अमेरिका-ईरान युद्ध: ईरान अचानक ही ‘पीड़ित’ होने की उस स्वायत्त स्थिति में सुरक्षित क्यों महसूस करने लगा है ………………

जंग कौन जीत रहा है-अगर युद्ध के मैदान में नहीं, तो कहीं और? मौजूदा मीडिया की तस्वीर यही दिखाती है कि ट्रंप हार रहे हैं। यह करारी हार की ही तैयारी थी कि तीव्र आवेग से भरा एक राष्ट्रपति, बिना किसी रणनीति के (एक जरूरतमंद रणनीतिक साझेदार के बोझ तले दबा हुआ और ‘महान अमेरिका’ […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
मंगलवार, 7 अप्रैल 2026, 09:49 AM 6 मिनट read
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अमेरिका-ईरान युद्ध: ईरान अचानक ही ‘पीड़ित’ होने की उस स्वायत्त स्थिति में सुरक्षित क्यों महसूस करने लगा है ………………
Photo: UB India News Archive

जंग कौन जीत रहा है-अगर युद्ध के मैदान में नहीं, तो कहीं और? मौजूदा मीडिया की तस्वीर यही दिखाती है कि ट्रंप हार रहे हैं। यह करारी हार की ही तैयारी थी कि तीव्र आवेग से भरा एक राष्ट्रपति, बिना किसी रणनीति के (एक जरूरतमंद रणनीतिक साझेदार के बोझ तले दबा हुआ और ‘महान अमेरिका’ के सम्राट के तौर पर अपनी ही आभा से अंधा होकर) एक देश पर बमबारी करने चला गया।

इस तस्वीर (नैरेटिव) की रोचकता उस विजेता (ईरान) की मजबूत इच्छाशक्ति से और बढ़ जाती है, जो लहूलुहान होते हुए भी सांस ले रहा है।
यह एक ऐसे क्रांतिकारी गणतंत्र की कहानी दिखाता है, जो इतिहास के लंबे युद्धों की भट्ठी में तपकर और भी मजबूत हो गया है। उसमें अपनी पीड़ा को प्रतिरोध में, सैन्य असमानता को एक मौलिक आक्रमण में, अपनी भौगोलिक स्थिति को शस्त्रागार में, और अपनी आस्था के ताने-बाने को एक ऐसी अभेद्य मशीन में बदलने का अदम्य संकल्प है, जिसे कोई भी शक्ति काट या नष्ट नहीं कर सकती। एक तीसरा पक्ष (इस्राइल) भी है (ज्यादातर तस्वीरों में यही पहला पक्ष होता है), जो अपने अस्तित्व को लेकर इतनी ज्यादा और लाइलाज आशंकाओं में डूबा हुआ है कि उसने इस युद्ध को हर देश के दरवाजे तक पहुंचा दिया है। इसने अमेरिकी राष्ट्रपति को अपने मुख्य सामाजिक आधार के साथ विश्वासघात करने पर मजबूर कर दिया, और उन्हें एक ऐसे दूरदराज के दलदल में घसीट लिया है, जहां राष्ट्रवादी लाभ तो बहुत कम है, लेकिन राजनीतिक और आर्थिक नुकसान कहीं ज्यादा है। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं, जैसे एक और वियतनाम युद्ध की स्थिति बनती दिख रही हो और यह अमेरिका के राष्ट्रपति पद को कमजोर कर रहा है, जिससे देश पहले से ज्यादा छोटा और कमजोर नजर आ रहा है।

ईरान के खिलाफ जंग असल में लोगों के जहन में ज्यादा असरदार ढंग से लड़ी जा रही है, जहां विचारधाराओं को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि यह साफ हो सके कि विजेता कौन है और हारने वाला कौन। इसलिए, भले ही ऊपर जमीन पर नुकसान हो रहा हो, पर ईरान के नेता अंदर से खुद को मजबूत महसूस कर सकते हैं। यहां तीन चीजें काम कर रही हैं।

पहला, अमेरिका-विरोध और ट्रंप-विरोध का मेल। अमेरिका के प्रति राजनीतिक और साथ ही सांस्कृतिक विरोध शीतयुद्ध से चला आ रहा है। नए रूप में यह अमेरिका-विरोध (या वैचारिक रूप से आहत लोगों के लिए साम्राज्यवाद-विरोध) हर बार असर डालता है, जब अमेरिका अपनी शर्तों के अनुसार आजादी की परिभाषा तय करने की कोशिश करता है। यह तथ्य कि अमेरिका का राष्ट्रीय हित तथाकथित ‘अंतरराष्ट्रीय नैतिकता’ से हमेशा मेल नहीं खाता और उदारवादियों के आत्म-सच्चाई के भाव को और भी दृढ़ बनाता है। अब, जब ट्रंप ने अमेरिका की छवि को अपने तरीके से बदल दिया है, जो कई लोगों को डराने वाला लगता है, खासकर उन्हें, जो सच, कानून और विनम्रता जैसे पुराने मूल्यों में विश्वास करते हैं, तो साम्राज्यवाद-विरोध को एक उपयुक्त और राक्षसी चेहरा मिल गया है। पश्चिम-एशिया में भड़कती युद्ध की लपटें इस चेहरे को और भी विशाल बना देती हैं, मानो यह फारस की कोई परी कथा हो।

दूसरा, यहूदी-विरोध। शायद यह कुछ आइवी लीग परिसरों (अमेरिका के निजी शोध विश्वविद्यालय, जो अपनी अकादमिक उत्कृष्टता, उच्च चयन-मानकों और प्रतिष्ठा के लिए विश्व स्तर पर विख्यात हैं) और लंदन की सड़कों पर ज्यादा दिखता है, लेकिन इसका एक छिपा हुआ रूप भी है, जिसे हम अक्सर समझ नहीं पाते। यह तब सामने आता है, जब इस्राइल को एक ‘नरभक्षी’ देश बताकर उसकी निंदा की जाती है। उनकी नजर में इस्राइल एक ऐसा देश है, जो अपनी मनगढ़ंत कहानी का हवाला देकर फलस्तीनियों के खिलाफ अपने अपराधों और ईरान में अपने ‘सिर काटने’ के मिशन को सही ठहराता है। इस्राइल अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए युद्ध में उतर सकता है, और जीत भी सकता है। पर, जैसा कि पहले गाजा में हुआ था, यह नैरेटिव की लड़ाई हार जाएगा। हो सकता है कि इसने ईरानी नेतृत्व को पूरी तरह तबाह कर दिया हो, जिसकी शुरुआत अयातुल्ला खामनेई से हुई। और अमेरिका व इस्राइल ने भले ही ईरानी रक्षा प्रणालियों को काफी हद तक नष्ट कर दिया हो, पर रिवोल्यूशनरी गार्ड्स द्वारा चार दशकों से भी अधिक समय में तैयार किया गया सैन्य-औद्योगिक ढांचा अब भी बरकरार है। फिर भी, इस्राइल यह युद्ध नहीं जीत रहा है, क्योंकि इस युद्ध को लड़ने वाला इस्राइल ऐसा देश नहीं है, जिसे अपने दुश्मनों को हराने की जरूरत है, बल्कि वह तो खुद ही चुराई हुई भूमि पर थोपा गया एक झूठ है।

तीसरा, पीड़ित का पक्ष लेते वक्त, राष्ट्रों की संप्रभुता के साथ खड़े होना और राष्ट्र-निर्माण के साम्राज्यवादी दिखावे का विरोध करना नैतिक रूप से आवश्यक है। यह उदात्त उदारवादी भावना उस दमनकारी मुल्लाशाही को भी उन लोगों के लिए स्वीकार्य बना देती है, जो अन्यथा लोकतांत्रिक मूल्यों की दुहाई देते हैं। ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ के विरोध और तेल संकट से आहत, ट्रंप के दौर के बाद खंडहरों से आए वे चुनौती भरे बयान, जो अब संघर्ष-विराम का संकेत दे रहे हैं, अमेरिका-इस्राइल गठबंधन के कथित अलगाव की भावना से प्रेरित हैं। ईरान अब कोई धार्मिक-फासीवादी मुल्क नहीं रहा। वह कमजोर होने के बावजूद, एक ऐसे साम्राज्यवादी के सामने डटकर खड़ा है, जो अपनी इज्जत बचाने के लिए बस एक दिखावे की आड़ ढूंढ रहा है। जीत के नारों के बीच ईरान को देखना कुछ लोगों को सुकून देता है, खासकर उन्हें, जो ट्रंप और नेतन्याहू की नीतियों को गलत मानते हैं। इसलिए अब वे चाहते हैं कि ‘महान इस्लामी क्रांति’ ही विजयी हो।

इस बात की संभावना कम ही है कि इन तीनों उदारवादी दृष्टिकोणों का गठबंधन ईरान को युद्ध जीतवा पाएगा। अगर ईरान ने कुछ हासिल किया है, तो वह यह है कि इसने दमन को प्रतिरोध की आड़ में छिपा दिया है। यह कुछ बेवकूफों द्वारा गढ़ा गया एक बेहतरीन कथा भ्रम है कि ईरान अब न तो ‘आस्था का आखिरी साम्राज्य’ रहा, और न ही ‘क्षेत्रीय उथल-पुथल का केंद्र’। अब यह वह ‘पुलिस राज’ भी नहीं रहा, जो अपने ही लोगों से सबसे ज्यादा डरता हो, और जिसकी सड़कों पर ‘ईश्वर की अपनी गोलीबारी करने वाली पुलिस’ तैनात रहती हो, और अब यह वह क्रांतिकारी राज्य नहीं रहा, जो शहादत की भावना का इस्तेमाल खुद मरने और लोगों को मारने के लिए करता हो। ईरान अचानक ही ‘पीड़ित’ होने की उस स्वायत्त स्थिति में सुरक्षित महसूस करने लगा है और उसका अस्तित्व ही इस युद्ध का एकमात्र नैतिक उद्देश्य बन गया है।

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