पश्चिमी-देशों में 80 साल बाद फिर विश्व युद्ध का डर…..

दूसरे विश्व युद्ध (1939-45) की समाप्ति को 80 साल बीत चुके हैं, लेकिन वैश्विक शांति की नींव फिर से डगमगाने लगी है। यूगोव के ताजा सर्वे के अनुसार, अमेरिका और यूरोप के लोग पांच से दस साल में तीसरे विश्व युद्ध की आशंका जता रहे हैं। रूस के साथ बढ़ता तनाव, अमेरिका की विदेश नीति […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
सोमवार, 2 जून 2025, 05:10 AM 5 मिनट read
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दूसरे विश्व युद्ध (1939-45) की समाप्ति को 80 साल बीत चुके हैं, लेकिन वैश्विक शांति की नींव फिर से डगमगाने लगी है।

यूगोव के ताजा सर्वे के अनुसार, अमेरिका और यूरोप के लोग पांच से दस साल में तीसरे विश्व युद्ध की आशंका जता रहे हैं। रूस के साथ बढ़ता तनाव, अमेरिका की विदेश नीति और परमाणु हथियारों का खतरा इस डर की सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है।

सर्वे में शामिल 55% लोगों ने माना कि एक और वैश्विक युद्ध संभव है। वहीं, 76% का मानना है कि वर्ल्ड वॉर में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल होगा।

लोगों को यह भी डर है कि यह दूसरे विश्व युद्ध के मुकाबले कहीं अधिक विनाशकारी होगा। यूरोप और अमेरिका में लोग अपने देशों को इस युद्ध में शामिल होने की आशंका जता रहे हैं।

सर्वे में यह भी सामने आया कि कई यूरोपीय देशों के नागरिकों में अपनी सेनाओं की रक्षा क्षमता पर भरोसा कम है।
सर्वे में यह भी सामने आया कि कई यूरोपीय देशों के नागरिकों में अपनी सेनाओं की रक्षा क्षमता पर भरोसा कम है।

दूसरे विश्व युद्ध की यादें आज भी ताजा

दूसरे विश्व युद्ध की यादें आज भी लोगों के मन में ताजा हैं। सर्वे में शामिल 90% लोग मानते हैं कि इस युद्ध को स्कूलों में पढ़ाया जाना चाहिए।

फ्रांस (72%), जर्मनी (70%) और ब्रिटेन (66%) में लोग इस युद्ध के बारे में अच्छी जानकारी रखते हैं, जबकि स्पेन में यह आंकड़ा केवल 40% है। 77% फ्रांसीसी और 60% जर्मन कहते हैं कि उन्हें स्कूल में इस युद्ध के बारे में विस्तार से पढ़ाया गया।

52% लोगों को लगता है कि दुनियाभर में नाजी शासन जैसे अत्याचार आज भी संभव हैं। 60% का मानना है कि अमेरिका या अन्य यूरोपीय देशों में भी यह खतरा मौजूद है।

यह डर दिखाता है कि इतिहास की गलतियां दोहराने की आशंका अभी खत्म नहीं हुई है।
यह डर दिखाता है कि इतिहास की गलतियां दोहराने की आशंका अभी खत्म नहीं हुई है।

इस्लामिक आतंकवाद भी बड़ा खतरा

सर्वे में पश्चिमी यूरोप के 82% और अमेरिका के 69% लोगों ने रूस के साथ तनाव को सबसे बड़ा खतरा बताया। लोग मानते हैं कि रूस की सैन्य गतिविधियां और उसकी परमाणु क्षमता वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा हैं। रूस के अलावा, इस्लामिक आतंकवाद को भी बड़ा खतरा माना गया है। लोगों का मानना है कि इस पर जल्द काबू पाना जरूरी है। यह डर वैश्विक कूटनीति में बढ़ती दरारों का संकेत है।

66% ने नाटो और 60% ने संयुक्त राष्ट्र को शांति के लिए अहम माना

66% लोगों ने नाटो को युद्ध के बाद शांति बनाए रखने में सबसे बड़ा योगदानकर्ता माना। 60% ने संयुक्त राष्ट्र को भी इस दिशा में महत्वपूर्ण माना। यूरोपीय संघ को भी 56% लोगों ने शांति का एक प्रमुख स्तंभ बताया।

सर्वे में यह भी सामने आया कि जर्मनी में 47% मानते हैं कि पहले की सरकारें नाजी अतीत को लेकर अति-सचेत रही हैं। लेकिन वर्तमान सरकार हाल के संकटों में मजबूत कदम उठाने में नाकाम रही है।

ब्रिटेन की न्यूक्लियर रणनीति में बड़ा बदलाव किया गया

रूस और यूक्रेन की जंग अब सिर्फ दो देशों के बीच नहीं रह गई है. यह वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी बन गई है. तनाव के बीच ब्रिटेन ने शीत युद्ध के बाद पहली बार अपनी न्यूक्लियर रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. ब्रिटेन की सरकार अब अमेरिका से ऐसे लड़ाकू विमान खरीदने की योजना बना रही है जो परमाणु बम गिरा सकें.

यानी अब सिर्फ पनडुब्बी नहीं हवा से भी होगा ‘न्यूक्लियर रिटालिएशन’ का वार. ब्रिटेन का मानना है कि दुनिया एक “तीसरे परमाणु युग” में दाखिल हो चुकी है और ऐसे में केवल पनडुब्बी के भरोसे बैठना अब सुरक्षित नहीं है.

क्यों कर रहा है ब्रिटेन ऐसा फैसला?
ब्रिटेन के रक्षा सचिव जॉन हीली और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ एडमिरल टोनी रडाकिन ने अमेरिका से F-35A लाइटनिंग II जैसे फाइटर जेट्स की मांग की है. ये B61 थर्मोन्यूक्लियर बम ले जा सकते हैं. खास बात ये है कि इन बमों की ताकत पारंपरिक परमाणु हथियारों से कम होती है. इससे लक्ष्य पर सटीक प्रहार संभव है.

इस फैसले के पीछे साफ संदेश है कि पुतिन की आक्रामक नीति और चीन, उत्तर कोरिया, ईरान जैसे देशों की अस्थिरता दुनिया को फिर से एक खतरनाक मोड़ पर ले आई है. ब्रिटेन अब सिर्फ अमेरिका की ‘परमाणु छतरी’ के नीचे नहीं रहना चाहता बल्कि खुद को भी ‘हवाई परमाणु ताकत’ बनाना चाहता है.

फिलहाल क्या है ब्रिटेन के पास?
वर्तमान में ब्रिटेन के पास केवल ट्राइडेंट-मिसाइल से लैस पनडुब्बियां हैं जिनसे परमाणु हमला संभव है. उसके पास अमेरिका, रूस, चीन, भारत और फ्रांस जैसी ‘त्रिस्तरीय’ (जल, थल, नभ) परमाणु हमला क्षमता नहीं है. अगर यह डील पक्की होती है तो ब्रिटेन की हवाई क्षमता में बड़ा बदलाव आएगा. यानी अगर जरूरत पड़ी तो पनडुब्बियों से पहले लड़ाकू विमान दुश्मन पर ‘परमाणु जवाबी हमला’ कर सकेंगे.

क्या यह यूक्रेन युद्ध को और उग्र बना देगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम रूस को और अधिक उत्तेजित कर सकता है. हालांकि ब्रिटेन का दावा है कि यह पूरी तरह से “रोकथाम” के मकसद से है. फ्रांस पहले ही यूरोप में अपने परमाणु हथियार तैनात करने की बात कर चुका है. इसे जर्मनी का समर्थन भी मिला है.

2034 तक बड़ा डिफेंस बजट
ब्रिटेन सरकार 2034 तक अपने रक्षा बजट को GDP का 3% तक बढ़ाना चाहती है (अभी यह करीब 2.5% है). इसके तहत 7,000 लॉन्ग-रेंज हथियारों के निर्माण का लक्ष्य भी रखा गया है. यानी ब्रिटेन अब केवल “रिएक्टिव” नहीं, बल्कि “प्रोएक्टिव” रणनीति पर चलने वाला है.

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