इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई 21 घंटे की मैराथन बैठक भले ही बेनतीजा रही हो, लेकिन इसे ईरान की नाकामी समझना एक बड़ी भूल हो सकती है. असल में, यह ईरान की कोई हठधर्मिता नहीं, बल्कि एक सोची-समझी कूटनीतिक और सैन्य रणनीति है. ईरान अच्छी तरह जानता है कि उसकी भौगोलिक स्थिति […]
By UB India News • Patna, Bihar रविवार, 12 अप्रैल 2026, 07:10 AM • 7 मिनट read
इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई 21 घंटे की मैराथन बैठक भले ही बेनतीजा रही हो, लेकिन इसे ईरान की नाकामी समझना एक बड़ी भूल हो सकती है. असल में, यह ईरान की कोई हठधर्मिता नहीं, बल्कि एक सोची-समझी कूटनीतिक और सैन्य रणनीति है. ईरान अच्छी तरह जानता है कि उसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि उसने दुनिया की ‘आर्थिक नब्ज’ को अपने हाथ में दबा रखा है. भले ही अमेरिका के पास घातक बम, आधुनिक मिसाइलें और असीमित सैन्य ताकत हो, लेकिन इस जंग की तपिश अब सीधे वाशिंगटन को झुलसा रही है.
अमेरिका में बढ़ती महंगाई और तेल की आसमान छूती कीमतों ने ट्रंप प्रशासन को बैकफुट पर धकेल दिया है. ईरान का रुख इस वक्त प्रतिरोध से ज्यादा ‘मोलभाव’ का है. उसने अपनी सैन्य शक्ति और रणनीतिक स्थिति के दम पर सुपरपावर अमेरिका को बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर कर दिया.
आज स्थिति यह है कि ईरान के पास खोने के लिए बहुत कुछ नहीं बचा है, लेकिन पाने के लिए बहुत कुछ है. लेकिन वह जंग को लंबा खींचकर अमेरिका को आर्थिक और सैन्य, दोनों मोर्चों पर कमजोर करना चाहता है. ईरान का यह सख्त रवैया और अमेरिका का बढ़ता लचीलापन साफ संकेत दे रहा है कि बाजी अब तेहरान के हाथ में खिसक रही है.
अमेरिका के हाथ क्यों बंधे हैं?
अमेरिका पर इस वक्त इस जंग को जल्द से जल्द खत्म करने का भारी दबाव है. घरेलू मोर्चे पर महंगाई एक बड़ा मुद्दा है. आने वाले वक्त में किंग चार्ल्स का अमेरिका दौरा प्रस्तावित है. मई में डोनाल्ड ट्रम्प को चीन जाना है और सबसे बढ़कर अमेरिका में मिड-टर्म इलेक्शन सिर पर हैं. ऐसे में अमेरिका लंबी जंग का जोखिम नहीं उठा सकता. यही वजह है कि ईरान झुकने के बजाय अपनी शर्तों पर अड़ा है, क्योंकि उसे पता है कि अमेरिका किन चिंताओं से घिरा हुआ है.
खाड़ी देश क्यों नहीं चाहते कि अमेरिका ईरान में सुलह हो?
दिलचस्प बात यह है कि खाड़ी देश और इजरायल भी नहीं चाहते थे कि इस वार्ता से कोई बड़ा समाधान निकले. उन्हें डर था कि अगर कोई अहम समझौता हो गया, तो क्षेत्र में ईरान का वर्चस्व और बढ़ जाएगा. ये अरब देशों और इजरायल के लिए घातक साबित हो सकता है. वहां के शेखों को ईरान की यह बढ़ती ताकत किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं थी. ऐसे में पर्दे के पीछे से होने वाली इन खींचतानों ने भी वार्ता को बेनतीजा बनाने में अहम भूमिका निभाई है.
अभी खत्म नहीं हुआ ईरान के हथियारों का जखीरा
ईरान के पास अभी भी अपनी मिसाइलों और ड्रोनों का आधे से ज्यादा जखीरा सुरक्षित बचा हुआ है. सैन्य जानकारों का मानना है कि ईरान के पीछे हटने का सवाल ही पैदा नहीं होता, क्योंकि उसकी सैन्य क्षमता अब भी उसे लंबे समय तक टिके रहने की ताकत देती है. दूसरी ओर, अमेरिका अब पहले की तरह बड़े हमले करने की स्थिति में नहीं दिख रहा है. संभावना यही है कि अमेरिका केवल छिटपुट हमले जारी रखेगा ताकि दबाव बना रहे, लेकिन सीधे युद्ध में उतरने से वह बचेगा.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बिना नेटो (NATO) देशों के समर्थन के अमेरिका के लिए कुछ भी बड़ा करना नामुमकिन जैसा है. अगर अमेरिका वहां अकेले उतरता है, तो उसे भारी जान-माल का नुकसान उठाना पड़ सकता है. ईरान ने इसी कमजोरी को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाया है. वह जानता है कि अमेरिका की ‘आर्थिक नस’ होर्मुज से गुजरती है और वहां एक छोटी सी हलचल भी वैश्विक बाजार में तबाही मचा सकती है.
अब सवाल यह है कि वार्ता बेनतीजा होने के बाद ईरान किस ओर जाएगा? साफ है कि ईरान अब इस संघर्ष को और लंबा खींचेगा. उसका मकसद दुश्मन को थकाना और उसे आर्थिक रूप से पंगु बनाना है. तेहरान अब प्रतिरोध के बजाय कूटनीतिक और रणनीतिक बढ़त हासिल करने के लिए मोलभाव कर रहा है. वह अपनी शर्तों को मनवाने के लिए अड़ा रहेगा क्योंकि उसे पता है कि युद्ध की लंबी खिंचती लकीर अमेरिका के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है और इससे ट्रंप ही देश में घिर जाएंगे.
अमेरिका-ईरान में बातचीत फेल होते ही होर्मुज बंद!
अमेरिका और पाकिस्तान के बीच इस्लामाबाद में हुई बातचीत फेल हो गई. 14 दिनों के सीजफायर पर सहमति के बाद दोनों देश बातचीत को तैयार हुए थे. इस्लामाबाद टॉक्स फेल होते ही अब इसका असर समुद्र में दिखने लगा है. रविवार को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में एक चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया, जब दो बड़े तेल टैंकर आखिरी वक्त पर यू-टर्न लेकर वापस लौट गए. शिप-ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, तीन बड़े खाली सुपरटैंकर ओमान की खाड़ी से होर्मुज जलडमरूमध्य की ओर बढ़ रहे थे. ये सभी जहाज पर्शियन गल्फ में प्रवेश करने वाले थे और शुरुआती तौर पर इन्हें ईरान की ओर से इजाजत भी मिल चुकी थी. लेकिन जैसे ही ये जहाज ईरान के लारक द्वीप के पास पहुंचे, अचानक हालात बदल गए.
पाकिस्तान के जहाज को भी लेना पड़ा यूटर्न
इन्हीं में से दो जहाज एगियोस फानूरियोस-I और पाकिस्तान का शालिमार ने आखिरी समय पर रास्ता बदल लिया और वापस लौट गए. दोनों जहाज एगियोस फानूरियोस इराक और पाकिस्तानी झंडे वाला जहाज संयुक्त अरब अमीरात की ओर जा रहे थे. हालांकि तीसरा टैंकर मोबासा-B आगे बढ़ता रहा और ईरान की ओर से स्वीकृत रास्ते के जरिए पर्शियन गल्फ में प्रवेश कर गया. अभी जहाजों के यूटर्न लेने का सही कारण नहीं पता है, लेकिन अटकलें लग रही हैं कि बातचीत फेल होने के बाद समुद्री व्यापार पर सुरक्षा जोखिम तेजी से बढ़ गया है और कंपनियां अब आखिरी समय में भी फैसले बदलने को मजबूर हैं. संभव है कि ईरान ने ही जहाजों को लौटा दिया हो. पाकिस्तानी झंडे वाले जहाज को लौटाने की खबर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शनिवार को ही पाकिस्तान ने सऊदी अरब के समर्थन में फाइटर जेट भेजे थे. माना जा रहा है यह पाकिस्तान को भी जवाब ही है.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर फिर संकट?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का लगभग 20 फीसदी गुजरता है. लेकिन ईरान-अमेरिका युद्ध के बाद हफ्तों से यह मार्ग लगभग ठप पड़ा है. अमेरिका-इजरायल के हमलों के बाद ईरान ने यहां बारूदी सुरंगें बिछा दी थीं और समुद्री रास्तों पर कड़ा नियंत्रण कर लिया था. सीजफायर के बाद ईरान ने एक ग्रीन जोन बनाकर इस रास्ते को खोला है. लेकिन समुद्री माइंस अभी भी बिछी हुई हैं. बातचीत के बीच अमेरिका के दोजहाजा होर्मुज में घुसे हैं और रिपोर्ट्स के मुताबिक वह माइंस को हटा रहे हैं.
होर्मुज से गुजरे थे जहाज?
हालांकि शनिवार को कुछ सकारात्मक संकेत मिले थे, जब दो चीनी और एक ग्रीक टैंकर सफलतापूर्वक तेल लेकर इस मार्ग से बाहर निकले थे. इससे उम्मीद जगी थी कि समुद्री आवाजाही धीरे-धीरे सामान्य हो सकती है. लेकिन रविवार की घटना ने फिर से अनिश्चितता बढ़ा दी है.