नेपाल और भारत: परस्पर संबंधों की नई इबारत लिखने का वक्त…………..

ऐसे समय में, जब दक्षिण एशिया राजनीतिक अस्थिरताओं, आर्थिक चुनौतियों और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धाओं से जूझ रहा है, तब बालेंद्र शाह का देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेना नेपाल की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ और पड़ोसी मुल्क की बदलती राजनीतिक चेतना का प्रतीक तो है ही, यह भारत के लिए भी […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शनिवार, 28 मार्च 2026, 02:13 AM 7 मिनट read
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नेपाल और भारत: परस्पर संबंधों की नई इबारत लिखने का वक्त…………..
Photo: UB India News Archive

ऐसे समय में, जब दक्षिण एशिया राजनीतिक अस्थिरताओं, आर्थिक चुनौतियों और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धाओं से जूझ रहा है, तब बालेंद्र शाह का देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेना नेपाल की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ और पड़ोसी मुल्क की बदलती राजनीतिक चेतना का प्रतीक तो है ही, यह भारत के लिए भी विशेष महत्व रखता है।

गौरतलब है कि नेपाल के मतदाताओं ने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) को भारी बहुमत देकर बालेंद्र शाह और उनकी सरकार को नेपाल के पूर्ण परिवर्तन के लिए सशक्त जनादेश दिया है। युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार, दूसरे देशों में काम की तलाश में भटक रहे लोगों के पलायन को रोकना, तीव्र समावेशी आर्थिक विकास को प्रोत्साहन, भाई-भतीजावाद व भ्रष्टाचार का अंत और सुशासन की स्थापना ही वे चुनौतियां हैं, जिनका सामना नई सरकार को करना होगा।

कार्यवाहक प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने चुनाव से पहले कहा था कि नेपाल के युवा हताशा में सड़कों पर उतरे थे और अगर फिर वही स्थितियां पैदा होती हैं, तो इससे निराशाजनक कुछ नहीं होगा। जहां तक भारत के साथ संबंधों की बात है, तो 1950 की शांति व मैत्री संधि नेपाल व भारत के बीच द्विपक्षीय संबंधों की नींव बनी हुई है, फिर भी दोनों देशों के बीच सहयोग का दायरा औपचारिक राजनयिक ढांचों से कहीं अधिक व्यापक है। हाल के वर्षों में भी नेपाल के साथ भारत के संबंध विकास, बुनियादी संरचना, डिजिटल कनेक्टिविटी और ऊर्जा पर केंद्रित रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि नेपाल के चुनाव में भारत कोई मुद्दा नहीं रहा और भारत ने भी बगैर किसी शोर-शराबे के हमेशा अपने इस पड़ोसी का समर्थन ही किया है। ऐसे में, उम्मीद की जानी चाहिए कि नेपाल के नए निजाम दोनों देशों के बीच की मौजूदा सद्भावना का फायदा उठाते रहना चाहेंगे। चीन की दशकों पुरानी कम्युनिस्ट पार्टियों को एकजुट करने की रणनीति हालिया चुनाव में हार के बाद कमजोर पड़ती दिख रही है, इसके बावजूद नेपाल की नई सरकार भारत से अच्छे रिश्ते बनाए रखते हुए चीन के साथ आर्थिक संबंध स्थापित करना चाहेगी।

दूसरी ओर, ट्रंप द्वारा सहायता कार्यक्रमों पर अंकुश लगाने व पश्चिम एशियाई संकट से नेपाल की आर्थिक मुश्किलात बढ़ सकती हैं। इन परिस्थितियों में बालेंद्र शाह का उदय एक पीढ़ीगत बदलाव का संकेत है और अगर यह बदलाव सही दिशा में आगे बढ़ता है, तो न केवल नेपाल के भविष्य को नई दिशा देगा, बल्कि भारत व नेपाल के संबंधों में भी नई इबारत लिखेगा।

नेपाल के नए प्रधानमंत्री को पीएम मोदी ने भेजा बधाई संदेश

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ‘बालेन’ को शपथ लेने पर बधाई दी। उन्होंने कहा कि वह दोनों देशों के आपसी फायदे के लिए भारत-नेपाल संबंधों को और मजबूत करने के लिए उनके साथ मिलकर काम करने को लेकर उत्सुक हैं।

रैपर से नेता बने बालेंद्र शाह ने शुक्रवार को नेपाल के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। यह के पी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सरकार के गिरने लगभग लगभग छह महीने बाद हुआ है। ओली सरकार को एक युवा पीढ़ी के विरोध प्रदर्शन में हटा दिया गया था।
पीएम ने क्या कहा?
मोदी ने ‘एक्स’ पर एक संदेश में कहा, ‘नेपाल के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ लेने पर श्री बालेंद्र शाह को हार्दिक बधाई। आपकी नियुक्ति नेपाल की जनता द्वारा आपके नेतृत्व में जताए गए भरोसे को दर्शाती है। मैं हमारे दोनों देशों की जनता के आपसी फायदे के लिए भारत-नेपाल की दोस्ती और सहयोग को और भी ऊंचाइयों पर ले जाने हेतु आपके साथ मिलकर काम करने को लेकर उत्सुक हूं।’
नेपाल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने अक्तूबर 2025 के बाद अपना पहला पोस्ट किया है। इस पहले पोस्ट में नेपाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया है। साथ ही भारत के साथ संबंधों को मजबूत करने की उत्सुकता जाहिर की है। नेपाल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने अपने एक्स पर लिखा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, आपके स्नेही शब्दों और हार्दिक शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद। मैं हमारे दोनों देशों के बीच बहुआयामी संबंधों को आगे बढ़ाने और अपने लोगों की समृद्धि के लिए आपके साथ निकटता से काम करने के लिए उत्सुक हूं।”

नेपाल में पहले मधेशी प्रधानमंत्री की ताजपोशी, चुनौतियां हैं तो उम्मीदें भी प्रबल

यह किसी सिंड्रेला की कहानी जैसा लगता है। बालेंद्र शाह (जिन्हें ‘बालेन’ के नाम से जाना जाता है) का नेपाल में नाटकीय और लगभग अविश्वसनीय उदय हुआ। नेपाल ऐसी धरती है, जहां मधेशी समुदायों के लिए ‘समान अधिकार’ आज भी दूर की कौड़ी है, जिनके खून, भाषा और आस्था के तार बिहार और उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों से जुड़े हुए हैं।

बालेंद्र शाह ने ‘रामनवमी’ के शुभ हिंदू पर्व पर प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। काठमांडो की सड़कों से सिंह दरबार तक का बालेन का सफर किसी किंवदंती से कम नहीं है। पूर्व रैपर, इंजीनियर और काठमांडो के प्रभावशाली मेयर रहे बालेंद्र शाह देश के प्रधानमंत्री बनने वाले पहले मधेशी हैं। लोगों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाने के लिए, बालेंद्र का मंत्रिमंडल शासन-प्रशासन से जुड़े और सार्वजनिक सेवाओं के वितरण को आसान बनाने वाले 100 निर्णय लेने के लिए तैयार है, जिनमें मुख्य जोर डिजिटलीकरण पर होगा। लेकिन उनका काम शपथ के साथ समाप्त नहीं होता।

बालेंद्र शाह को एक ऐसे राष्ट्र की बागडोर मिली है, जहां उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना है, जो उनकी कड़ी परीक्षा लेंगी। नेपाल आर्थिक संकटों के दौर से गुजर रहा है, जहां की अनुमानित विकास दर पांच फीसदी से कम है, युवाओं में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी है, और पर्यटन क्षेत्र अब भी महामारी के बाद के जख्मों और जलवायु संबंधी आपदाओं से उबरने की कोशिश कर रहा है। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार ने ही जेन-जी विद्रोह को हवा दी थी, आज भी भूतों की तरह मंडरा रहा है। इसके अलावा, प्रांतीय स्वायत्तता और संसाधनों के बंटवारे को लेकर मधेश की पुरानी शिकायतों के तत्काल समाधान की आवश्यकता है। रोजगार तथा बदलाव के बड़े-बड़े वादों को पूरा करने के लिए बेहद सटीक और बारीक रणनीति की आवश्यकता होगी। अगर वह इसमें विफल रहते हैं, तो उन्हीं युवाओं को निराश करेंगे, जिन्होंने उन्हें आगे बढ़ाया था। इससे उम्मीदें निराशा में बदल जाएंगी।

भारत के लिए इस बदलाव के गहरे निहितार्थ हैं, विशेष रूप से ओली के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट सरकारों के कठिन दौर के बाद, जिसने भारत के साथ पारंपरिक रोटी-बेटी के रिश्तों में कड़वाहट ला दी थी। अब, बालेन शाह का उदय एक संभावित नए सिरे की शुरुआत का संकेत देता है। जीत के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बधाई पर उनकी प्रतिक्रिया सौहार्द्रपूर्ण थी। उन्होंने कनेक्टिविटी, ऊर्जा, व्यापार और सांस्कृतिक पर्यटन के जरिये संबंधों को ‘मजबूत, गहरा और अधिक परिणामोन्मुख’ बनाने का संकल्प लिया। भारत ने लगातार मधेशियों के सांविधानिक अधिकारों का समर्थन किया है।

नई दिल्ली के लिए, पहाड़ी क्षेत्रों के प्रभाव व कम्युनिस्ट सोच की ओर झुकी नेतृत्व शैली से यह बदलाव एक अच्छा मौका है। इससे भरोसा फिर से बनाया जा सकता है, लोगों के रिश्ते मजबूत किए जा सकते हैं और चीन के बचे हुए प्रभाव का सामना किया जा सकता है। संभवतः, यह सब ज्यादा असरदार परियोजनाओं और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग के माध्यम से किया जा सकता है। सीता की पवित्र धरती पर जन्मे एक मधेशी का नेतृत्व, पहाड़ी-केंद्रित परंपराओं और कम्युनिस्ट-युग के झुकावों से हटकर एक व्यावहारिक संतुलन की ओर देश को ले जा सकता है। नेपाल और भारत के लोगों को इस गर्मजोशी और साझा समृद्धि से अपार लाभ मिलने की उम्मीद है; चुनौतियां बेशक बहुत हैं, लेकिन उम्मीद भी उतनी ही प्रबल है।

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