प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा सिर्फ कूटनीतिक बैठकों तक सीमित नहीं है. जकार्ता पहुंचने के बाद उनका सबसे अहम पड़ाव दुनिया के सबसे बड़े हिंदू मंदिर परिसरों में से एक प्रम्बानन मंदिर है. प्रधानमंत्री बुधवार सुबह मंदिर परिसर पहुंचे, जहां उन्होंने भारत और इंडोनेशिया के साझा सांस्कृतिक और सभ्यतागत रिश्तों को नई मजबूती देने […]
By UB India News • Patna, Bihar बुधवार, 8 जुलाई 2026, 07:22 AM • 7 मिनट read
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा सिर्फ कूटनीतिक बैठकों तक सीमित नहीं है. जकार्ता पहुंचने के बाद उनका सबसे अहम पड़ाव दुनिया के सबसे बड़े हिंदू मंदिर परिसरों में से एक प्रम्बानन मंदिर है. प्रधानमंत्री बुधवार सुबह मंदिर परिसर पहुंचे, जहां उन्होंने भारत और इंडोनेशिया के साझा सांस्कृतिक और सभ्यतागत रिश्तों को नई मजबूती देने का संदेश दिया. पीएम मोदी की यह यात्रा एक बार फिर उस रणनीति का हिस्सा है, जिसे पिछले कुछ वर्षों में मंदिर डिप्लोमेसी माना जाता है. बीते एक दशक में भारत ने सिर्फ अपने देश के मंदिरों और विरासत स्थलों के संरक्षण पर ही ध्यान नहीं दिया, बल्कि दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया समेत कई देशों में स्थित प्राचीन हिंदू और बौद्ध धरोहरों के संरक्षण और पुनर्निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार से तीन दिन के इंडोनेशिया दौरे पर हैं. मंगलवार को वह जकार्ता पहुंचे थे. बुधवार को वह इंडोनेशिया के प्रम्बानन मंदिर पहुंचे. सदियों पुराने इस मंदिर को इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर माना जाता है. यह योग्याकार्ता शहर से करीब 17 किमी. उत्तर-पूर्व में स्थित है. दरअसल भारत, योग्याकार्ता में मौजूद यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल ‘प्रम्बानन मंदिर परिसर’ के संरक्षण और जीर्णोद्धार में इंडोनेशिया की मदद करने जा रहा है. इस परियोजना पर काम करने के लिए मंगलवार को दोनों देशों ने ‘आशय पत्र’ एक्सचेंज किया था. पीएम मोदी आज प्रम्बानन मंदिर पहुंचे हैं
1 हजार साल से भी ज्यादा पुराना है प्रम्बानन मंदिर
मोदी ने जॉइंट प्रेस कॉन्फेंस के दौरान मंगलवार को कहा था कि उनको बुधवार को योग्याकार्ता में राष्ट्रपति प्रबोवो के संग मिलकर प्रम्बानन मंदिर की संरक्षण परियोजना की शुरुआत करने का मौका मिलेगा. 1 हजार साल से भी ज्यादा पुराना प्रम्बानन मंदिर, भारत और इंडोनेशिया की साझा सांस्कृतिक विरासत का शाश्वत प्रतीक है.
इंडोनेशिया में भगवान शिव का सबसे बड़ा मंदिर
यूनेस्को की वेबसाइट के मुताबिक, इंडोनेशिया में 10वीं सदी में बना भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है. इसके केंद्र में तीन प्रमुख मंदिरों की दीवारों पर रामायण महाकाव्य को उकेरा गया है. ये मंदिर हिंदू धर्म के तीन प्रमुख देवों, ब्रह्मा, विष्णु और महेश को समर्पित हैं. इसके अलावा तीन अन्य मंदिर उन पशुओं को समर्पित हैं, जिन्हें इन देवताओं का वाहन माना जाता है.
हिंदू राजा ने कराया था प्रम्बानन मंदिर का निर्माण
प्रम्बानन मंदिर का निर्माण 1850 ईस्वी में हुआ था. इस मंदिर का निर्माण प्राचीन मतार साम्राज्य पर शासन करने वाले संजया राजवंश के एक हिंदू राजा राकाई पिकाटन ने कराया था. इसका संस्कृत नाम शिवगृह है, मतलब शिव का घर. इस मंदिर में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा होती है. इस मंदिर में भगवान शिव की प्रतिमा विराजमान है.
मंदिर की रेलिंग भी काफी नक्काशीदार
प्रम्बानन मंदिर परिसर को माउंट मेरू की तर्ज पर बनाया गया है. इस मंदिर को बनाने का मकसद बौद्ध के बढ़ते प्रभुत्व के दौर में हिंदू धर्म को फिर से स्थापित करना था. आज यह इंडोनेशिया के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल है. इस मंदिर की रेलिंग भी काफी नक्काशीदार है. इसे हिंदू शिक्षा के प्रसार का माध्यम माना जाता था. कहा जाता है कि रेलिंग पर उकेरी गई नक्काशी रामायण और महाभारत की कहानियां बताते हैं.
बता दें कि इंडोनेशिया से मोदी मोदी बुधवार शाम को ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज के निमंत्रण पर मेलबर्न के लिए रवाना होंगे. मेलबर्न में वह भारतीय समुदाय के लोगों से बातचीत करेंगे. इसके अलावा, यह दौरा भारत और ऑस्ट्रेलिया को उभरती और अहम प्रौद्योगिकी, खेल और खेल विज्ञान के क्षेत्रों में अपने द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने का मौका देगा.
मंदिर डिप्लोमेसी
बीते एक दशक में भारत ने सिर्फ अपने देश के मंदिरों और विरासत स्थलों के संरक्षण पर ही ध्यान नहीं दिया, बल्कि दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया समेत कई देशों में स्थित प्राचीन हिंदू और बौद्ध धरोहरों के संरक्षण और पुनर्निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
इस कड़ी में सबसे चर्चित परियोजनाओं में बांग्लादेश का रामना काली मंदिर है. 1971 में पाकिस्तान के ऑपरेशन सर्चलाइट के दौरान इस ऐतिहासिक मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया था. मोदी सरकार ने इसके पुनर्निर्माण में सहयोग देने का फैसला किया और 2021 में इसका पुनर्निर्मित स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए समर्पित किया गया. इसे भारत और बांग्लादेश के साझा सांस्कृतिक संबंधों का बड़ा प्रतीक माना गया. बांग्लादेश में ही भारत ने लगभग 300 साल पुराने जॉय काली माता मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए भी आर्थिक सहायता दी. इसके अलावा आनंदमोयी काली माता मंदिर और रामकृष्ण मंदिर के संरक्षण में भी भारत ने सहयोग किया.
वियतनाम में बचाई प्राचीन शिव परंपरा
भारत की सांस्कृतिक कूटनीति सिर्फ पड़ोसी देशों तक सीमित नहीं रही. वियतनाम के यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल माय सोन सैंक्चुअरी के संरक्षण में भी भारत ने अहम भूमिका निभाई. यह कभी प्राचीन चंपा साम्राज्य का धार्मिक केंद्र था और दक्षिण-पूर्व एशिया में शैव परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है. भारत और वियतनाम के बीच 2014 में हुए समझौते के बाद यहां संरक्षण का काम आगे बढ़ा.
मार के बागान में भारतीय विशेषज्ञों का योगदान
2016 के भूकंप में म्यांमार के ऐतिहासिक बागान पुरातात्विक क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचा था. इसके बाद 2017 में भारत और म्यांमार के बीच समझौता हुआ. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने यहां 12 ऐतिहासिक पैगोडा और प्रसिद्ध आनंदा मंदिर के संरक्षण और पुनर्स्थापन का काम पूरा किया.
नेपाल में 28 विरासत स्थलों का पुनर्निर्माण
2015 में नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप के बाद भारत ने 5 करोड़ डॉलर के पुनर्निर्माण पैकेज की घोषणा की. इसके तहत 28 सांस्कृतिक विरासत स्थलों के संरक्षण और पुनर्निर्माण का काम शुरू हुआ. इनमें प्रसिद्ध सेतो मच्छिंद्रनाथ मंदिर और बूढ़ानीलकंठ मंदिर धर्मशाला जैसे ऐतिहासिक स्थल शामिल हैं.
कंबोडिया में अंगकोर की विरासत को संजोया
कंबोडिया का अंगकोर वाट और ता प्रोहम मंदिर परिसर दुनिया में हिंदू सभ्यता की सबसे भव्य धरोहरों में गिने जाते हैं. भारत ने इन स्थलों के संरक्षण और संरचनात्मक मरम्मत में महत्वपूर्ण योगदान दिया. इसके अलावा प्रीह विहार परिसर में भी भारत संरक्षण कार्यों से जुड़ा रहा.
लाओस के हजार साल पुराने शिव मंदिर का संरक्षण
2024 से भारत ने लाओस के यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल वाट फू मंदिर परिसर में भी संरक्षण कार्य शुरू किया. करीब एक हजार वर्ष पुराने इस शिव मंदिर को दक्षिण-पूर्व एशिया में सनातन परंपरा के सबसे पुराने प्रतीकों में माना जाता है.
बहरीन और श्रीलंका में भी भारत की पहल
2019 में प्रधानमंत्री मोदी ने बहरीन की यात्रा के दौरान करीब 200 साल पुराने श्रीनाथजी मंदिर के पुनर्विकास परियोजना का उद्घाटन किया. खाड़ी क्षेत्र के सबसे पुराने हिंदू मंदिरों में शामिल इस मंदिर का पुनर्निर्माण भारतीय सहयोग से हुआ. वहीं श्रीलंका में भारत ने ऐतिहासिक तिरुकेतीश्वरम मंदिर के पुनर्स्थापन के लिए अनुदान सहायता दी. भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर श्रीलंका के पांच प्राचीन पंच ईश्वरम मंदिरों में शामिल है.
सिर्फ मंदिर नहीं, सांस्कृतिक रिश्तों की नई इबारत
विशेषज्ञों का मानना है कि इन परियोजनाओं का मकसद सिर्फ प्राचीन मंदिरों की मरम्मत कराना नहीं है. इसके जरिए भारत उन देशों के साथ अपने हजारों साल पुराने सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों को भी मजबूत कर रहा है, जहां कभी भारतीय संस्कृति, हिंदू और बौद्ध परंपराओं का गहरा प्रभाव रहा है. ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री मोदी इंडोनेशिया के ऐतिहासिक प्रम्बानन मंदिर पहुंचे हैं, यह यात्रा केवल एक धार्मिक स्थल के दर्शन तक सीमित नहीं रह जाती. यह भारत की उस व्यापक सांस्कृतिक कूटनीति का हिस्सा बन जाती है, जिसके जरिए नई दिल्ली दुनिया के अलग-अलग देशों में मौजूद साझा विरासत को संरक्षित करने और सभ्यतागत संबंधों को नई ऊर्जा देने का प्रयास कर रही है.