सात अक्तूबर, 2023 से इस्राइल की वॉर कैबिनेट और विपक्ष, दोनों में रहते हुए मैंने देखा है कि कैसे पश्चिम में कुछ लोगों ने हमास के खिलाफ युद्ध छेड़ने में इस्राइल की कार्रवाई की गलत व्याख्या की है। इस्राइलियों के लिए वह दिन वर्षों पुराने संघर्ष का एक और दौर नहीं था। वह तो अलबत्ता एक रणनीतिक बिंदु था, जो यह याद दिलाता है कि जब चौखट तक आ पहुंचे आतंक को कम करके आंका जाता है, तो क्या हो सकता है। अक्सर पश्चिमी नेता इस युद्ध में इस्राइल की नीतियों को राष्ट्रीय सुरक्षा नहीं, बल्कि व्यक्तियों, खासकर इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के चश्में से देखते हैं। इस बारे में हर बातचीत को अक्सर इस सवाल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि प्रधानमंत्री के लिए क्या मायने रखता है, मानो इस्राइल की राष्ट्रीय सुरक्षा एक ही व्यक्ति से शुरू और खत्म होती है। यह नजरिया गलत है तथा वैश्विक स्थिरता और इस्राइल की अपनी सुरक्षा के लिए भी खतरनाक है।
इस्राइल में गहरे राजनीतिक विभाजन और असहमतियां हैं। मैं खुद नेतन्याहू का मुखर आलोचक रहा हूं, लेकिन राष्ट्र के मूल सुरक्षा हित किसी दल की संपत्ति नहीं होते। आज पहले से कहीं अधिक, वे एक राष्ट्रीय सहमति पर आधारित हैं, जो हमारे क्षेत्र की कठोर वास्तविकताओं में निहित हैं। फलस्तीनी राज्य के दर्जे को मान्यता देने का विरोध उस सहमति के मूल में है। दरअसल, व्यापक फलस्तीनी नागरिक स्वायत्तता के विचार की दिशा में आगे बढ़ने की राह में सबसे पहले जवाबदेह शासन का दीर्घकालिक ट्रैक रिकॉर्ड, कट्टरपंथ-विरोधी सुधार और इस्राइलियों को निशाना बनाने वाले आतंकवादी तत्वों पर सफल कार्रवाई शामिल होनी चाहिए।
फलस्तीन को मान्यता देने की पश्चिम देशों में जो होड़ दिखती है, उसे अक्सर नेतन्याहू और उनकी युद्ध नीतियों की निंदा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि असल में यह होड़ न केवल घरेलू राजनीतिक दबाव से, बल्कि नेताओं के बीच व्यक्तिगत दुश्मनी से भी प्रेरित प्रतीत होती है। सच्चाई यह है कि वर्तमान हालात में फलस्तीनी राज्य के दर्जे को अंतरराष्ट्रीय मान्यता नेतन्याहू की अस्वीकृति नहीं है। यह इस्राइल की द्विदलीय सुरक्षा सहमति की अस्वीकृति है। 2005 में जब इस्राइल गाजा से हटा, तो फलस्तीनी प्राधिकरण को इस क्षेत्र का नियंत्रण सौंप दिया गया। अगले वर्ष, हमास ने फलस्तीनी प्राधिकरण के विधायी चुनावों में अपने प्रतिद्वंद्वी गुट फतह को पछाड़ते हुए, आश्चर्यजनक ढंग से भारी बहुमत से सीटें जीतीं। उसके अगले वर्ष, हमास ने गाजा में फतह को हिंसक रूप से उखाड़ फेंका और ईरान की मदद से उसने गाजा के भीतर अपनी सैन्य क्षमताओं का नाटकीय ढंग से विस्तार किया, और अंतत: सात अक्तूबर का नरसंहार किया। यह स्थिति कोई असामान्य या अप्रत्याशित नहीं थी। यह फलस्तीनी प्राधिकरण के अपनी जनता के बीच वैधता कम होने का नतीजा थी। यह एक ऐसा दर्दनाक सबक था, जिसका इस्राइल निकट भविष्य में फिर से सामना करने का जोखिम नहीं उठा सकता।
फलस्तीनी प्राधिकरण अपने क्षेत्र से इस्राइल के खिलाफ पैदा होने वाले आतंक को विफल करने में नाकामयाब रहा। इसने हिंसा भड़काई और स्कूली पाठ्य पुस्तकों में आतंकवाद का महिमामंडन किया। इसने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस्राइल को अलग-थलग करने और उसे अवैध ठहराने के लिए एकतरफा अभियान चलाया। संयुक्त राष्ट्र व अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में और बहिष्कार आंदोलनों के माध्यम से इसने सुधार, जवाबदेही और संवाद को दरकिनार करने की कोशिश की है और इस्राइल की सुरक्षा चिंताओं को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
असल सवाल यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय उस भारी सहमति का सम्मान करेगा, जो पिछले वर्ष एक लोकतांत्रिक देश इस्राइल की संसद नेसेट के 120 में से 99 सदस्यों द्वारा पारित एक घोषणापत्र है, जिसमें कहा गया है कि, ‘इस्राइल फलस्तीनी राज्य की एकतरफा मान्यता का विरोध करता रहेगा, और सात अक्तूबर के बाद की ऐसी कार्रवाई आतंक को अभूतपूर्व रूप से पुरस्कृत करेगी और भविष्य में किसी भी शांति व्यवस्था को रोकेगी।’
युद्ध की शुरुआत में, मैंने स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज से बात की थी, जो इस्राइल के सामने मौजूद खतरे को कम करके आंकते रहे। उन्होंने टिप्पणी की कि उनका देश भी आतंकवाद से जूझ रहा है। मैंने उनकी वैचारिक समझ की कमी पर बेहद आश्चर्य व्यक्त किया। यूरोप में छिटपुट रूप से सक्रिय आतंकवादी समूहों से अपने देश की रक्षा करने और एक ऐसे छद्म आतंकवादी राज्य के बीच कोई समानता हो ही नहीं सकती, जो क्षेत्र, संसाधनों और सैन्य शस्त्रागार पर कब्जा करता है, जिसे ईरान जैसे देश का समर्थन मिला हुआ है, जो खुले तौर पर इस्राइल को नष्ट करने की अपनी महत्वाकांक्षा की घोषणा करता है और जिसे एक कट्टरपंथी इस्लामी वैचारिक रीढ़ द्वारा ईंधन मिलता है। इस बुनियादी फर्क को समझने में स्पेन के नेता की स्पष्ट विफलता ने मेरी इस समझ को और पुख्ता किया है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस्राइल की सुरक्षा चुनौतियों को किस हद तक कम करके आंकता है। सात अक्तूबर के बाद इस्राइल की सैन्य प्रतिक्रिया को राजनीति ने नहीं, बल्कि जरूरत ने आकार दिया है।
पूर्वी मोर्चे पर इस्राइल को पश्चिमी तट पर स्थित रणनीतिक जॉर्डन घाटी पर औपचारिक नियंत्रण स्थापित करने के लिए तैयार रहना होगा, जिस पर 1967 से उसका नियंत्रण है। यह इसलिए जरूरी है, ताकि फलस्तीनी क्षेत्रों में तस्करी और इस्राइल में आतंकवादी घुसपैठ को रोका जा सके। ये राजनीति नहीं, इस्राइल की सुरक्षा जरूरतें हैं। इस्राइल की सुरक्षा, इस्राइल की जिम्मेदारी है, लेकिन यह सिर्फ इस्राइल की चिंता नहीं है। यह पश्चिम एशिया की स्थिरता का आधार है और मुक्त विश्व की खुशहाली के लिए भी जरूरी है। इस्राइल के सुरक्षा लक्ष्यों में ईरान की क्षेत्रीय आकांक्षाओं को रोकना, उसके परमाणु कार्यक्रम को नुकसान पहुंचाना और इस क्षेत्र में कट्टरपंथी विचारधारा के विस्तार को रोकना शामिल हैं। वह महत्वपूर्ण शिपिंग मार्गों और आपूर्ति शृंखलाओं की रक्षा भी कर रहा है।
अंतत:, इस्राइल के दुश्मनों को इससे फर्क नहीं पड़ता कि यरूशलम में कौन शासन कर रहा है। वे बस यही चाहते हैं कि इस्राइल कमजोर, असुरक्षित, विभाजित और अपनी रक्षा करने में असमर्थ हो। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इसे समझने में कोई भूल नहीं करनी चाहिए। इसमें कतई संदेह नहीं होना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फलस्तीन की बढ़ती मान्यता को लेकर इस्राइलियों के विशाल बहुमत की धारणा व्यक्तिगत राजनीति नहीं, बल्कि नए युग की चुनौतियों से जूझने का मामला है।








