स्विट्जरलैंड ने भारत को दिए ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा किया रद्द

स्विट्जरलैंड ने भारत को दिए ‘मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन’ (MFN) का दर्ज़ा रद्द करने का ऐलान किया है. जो कि दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है. स्विट्जरलैंड ने यह फैसला भारतीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में दिए गए यह नेस्ले विवाद के फ़ैसले के बाद लिया है. […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
सोमवार, 16 दिसंबर 2024, 07:00 AM 8 मिनट read
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स्विट्जरलैंड ने भारत को दिए ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा किया रद्द
Photo: UB India News Archive

स्विट्जरलैंड ने भारत को दिए ‘मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन’ (MFN) का दर्ज़ा रद्द करने का ऐलान किया है. जो कि दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है. स्विट्जरलैंड ने यह फैसला भारतीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में दिए गए यह नेस्ले विवाद  के फ़ैसले के बाद लिया है. इस ऐलान ने स्विट्जरलैंड और भारत के बीच व्यापार, निवेश और कराधान संबंधी समझौतों में एक नया मोड़ ला दिया है. 1 जनवरी 2025 से लागू होने वाला यह बदलाव, खासकर उन भारतीय कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण होगा जो स्विट्जरलैंड में कारोबार कर रही हैं या वहां निवेश करती हैं.

ऐसे में इस रिपोर्ट में हम विस्तार से समझेंगे कि स्विट्जरलैंड के इस फैसले का क्या मतलब है, इसका भारत के व्यापार और निवेश पर क्या असर पड़ सकता है.

‘मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन’ दर्ज़ा क्या है और क्यों दिया जाता है?

‘मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन’ (एमएफएन) एक व्यापारिक प्रावधान है, जो विश्व व्यापार संगठन के सदस्य देशों के बीच लागू होता है. इसके तहत, एक देश दूसरे देश को बिना किसी भेदभाव के व्यापारिक लाभ देता है. अगर एक देश किसी तीसरे देश को व्यापार में विशेष लाभ देता है, तो एमएफएन के तहत अन्य देशों को भी स्वचालित रूप से यह लाभ मिल जाता है. इसका मुख्य उद्देश्य व्यापारिक बाधाओं को कम करना और देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देना होता है. एमएफएन दर्ज़ा किसी भी देश के लिए यह सुनिश्चित करता है कि उसे व्यापारिक मामले में किसी अन्य देश के समान अवसर और लाभ मिलेंगे.

भारत और स्विट्जरलैंड के बीच 1994 में ‘डबल टैक्स अवॉइडेंस एग्रीमेंट’ हुआ था, जिसमें एमएफएन प्रावधान भी शामिल था. इसके तहत स्विट्जरलैंड ने भारत को यह दर्ज़ा दिया था, जो दोनों देशों के व्यापारिक और निवेशिक संबंधों को सुविधाजनक बनाता था. इस समझौते से स्विट्जरलैंड में काम कर रही भारतीय कंपनियों को करों में छूट मिलती थी और उनका निवेश भी सुरक्षित रहता था.

‘डबल टैक्स अवॉइडेंस एग्रीमेंट’ क्या है 

‘डबल टैक्स अवॉइडेंस एग्रीमेंट’ (डीटीएए) दो देशों के बीच एक समझौता होता है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि एक ही आय पर दोनों देशों में टैक्स न लगाया जाए. जब एक व्यक्ति या कंपनी किसी एक देश में आय अर्जित करती है, लेकिन वह दूसरे देश का निवासी है, तो डीटीएए यह तय करता है कि उस आय पर दोनों देशों में टैक्स नहीं लिया जाएगाय इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि टैक्स से संबंधित जटिलताओं को दूर किया जाए और व्यापार एवं निवेश को बढ़ावा दिया जाए.

डीटीएए के तहत, अगर किसी व्यक्ति ने एक देश में टैक्स चुका दिया है, तो वह दूसरे देश में अपनी आय पर टैक्स का क्रेडिट या छूट प्राप्त कर सकता है, जिससे उसे दो बार टैक्स नहीं देना पड़ता. यह समझौता यह भी सुनिश्चित करता है कि दोनों देशों के बीच टैक्स की दरों में सहमति हो, ताकि व्यापार और निवेश में कोई दिक्कत न आएय इस तरह से, डीटीएए से दोनों देशों के नागरिकों और कंपनियों को टैक्स में राहत मिलती है और वे बिना किसी बाधा के दूसरे देशों में व्यापार या निवेश कर सकते हैं.

नेस्ले विवाद और सुप्रीम कोर्ट का फैसला

स्विट्जरलैंड के इस फैसले की वजह भारतीय सुप्रीम कोर्ट का एक हालिया आदेश है, जो नेस्ले से जुड़े एक विवाद से संबंधित है. दरअसल, स्विट्जरलैंड की कंपनी नेस्ले ने भारतीय सरकार से यह दलील दी थी कि उसे स्लोवानिया, लिथुआनिया और कोलंबिया जैसे देशों की तरह बेहतर टैक्स छूट मिलनी चाहिए. इन देशों के साथ भारत ने 2016 से पहले एमएफएन समझौता किया था, जिसके तहत स्विस कंपनियों को 5% टैक्स छूट मिलती थी, जबकि इन देशों के साथ यह छूट ज्यादा थी.

नेस्ले ने यह दलील दी कि अगर भारत इन देशों को ज्यादा टैक्स छूट दे सकता है, तो उसे भी उसी तरह की छूट मिलनी चाहिए. इस पर भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने 19 अक्टूबर 2023 को फैसला सुनाया कि भारत को स्विट्जरलैंड के लिए अपने एमएफएन समझौते को लागू करने के लिए अलग से इनकम टैक्स एक्ट की धारा 90 के तहत अधिसूचना जारी करनी होगी. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद स्विट्ज़रलैंड ने एमएफएन का दर्ज़ा वापस लेने का फैसला लिया.

स्विट्जरलैंड का एमएफएन दर्ज़ा रद्द करने का फैसला

स्विट्जरलैंड के वित्त मंत्रालय ने 2023 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आधार बनाते हुए भारत को दिया गया एमएफएन दर्ज़ा रद्द करने की घोषणा की. यह फैसला 1 जनवरी 2025 से लागू होगा. इसका मतलब यह है कि अब स्विट्जरलैंड में काम करने वाली भारतीय कंपनियों को स्विस विदहोल्डिंग टैक्स पर 10% टैक्स चुकाना होगा, जो पहले 5% था. इससे पहले, स्विट्जरलैंड में भारतीय कंपनियों के डिविडेंड्स पर 5% टैक्स लिया जाता था, लेकिन अब उन्हें ज्यादा टैक्स देना होगा.

स्विट्जरलैंड ने इस फैसले का औचित्य बताते हुए कहा कि भारत और स्विट्जरलैंड के बीच डबल टैक्स अवॉइडेंस एग्रीमेंट (DTAA) के तहत एमएफएन प्रावधान को एकतरफा निलंबित किया गया है. इसके परिणामस्वरूप, स्विस टैक्स सीटिजन और भारतीय कंपनियों को इस बदलाव का सामना करना पड़ेगा, जिससे उनका कारोबार और निवेश प्रभावित हो सकता है.

इस फैसले का भारत और स्विट्जरलैंड के व्यापार और निवेश पर असर

स्विट्जरलैंड के इस फैसले का भारतीय कंपनियों के लिए गहरा असर हो सकता है. खासकर उन भारतीय कंपनियों के लिए जो स्विट्जरलैंड में निवेश करती हैं और स्विस कंपनियों के साथ व्यापार करती हैं. स्विट्जरलैंड में काम करने वाली भारतीय कंपनियों को अब अपने डिविडेंड्स पर ज्यादा टैक्स चुकाना होगा, जिससे उनका रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (ROI) प्रभावित हो सकता है. इससे उनके व्यवसाय पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ेगा, और वे स्विट्जरलैंड में निवेश करने या वहां अपने व्यापार विस्तार को लेकर पुनर्विचार कर सकती हैं.

स्विट्जरलैंड भारत में प्रमुख निवेशक देशों में से एक है, और वहां से आने वाली कंपनियों का भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर, बैंकिंग, इन्कम टेक्स, इंजीनियरिंग और सूचना तकनीकी (IT) जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण निवेश है. स्विट्जरलैंड में काम कर रही 323 भारतीय कंपनियां इस समय भारत में करीब 1.35 लाख लोगों को रोजगार देती हैं. इनमें से कुछ कंपनियां मशीनरी, कंस्ट्रक्शन, इंजीनियरिंग, और बैंकिंग जैसे क्षेत्र में कार्यरत हैं. स्विट्जरलैंड के इस फैसले से इन कंपनियों की कारोबारी रणनीतियों पर असर पड़ सकता है, और वे भारत में निवेश कम कर सकती हैं.

स्विट्जरलैंड के निवेश का भारत पर असर

स्विट्जरलैंड के द्वारा भारत को एमएफएन दर्जा रद्द करने से भारत के व्यापार और निवेश पर भी असर पड़ सकता है. भारत और स्विट्जरलैंड के बीच व्यापार के आंकड़े बताते हैं कि 2021 में दोनों देशों के बीच 30.8 अरब डॉलर का व्यापार हुआ, जिसमें भारत ने 29.5 अरब डॉलर का आयात किया और 1.2 अरब डॉलर का निर्यात किया. स्विट्जरलैंड से भारत में आने वाली प्रमुख वस्तुएं सोने-चांदी, कैमिकल्स, दवाइयां, और इंजीनियरिंग सामान हैं, जबकि भारत स्विट्जरलैंड को ऑर्गेनिक कैमिकल्स, मोती, कीमती रत्न, और कपड़े निर्यात करता है.

अगर स्विट्जरलैंड से भारत में आने वाले निवेश में कमी आती है, तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका हो सकता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां स्विट्जरलैंड की कंपनियों ने महत्वपूर्ण निवेश किया है. यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन के तहत स्विट्जरलैंड के चार देशों ने भारत में 100 अरब डॉलर का निवेश करने का लक्ष्य रखा था. अगर स्विट्जरलैंड में व्यापारिक सहूलियतें और टैक्स में राहत कम होती है, तो यह निवेश प्रभावित हो सकता है.

स्विट्जरलैंड का बढ़ा है निवेश

स्विट्जरलैंड का भारत में निवेश पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ा है. वर्तमान में इस देश का भारत में निवेश 9.77 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच चुका है, और यह निवेश मुख्यत आईटी, लाइफ साइंसेस, कैमिकल्स, और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में किया गया है. भारत की कई प्रमुख कंपनियां, जिनका स्विट्जरलैंड में निवेश है, इस समय 179 स्थानों पर काम कर रही हैं. इन कंपनियों को स्विट्जरलैंड के फैसले से लाभ में कमी हो सकती है, और वे अपने निवेश पर दोबारा विचार कर सकती हैं.

स्विट्जरलैंड के निर्णय का दीर्घकालिक असर

स्विट्जरलैंड के फैसले का भारत के व्यापार और निवेश पर दीर्घकालिक असर भी हो सकता है. खासकर उन देशों की कंपनियों के लिए जो यूरोपीय फ्री ट्रेड एसोसिएशन (EFTA) के सदस्य हैं और जिन्होंने भारत में निवेश करने का लक्ष्य रखा है. स्विट्जरलैंड द्वारा एमएफएन दर्जा वापस लिए जाने से इन देशों का भी निवेश प्रभावित हो सकता है. इससे भारत के लिए भविष्य में आने वाली विदेशी निवेश की संभावनाएं प्रभावित हो सकती हैं.

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