राइल से संबंध पुराने ढर्रे पर ही चलते रहे। जहां भारत खुले तौर पर फलस्तीन का समर्थन करता रहा, वहीं गुपचुप इस्राइल से भी मदद लेता रहा।

इस बीच फलस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन के नेता यासिर अराफात अक्सर भारत आते रहते थे। 1983 में भारत में रखे गए गुटनिरपेक्ष आंदोलन (एनएएम) के एक शिखर सम्मेलन के दौरान, अराफात ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अपनी बहन कहकर संबोधित किया था, जो उस समय भारत और फलस्तीन के बीच के गहरे व्यक्तिगत संबंधों का परिचायक बना।

पाकिस्तानी परमाणु केंद्र पर हमले का प्रस्ताव
1980 के दशक की शुरुआत में इस्राइल ने भारत के सामने पाकिस्तान के एक परमाणु केंद्र पर संयुक्त हमले का प्रस्ताव रखा था। हालांकि, भारत ने इस सैन्य सहयोग के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। हालांकि, भारत ने इस्राइल से इस दौरान अपने गुप्त सुरक्षा संबंधों को बनाए रखा।

फलस्तीन को राष्ट्र के रूप में मान्यता 
भारत ने फलस्तीनी संघर्ष के प्रति अपना समर्थन जारी रखते हुए 1988 में फलस्तीन को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी। ऐसा करने वाला भारत दुनिया के पहले गैर-अरब देशों में से एक था।

1990 का दशक: चार दशक बाद स्थापित हुए राजनयिक संबंध

दुनियाभर में 1990 का दशक बड़े बदलावों वाला साबित हुआ। दरअसल, इस दौर में सोवियत संघ का पतन हो गया और अमेरिका महाशक्ति के तौर पर स्थापित हुआ। यही वह दौर था, जब भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को खोलना शुरू किया और बहुपक्षवाद की तरफ बढ़ना शुरू किया। इसी कदम के तहत भारत ने जनवरी 1992 में इस्राइल के साथ अपने लंबे समय से चले आ रहे छिपे हुए संबंधों को औपचारिक राजनयिक रिश्तों में बदल दिया। भारत और इस्राइल ने तेल अवीव और नई दिल्ली में अपने दूतावास स्थापित किए।

भारत ने खरीदे इस्राइल के ‘खतरनाक’ हथियार
1992: दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध स्थापित हुए।
1996: भारत ने इस्राइल से 32 IAI सर्चर ड्रोन खरीदे।
1997: इस्राइल से बराक-1 मिसाइल खरीदने का समझौता हुआ।

भारत-इस्राइल के बीच राजनयिक रिश्ते स्थापित करने में फलस्तीन के नेता यासिर अराफात की भी सहमति थी। इसके पीछे तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की कूटनीति को श्रेय दिया जाता है। इस्राइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने के फैसले की घोषणा फलस्तीनी नेता यासिर अराफात की नई दिल्ली यात्रा के कुछ हफ्तों बाद की थी। अराफात ने कहा था कि वे इस मामले में भारत के फैसले का सम्मान करेंगे।

कारगिल युद्ध में भारत का किया सहयोग 
1999 के कारगिल युद्ध के दौरान इस्राइल ने भारत की सैन्य रूप से अहम मदद की थी। जब भारतीय सैनिक रणनीतिक चोटियों से घुसपैठियों को हटाने की कोशिश कर रहे थे, तब इस्राइल ने भारत को लेजर-गाइडेड बम किट और मिसाइलें दी थीं, जिनसे आतंकियों का सफाया करने में सेना को बड़ी मदद मिली।

2000 का दशक: संबंधों में रही हिचकिचाहट, लेकिन हथियारों की खरीद बढ़ी

  • कारगिल युद्ध में इस्राइली मदद हासिल करने के बाद 2000 के दशक की शुरुआत में भारत इस्राइल के रक्षा उपकरणों के सबसे बड़े खरीदारों में से एक बन गया।
  • 2000 के दशक में रक्षा और व्यापारिक संबंध तेजी से बढ़े, 2003 में भाजपा सरकार के दौरान एरियल शेरोन भारत का दौरा करने वाले पहले इस्राइली प्रधानमंत्री बने।
  • भारत ने इस दौरान अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखा। एक ओर इस्राइल के साथ सहयोग बढ़ा, वहीं अरब देशों-फलस्तीन से भी पुराने रिश्ते मजबूत रहे।

2010 का दशक: सरकार बदली और दोस्त बन गया इस्राइल

2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत-इस्राइल के संबंध गहरे हुए। इस दौरान सरकार ने अतीत की कूटनीतिक हिचकिचाहट को हमेशा के लिए खत्म कर दिया। यही वह दौर था, जब भारत से कोई प्रधानमंत्री पहली बार इस्राइल गया।

2015 
तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी इस्राइल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय राष्ट्रपति बने, जिसका उद्देश्य आर्थिक और रक्षा संबंधों को मजबूत करना था।

2017
पीएम मोदी इस्राइल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। इस यात्रा के दौरान मोदी और नेतन्याहू ने दोनों देशों को विकास, तकनीक, रक्षा, आदि क्षेत्रों में करीबी भागीदार बनाने का संकल्प लिया।

2018
जनवरी 2018 में इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भारत का दौरा किया। इस दौरान नेतन्याहू ने भारत के कई शहरों की यात्रा की और भारत के साथ इस्राइल की तकनीकी नवाचार को साझा करने का एलान किया।

दोनों देशों में बढ़ी रक्षा और व्यापारिक साझेदारी 

इस दशक में भारत, इस्राइल के रक्षा उपकरणों के सबसे बड़े खरीदारों में से एक बना रहा। इस्राइली कंपनियों (जैसे एलबिट सिस्टम्स और राफेल) ने अदाणी ग्रुप और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स जैसी भारतीय कंपनियों के साथ रणनीतिक साझेदारी स्थापित की। चीन के बाद भारत एशिया में, इस्राइल का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बन गया।

फलस्तीन पर भी बदला रुख 
भारत ने आधिकारिक तौर पर दो-राष्ट्र समाधान यानी टू-स्टेट सॉल्यूशन और एक संप्रभु फलस्तीनी राष्ट्र के लिए अपना समर्थन जारी रखा, लेकिन इस्राइल की कार्रवाइयों की आलोचना करने में ज्यादा सावधानी और तटस्थता बरती जाने लगी।

2016 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र के उस मतदान से दूरी बना ली, जिसमें 2014 के गाजा संघर्ष के दौरान युद्ध अपराधों के लिए इस्राइल को अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) के सामने लाने की मांग की गई थी। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस दौर में भारत ने रणनीतिक संतुलन की नीति अपनाई, जहां उसने इस्राइल के साथ रक्षा और तकनीक में सहयोग बढ़ाया, वहीं खाड़ी देशों के साथ अपने ऊर्जा और आर्थिक हितों को भी सुरक्षित रखा।

2020 से अब तक: सैन्य और रक्षा सहयोग बढ़ा, व्यापार में आया उछाल

1. सैन्य और नागरिक रिश्तों में आई ऊर्जा
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारतीय वायुसेना ने 2021 में इस्राइल में आयोजित बहुपक्षीय हवाई युद्धाभ्यास ‘ब्लू फ्लैग-2021’ में हिस्सा लिया। इस तरह दोनों देशों का सैन्य और रक्षा सहयोग लगातार बढ़ा। दोनों देशों के बीच पीपल-टू-पीपल कनेक्ट बढ़ने की शुरुआत भी इसी दौर में हुई। अक्तूबर 2023 में हमास के इस्राइल पर हमले के बाद जब तेल अवीव ने हजारों फिलिस्तीनियों के वर्क परमिट निलंबित कर दिए, तब उनके स्थान पर काम करने के लिए हजारों भारतीयों को नियुक्त किया गया।

2. व्यापार और द्विपक्षीय निवेश भी बढ़े 
भारत और इस्राइल के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा। दोनों देशों के बीच 1992 में द्विपक्षीय व्यापार करीब 20 करोड़ डॉलर था, जो कि 2024 में बढ़कर 6.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। सितंबर 2024 में दोनों देशों ने एक द्विपक्षीय निवेश संधि पर भी हस्ताक्षर किए।

3. कूटनीतिक रिश्ते गहरे हुए, फलस्तीन का समर्थन भी जारी रखा
2023 में इस्राइल पर हमास के हमले की भारत ने आलोचना की। हालांकि, इसके बाद जब इस्राइल ने गाजा को निशाना बनाना शुरू किया तो भारत ने यहां पैदा हुए मानवीय संकट को लेकर भी चिंता जाहिर की। बड़े परिप्रेक्ष्य में भारत ने रणनीतिक संतुलन बनाना जारी रखा और संयुक्त राष्ट्र के उन प्रस्तावों से दूरी बनाए रखी, जिनमें संघर्ष विराम की मांग की गई। 2024 में भारत ने इस्राइल पर हथियार प्रतिबंध लगाने वाले संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के प्रस्ताव पर भी मतदान नहीं किया।

इसी कड़ी में भारत ने इस्राइल की तरफ से वेस्ट बैंक पर कब्जे के प्रयासों की आलोचना की। इस साल फरवरी में भारत ने 100 से ज्यादा देशों के साथ मिलकर वेस्ट बैंक में इस्राइल के विस्तार की निंदा की। भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन और जनसांख्यिकीय संरचना को बदलने वाले किसी भी कदम का विरोध किया है। इसके अलावा भारत लगातार टू-स्टेट सॉल्यूशन का समर्थन करता रहा है, जिसके तहत फलस्तीन की अपनी पहचान बरकरार रखने की बात कही गई है।

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