पाकिस्तान का ‘डबल गेम’ उसके गले की फांस बन सकता……………

आतंक की फैक्ट्री कहे जाने वाले भारत के पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान का ‘डबल गेम’ उसके गले की फांस बन सकता है। पाकिस्तान ऐसी मुसीबत में उलझता नजर आ रहा है, जहां से निकलना उसके लिए लगभग नामुमकिन होगा। अगर ऐसा होता है तो निश्चित ही इसका फायदा सीधे तौर पर भारत को होगा। पाकिस्तान के […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
बुधवार, 24 सितंबर 2025, 09:04 AM 4 मिनट read
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पाकिस्तान का ‘डबल गेम’ उसके गले की फांस बन सकता……………
Photo: UB India News Archive

आतंक की फैक्ट्री कहे जाने वाले भारत के पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान का ‘डबल गेम’ उसके गले की फांस बन सकता है। पाकिस्तान ऐसी मुसीबत में उलझता नजर आ रहा है, जहां से निकलना उसके लिए लगभग नामुमकिन होगा। अगर ऐसा होता है तो निश्चित ही इसका फायदा सीधे तौर पर भारत को होगा। पाकिस्तान के दो देशों के बीच पिसने का मतलब है कि वह आंतरिक रूप से कमजोर होता जाएगा और उसका पूरा ध्यान अपने उन दोनों देशों को मैनेज करने में ही लगा रहेगा। ऐसे में भारत के खिलाफ पाकिस्तान जो षड़यंत्र रचता आया है, उसमें कमी देखने को मिल सकती है।

दरअसल, पाकिस्तान ये डबल गेम चीन और अमेरिका के बीच खेल रहा है। पिछले करीब एक दशक से पाकिस्तान चीन का पिछलग्गू बना रहा। महंगी ब्याज दर पर बंपर कर्जा लेता रहा। बदले में चीन को अपने देश के खनिज संसाधनों की लूट का मौका दिया। सालों तक ये खेल चलता रहा। लेकिन अब पाकिस्तान चीन और अमेरिका रूपी दो नांवों की सवारी करने को आतुर है।

ट्रंप के लिए कर डाली नोबेल पुरस्कार की मांग

एक तरफ पाकिस्तान चीन के साथ भी अच्छे संबंध बनाए रखना चाह रहा है तो वहीं पाकिस्तान की नई सरकार अमेरिका को साधने में जुटी हुई है। इसकी बानगी हाल के कुछ महीनों में पूरी दुनिया देख चुकी है, जब पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लंच पर बुलाया था। इस दौरान मुनीर ने ट्रंप को बलूचिस्तान में क्रिप्टो, तेल और खनिजों तक पहुंच की पेशकश तक कर दी। इतना ही नहीं ऑपरेशन सिंदूर में भारत से बुरी तरह पिटने के बाद शहबाज शरीफ और असीम मुनीर ने सीजफायर का क्रेडिट भी ट्रंप को दे दिया। एक कदम और आगे बढ़ाते हुए पाकिस्तान ने ट्रंप के लिए नोबेल शांति पुरस्कार की डिमांड भी कर दी।

US का अफगानिस्तान में लौटना चीन के लिए झटका

दरअसल, पाकिस्तान दोहरी मुश्किल में फंस गया है। अमेरिका ने अफगानिस्तान लौटने का फैसला किया है। जाहिर के कि यूएस की अमेरिका वापसी पाकिस्तान के रास्ते ही होगी। चीन के लिए अमेरिका का अफगानिस्तान लौटना किसी बड़े झटके से कम नहीं है। बगराम एयरपोर्ट से अमेरिका के निकलने पर अफगानिस्तान की खनिज संपदा चीन की झोली में आ गई थी। चीन ने तो इतने आगे का सोच लिया था कि वह अब CPEC कॉरिडोर को अफगानिस्तान तक ले जाने का प्लान बना रहा था। चीन की नजर अफगानिस्तान की उस खनिज संपदा पर है, जो 2021 में अमेरिका के जाने के बाद चीन के कब्जे में आने के चांसेज थे।

दोनों ‘महाशक्तियों’ को एक साथ साधने की कोशिश

चीन पाकिस्तान को अपना ‘आयरन ब्रदर’ मानता आया है। वह पाकिस्तान को 62 अरब डॉलर के चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के एक प्रमुख साझेदार के तौर पर देखता है। इस समय पाकिस्तान दोनों ‘महाशक्तियों’ (अमेरिका और चीन) के साथ सांठगांठ करने में लगा है। देखा जाए तो चीन, पाकिस्तान को एक जागीरदार से ज्यादा कुछ नहीं मानता, ऐसे में असली सवाल यह है कि बीजिंग शरीफ और मुनीर की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ दोस्ती को कब तक बर्दाश्त करेगा। सवाल यह है कि क्या चीन इतनी आसानी से पाकिस्तान और अफगानिस्तान को अमेरिका के हाथों में जाने देगा। ऐसे में अमेरिका और चीन के हित आपस में टकराएंगे और पाकिस्तान जंग का नया अखाड़ा बन जाएगा।

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