नवारो का प्रहार, बेसेंट का ‘शांति राग’, टैरिफ की तलवार… भारत-US के बर्बाद हो गये रिश्ते?

यूक्रेन में युद्ध मोदी का युद्ध है… भारत बहुत घमंडी है… भारत यूक्रेन में नरसंहार करवा रहा है… ये कुछ ऐसे वाक्य हैं, जिसने भारत और अमेरिका की साझेदारी को बहुत नुकसान पहुंचाया है। ये कुछ ऐसे वाक्य हैं.. जो आज से 30-40 सालों के बाद भी भारत और अमेरिका के रिश्तों में खाज की […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 28 अगस्त 2025, 06:41 AM 5 मिनट read
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नवारो का प्रहार, बेसेंट का ‘शांति राग’, टैरिफ की तलवार… भारत-US के बर्बाद हो गये रिश्ते?
Photo: UB India News Archive

यूक्रेन में युद्ध मोदी का युद्ध है… भारत बहुत घमंडी है… भारत यूक्रेन में नरसंहार करवा रहा है… ये कुछ ऐसे वाक्य हैं, जिसने भारत और अमेरिका की साझेदारी को बहुत नुकसान पहुंचाया है। ये कुछ ऐसे वाक्य हैं.. जो आज से 30-40 सालों के बाद भी भारत और अमेरिका के रिश्तों में खाज की तरह खुजली करते रहेंगे। और इन वाक्यों के सृजनकर्ता डोनाल्ड ट्रंप के ‘शुंभ निशुंभ’ यानि पीटर नवारो और स्कॉट बेसेंट हैं। पीटर नवारो वाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप के कारोबारी सलाहकार हैं, जबकि स्कॉट बेसेंट अमेरिका के वित्त मंत्री हैं। पिछले करीब एक महीने से ये दोनों अमेरिकी चैनलों पर बैठकर भारत के खिलाफ विष उगल रहे हैं।

गुरुवार को पीटर नवारो ने यूक्रेन युद्ध को ‘मोदी का युद्ध’ बताया, जबकि अभी तक अमेरिकी नेता यूक्रेन युद्ध को ‘पुतिन का युद्ध’ कहकर संबोधित कर रहे थे। उनकी बयानबाजी उस वक्त भी जारी है, जब अमेरिका का 50 प्रतिशत टैरिफ एक्टिवेट हो चुका है। लेकिन ये दोनों इतने से भी तैयार नहीं हैं। हालांकि भारत ने रूसी तेल खरीदने की वजह से लगाए गये जुर्माने को खारिज कर दिया और अमेरिका के डबल स्टैंडर्ड की निंदा की है, क्योंकि चीन भारत से ज्यादा रूसी तेल खरीदता है और चीन पर इस वजह से कोई टैरिफ नहीं है। नवारो ने बीजिंग और मॉस्को के साथ भारत के बढ़ते आर्थिक संबंधों के प्रति चेतावनी देते हुए कहा कि ‘इससे वैश्विक स्थिरता को खतरा होगा।’ यानि ऐसा लग रहा है कि अमेरिका ही वैश्विक शांति का इकलौता ठेकेदार है।

ब्लूमबर्ग को दिए एक इंटरव्यू में पीटर नवारो ने भारत को सीधे-सीधे रूस-यूक्रेन युद्ध में शामिल करार दिया। उन्होंने कहा कि “भारत जब रूस से तेल खरीदता है और फिर उसे रिफाइन कर दुनिया को बेचता है, तो इससे यूक्रेन युद्ध मशीनरी को फंड मिलते हैं। इससे अमेरिकी टैक्सपेयर्स को नुकसान झेलना पड़ता है। यह सिर्फ पुतिन की जंग नहीं है, यह मोदी की जंग भी है।” नवारो ने कहा कि भारत हर दिन 1.5 मिलियन बैरल रूसी तेल खरीदता है, जिससे रूस को ड्रोन और बम बनाने के लिए फंड मिलता है। इसके अलावा उन्होंने आरोप लगाए कि भारत खुद को सबसे बड़ा लोकतंत्र बताता है, जबकि वो मॉस्को और बीजिंग के साथ आर्थिक रिश्ते गहरा कर रहा है। नवारो ने यहां तक कह दिया कि भारत का ये रूख वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा है और मोदी सरकार “लोकतंत्र के साथ खड़ी होने के बजाय अधिनायकवादियों के साथ बिस्तर में जा रही है।”वहीं, पीटर नवारो के तीखे हमलों के उलट अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट अलग तरह की कूटनीति कर रहे हैं। हालांकि शब्द जहरीले नहीं हैं, लेकिन उनके शब्दों को आप ‘डिप्लोमेटिक छूरा’ कह सकते हैं। फॉक्स बिजनेस को दिए ताजा इंटरव्यू में बेसेंट ने कहा, “यह एक जटिल रिश्ता है, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तिगत संबंध अच्छे हैं। आखिरकार दोनों पक्ष बैठकर मुद्दों का हल निकालेंगे। बातचीत की लाइनों को हमने खुला रखा है।” इससे पहले उन्होंने कहा था कि ‘रूसी तेल खरीदने से भारतीय जनता को नहीं, कुछ कंपनियों को फायदा होता है।’ अपने एक और बयान में बेसेंट ने कहा था कि ‘भारत बहुत घमंडी है।’ इसके अलावा उन्होंने भारत से बातचीत को ‘निराशाजनक’ भी बताया था। उन्होंने भारतीय रुपये में होने वाले कराबोर पर हंसकर मजाक उड़ाया था। बेसेंट इस बात को स्वीकार करते हैं कि ‘भारत और अमेरिका के रिश्ते महत्वपूर्ण हैं’ लेकिन वो ये भूल जाते हैं कि पीटर नवारो के साथ मिलकर वो जिस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं, उसकी गूंज सालों तक सुनाई देगी।

भारत और अमेरिका के रिश्ते आज काफी नाजुक स्थिति में है। भारत को तात्कालिक नुकसान काफी हो सकता है, लेकिन दीर्घकालिक नुकसान से अमेरिका नहीं बचेगा। इस झगड़े से जाहिर तौर पर चीन को फायदा होगा और चीन, सिर्फ भारत के लिए खतरा साबित नहीं होगा। नवारो और बेसेंट जैसे अधिकारियों के बयान ने अमेरिका को लेकर भारत का भरोसा बुरी तरह तोड़ दिया है। आप किसी सहयोगी देश के अधिकारियों से ऐसे शब्दों की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। भारतीय एक्सपर्ट्स के साथ साथ अमेरिकी एक्सपर्ट्स भी मौजूदा स्थिति को चिंताजनक बता रहे हैं।

कुछ एक्सपर्ट्स भारत से धैर्य रखने को कह रहे हैं और दिलासा दे रहे हैं कि ट्रंप हमेशा अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं रहेंगे और उनका कार्यकाल बस साढ़े तीन साल और बचा है। लेकिन भारत के लिए मुश्किलें फिलहाल ज्यादा हैं। वो रूसी तेल खरीदना बंद कर देश में फैक्ट्रियों का इंजन बंद करे या अमेरिका से साझेदारी बचाए, ये तय करना आसान नहीं है। जाहिर तौर पर भारत अपने उद्योग का साथ देगा और दे रहा है। ऐसे में आने वाले महीने काफी महत्वपूर्ण होंगे कि आखिर कैसे दोनों लोकतांत्रिक देश कैसे टकराव के रास्ते से हटकर, मतभेदों को भुलाकर सहयोग का एक नया अध्याय खोलते हैं?

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