किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को संसद के दोनों सदनों में पास कराने के लिए दो बड़े पड़ावों को पार करना होता है. पहला नियम है- विधेयक को सदन की कुल सदस्य संख्या के आधे से अधिक का समर्थन मिलना अनिवार्य है. दूसरा नियम है कि मतदान के समय सदन में उपस्थित और वोट करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई समर्थन मिलना जरूरी है.
पिछले तीन महीनों में देश का पॉलिटिकल सिनेरियो दिलचस्प तरीके से बदला है. दिलचस्प बात यह है कि यह बदलाव किसी नए आम चुनाव के कारण नहीं बल्कि दलबदल, पार्टियों में टूट, बदलते गठबंधनों और संसद में खाली हुई सीटों के कारण आया है. इन घटनाक्रमों ने जहां एक तरफ एनडीए को मजबूत किया है, वहीं विपक्ष की ताकत को लगातार समेटा है. आइए समझते हैं कि ये कैसे हुआ?
- तृणमूल कांग्रेस में बड़ी टूट
सबसे बड़ा उलटफेर पश्चिम बंगाल से सामने आया है. विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों ने पार्टी से अलग होकर नेशनल कॉमन पीपल्स इनिशिएटिव (NCPI) का गठन किया है और एनडीए को समर्थन देने का इरादा जताया है. अगर सत्र शुरू होने से पहले स्पीकर इस विलय को औपचारिक रूप से मंजूरी दे देते हैं तो लोकसभा में सत्ताधारी गठबंधन की ताकत में बंपर इजाफा होगा और विपक्ष अपने एक बड़े हिस्से को गंवा देगा. - शिवसेना (UBT) को झटका
महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना (UBT) के 6 सांसदों ने पाला बदलकर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का दामन थाम लिया है, जो एनडीए का हिस्सा है. इन सांसदों को मान्यता मिलते ही वे विपक्ष की बेंच से उठकर सत्तापक्ष की कतार में शामिल हो जाएंगे. - एनसीपी (SP) का संकेत अहम
महाराष्ट्र की एक और प्रमुख पार्टी और विपक्षी खेमे का मजबूत धड़ा एनसीपी (शरद पवार गुट) की तरफ से भी भाजपा के फेवर वाले संकेत मिल रहे हैं. एनसीपी (एसपी) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले ने कहा कि अगर 50 प्रतिशत सीट की बढ़ोत्तरी को राज्य के मौजूदा सीट के हिसाब से किया गया तो उसपर आपत्ति नहीं होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि जब तक बिल देख नहीं लेते हैं तब तक समर्थन नहीं करेंगे. अगर इस गुट का समर्थन मिलता है तो 8 सांसद और भी बढ़ जाएंगे. - तमिलनाडु में DMK पर जोर
एक दशक से भी ज्यादा पुराना कांग्रेस-डीएमके गठबंधन टूट चुका है, जिसने विपक्षी राजनीति की धुरी को हिलाकर रख दिया है. हालांकि डीएमके आधिकारिक तौर पर एनडीए में शामिल नहीं हुई है लेकिन INDIA ब्लॉक से उसके बाहर होने का मतलब है कि विपक्ष अब उसके 22 लोकसभा सांसदों के समर्थन को तय मानकर नहीं चल सकता है. एक्सपर्ट्स का तो यहां तक कहना है कि डीएमके चुनिंदा विधेयकों पर बीजेपी को को मुद्दा आधारित समर्थन दे सकती है. - राज्यसभा का सुधरा अंकगणित
हाल ही में हुए राज्यसभा चुनावों और राज्यों में बदलते राजनीतिक समीकरणों के कारण एनडीए की स्थिति मजबूत हुई है. लोकसभा के विपरीत, जहां सांसद सीधे चुने जाते हैं, राज्यसभा में राज्यों की विधानसभाओं के जरिए सदस्य आते हैं. हाल के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की जीतों ने राज्यसभा में उसकी सीटों की संख्या बढ़ाई है, जिससे सरकार की वह बड़ी बाधा दूर हो रही है जो लंबे समय से उसके फैसलों को रोकती थी.
एनडीए अभी अप्रैल की तुलना में बेहद मजबूत स्थिति में है लेकिन अभी भी वह अपने दम पर पूर्ण विशेष बहुमत की गारंटी से थोड़ा दूर है. लोकसभा में मौजूदा स्थिति की बात करें तो एनडीए के पास वर्तमान में लगभग 293 सांसद हैं. हालांकि नया समीकरण भी है. टीएमसी के अगर 20 बागी और शिवसेना (UBT) के 6 पूर्व सांसद इसमें जुड़ते हैं तो यह आंकड़ा 319 तक पहुंच जाता है. इसके साथ ही डीएमके के 22 सांसद भी चुनिंदा मुद्दों पर सरकार के साथ आते हैं, तो एनडीए का आंकड़ा 341 तक जा सकता है. एनसीपी (शरद पवार) गुट के 8 सांसदों के आने से भी बल मिलेगा और नंबर 349 तक पहुंच सकता है.








