पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम दक्षिण एशिया की सुरक्षा और रणनीति में एक महत्वपूर्ण विषय रहा है. इस कार्यक्रम का एक प्रमुख केंद्र किराना हिल्स है, जो सरगोधा के पास एक अत्यधिक सुरक्षित सैन्य क्षेत्र में स्थित है. भारतीय सेना की ओर से शुरू किए गए ऑपरेशन सिंदूर के बाद ये चर्चा में है. कयास लगाए जा रहे थे कि भारत की ओर से किए गए हमले में यहां खासा नुकसान पहुंचा है और इसका असर परमाणु हथियारों तक हुआ है. इसकी वजह से रेडिएशन की खबरे हैं. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने किसी भी तरह के रेडिएशन के खतरे से इनकार किया है.
पाकिस्तान के लिए किराना हिल्स का महत्व
किराना हिल्स पाकिस्तान के परमाणु हथियार कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह सरगोधा शहर के पास एक पहाड़ी क्षेत्र है, जो सैन्य दृष्टिकोण से बहुत ही सुरक्षित और मजबूत माना जाता है. 1980 और 1990 के दशक में यहां कई छोटे-छोटे परमाणु परीक्षण किए गए, जिन्हें “सब-क्रिटिकल” या “कोल्ड टेस्ट” कहा जाता है. इन परीक्षणों का उद्देश्य परमाणु हथियारों के डिज़ाइन और उनके ट्रिगर तंत्र को जांचना था, बिना किसी बड़े विस्फोट के. पहला परीक्षण, जिसे “किराना-आई” नाम दिया गया, मार्च 1983 में पाकिस्तान परमाणु ऊर्जा आयोग (PAEC) द्वारा किया गया था. 1983 से 1994 तक कुल 24 ऐसे परीक्षण किए गए.
किराना हिल्स को पाकिस्तान की दूसरी हमले की क्षमता (सेकंड-स्ट्राइक कैपेबिलिटी) का केंद्र माना जाता है. इसका मतलब है कि अगर कोई देश पाकिस्तान पर पहले हमला करता है, तो भी यह क्षेत्र सुरक्षित रहकर जवाबी हमला करने में सक्षम है. इस क्षेत्र में भूमिगत सुरंगें हैं, जो परमाणु हथियारों को छिपाने और उनकी सुरक्षा के लिए बनाई गई हैं. इसके अलावा, किराना हिल्स सरगोधा के करीब है, जहां पाकिस्तान की वायुसेना का एक बड़ा अड्डा है. इस अड्डे पर परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम F-16 विमान और हमलावर स्क्वाड्रन तैनात हैं. इस वजह से किराना हिल्स को पाकिस्तान की रणनीतिक रक्षा का “नर्व नोड” (मुख्य केंद्र) कहा जाता है.
किराना हिल्स में हुए परमाणु परीक्षण
किराना हिल्स में 1980 और 1990 के दशक में किए गए परीक्षण “सब-क्रिटिकल” थे. इन परीक्षणों में परमाणु विस्फोट नहीं होता, बल्कि हथियारों के डिज़ाइन और उनके काम करने की प्रक्रिया को जांचा जाता है. ये परीक्षण इसलिए महत्वपूर्ण थे, क्योंकि इनके जरिए पाकिस्तान ने अपने परमाणु हथियारों को और मजबूत किया, बिना दुनिया को बड़े विस्फोटों के बारे में पता चले. इन परीक्षणों ने पाकिस्तान को यह सुनिश्चित करने में मदद की कि उसके परमाणु हथियार विश्वसनीय और प्रभावी हैं.
स्ट्रैटेजिक प्लान्स डिवीजन (SPD) की भूमिका
पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम स्ट्रैटेजिक प्लान्स डिवीजन (SPD) द्वारा नियंत्रित किया जाता है. यह एक शीर्ष संगठन है, जो 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद बनाया गया था. SPD का मुख्य काम परमाणु हथियारों की सुरक्षा, उनके उपयोग की रणनीति बनाना, और कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम को संभालना है. यह संगठन राष्ट्रीय कमांड प्राधिकरण (NCA) के तहत काम करता है, जिसके अध्यक्ष पाकिस्तान के प्रधानमंत्री होते हैं. SPD यह सुनिश्चित करता है कि परमाणु हथियार सुरक्षित रहें और उनका इस्तेमाल केवल जरूरी स्थिति में हो. इसके लिए एक खास सैन्य बल भी बनाया गया है, जो परमाणु हथियारों की सुरक्षा करता है.
पाकिस्तान की परमाणु नीति
पाकिस्तान ने अपनी परमाणु नीति को स्पष्ट रूप से घोषित नहीं किया है. वह जानबूझकर अपनी रणनीति को अस्पष्ट रखता है, ताकि दुश्मन देश उसकी सीमाओं का अनुमान न लगा सकें. लेकिन कुछ आधिकारिक बयानों और विकास के आधार पर, यह समझा जा सकता है कि पाकिस्तान का मुख्य लक्ष्य भारत की पारंपरिक और परमाणु आक्रामकता को रोकना है. अगर यह रणनीति विफल हो जाती है, तो उसका दूसरा लक्ष्य भारत को युद्ध में जीतने से रोकना है.
पाकिस्तान “नो-फर्स्ट-यूज” (पहले परमाणु हमला न करने) की नीति को स्वीकार नहीं करता. उसकी नीति “न्यूनतम विश्वसनीय प्रतिरोध” (मिनिमम क्रेडिबल डिटरेंस) पर आधारित है, जो अब “पूर्ण स्पेक्ट्रम प्रतिरोध” (फुल स्पेक्ट्रम डिटरेंस) में बदल गई है. इसका मतलब है कि पाकिस्तान के पास जमीन, हवा, और समुद्र से परमाणु हमला करने की क्षमता है. इसके लिए उसने छोटी दूरी की परमाणु मिसाइलें जैसे “नस्र” और समुद्र आधारित दूसरी हमले की क्षमता विकसित की है. यह रणनीति भारत की पारंपरिक सैन्य शक्ति और बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम के जवाब में बनाई गई है.
परमाणु हथियार पहुंचाने की प्रणाली
पाकिस्तान के पास कई तरह की परमाणु हथियार पहुंचाने की प्रणालियां हैं:
जमीन आधारित: इसमें 2750 किलोमीटर तक की रेंज वाली “शाहीन-III” जैसी बैलिस्टिक मिसाइलें और 700 किलोमीटर तक की रेंज वाली “बाबर” क्रूज मिसाइलें शामिल हैं. इसके अलावा, “नस्र” जैसी छोटी मिसाइलें युद्धक्षेत्र में इस्तेमाल के लिए हैं.
हवा आधारित: JF-17 थंडर और F-16 विमान परमाणु हथियार ले जा सकते हैं. इसके साथ ही “राद” नाम की हवा से छोड़ी जाने वाली क्रूज मिसाइल भी है.
समुद्र आधारित: पाकिस्तान नौसेना समुद्र से दूसरा हमला करने की क्षमता विकसित कर रही है. इसमें “बाबर III” नाम की पनडुब्बी से छोड़ी जाने वाली क्रूज मिसाइल शामिल है. भविष्य में परमाणु पनडुब्बियां भी बनाई जा सकती हैं.
अन्य प्रमुख परमाणु कार्यक्रम
पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर साइंस एंड टेक्नोलॉजी (PINSTECH): इस्लामाबाद के पास स्थित यह संस्थान एक रीप्रोसेसिंग प्लांट का घर है, जहां प्लूटोनियम का विद्युत-चुंबकीय पृथक्करण होता है. यह IAEA के निरीक्षण से मुक्त है.
खुशाब के रिएक्टर, जो चीन की मदद से बने हैं, IAEA की निगरानी से बाहर हैं, जबकि PINSTECH, नीलोर, और कराची के रिएक्टर IAEA की निगरानी में हैं.
अंतरराष्ट्रीय चिंताएं
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और परमाणु वैज्ञानिक डॉ. अब्दुल कादिर खान ने दावा किया है कि पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम दुनिया में सबसे सुरक्षित है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ इससे सहमत नहीं हैं. पाकिस्तान में अस्थिरता और सैन्य ठिकानों पर हुए हमलों के कारण चिंता है कि परमाणु हथियार गलत हाथों में जा सकते हैं. अमेरिका ने गुप्त रूप से पाकिस्तान को परमाणु हथियारों की सुरक्षा में मदद दी है. IAEA ने कुछ मौकों पर पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को सुरक्षित बताया है, लेकिन चिंताएं बनी हुई हैं.
परमाणु ठिकानों पर हमले का खतरा
अगर किराना हिल्स या किसी अन्य परमाणु ठिकाने पर पर हमला होता है, तो इसे पाकिस्तान अपनी परमाणु कमांड श्रृंखला को नष्ट करने की कोशिश मानेगा. यह एक बड़ा उकसावा होगा और इसके जवाब में पाकिस्तान परमाणु हमला कर सकता है. ये पाकिस्तान की ओर से गीदड़भभकी दी जाती रही है. लेकिन उसको अंदाजा नहीं है कि ऐसा होने से दक्षिण एशिया का नाजुक परमाणु संतुलन बिगड़ सकता है और पूरे क्षेत्र में युद्ध का खतरा बढ़ सकता है. इसके प्रभाव केवल इस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी असर डालेंगे. पाकिस्तान को सबसे पहले अपने परमाणु हथियारों की रक्षा वहां के आतंकी संगठनों से करना चाहिए जो उसके लिए बड़ी चुनौती हैं. अगर ये परमाणु जखीरा आतंकी संगठनों के हाथ लगता है तो दुनिया को कितना बड़ा खतरा हो सकता है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.








