पांच चुनाव, दो चेहरे, 10 बार मुख्यमंत्री की शपथ , 2005 से अब तक का बिहार का सफर ……………..

बिहार में पहले चरण का मतदान हो चुका है। मंगलवार को दूसरे चरण में 20 जिलों की 122 सीटों पर वोटिंग होगी। 14 नवंबर को नतीजे आने के साथ यह तय हो जाएगा कि राज्य में किसकी सरकार बनेगी। कौन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेगा। पिछले पांच विधानसभा चुनावों में बिहार ने दो मुख्यमंत्रियों को […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
सोमवार, 10 नवंबर 2025, 05:21 AM 18 मिनट read
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पांच चुनाव, दो चेहरे, 10 बार मुख्यमंत्री की शपथ , 2005 से अब तक का बिहार का सफर ……………..
Photo: UB India News Archive

बिहार में पहले चरण का मतदान हो चुका है। मंगलवार को दूसरे चरण में 20 जिलों की 122 सीटों पर वोटिंग होगी। 14 नवंबर को नतीजे आने के साथ यह तय हो जाएगा कि राज्य में किसकी सरकार बनेगी। कौन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेगा। पिछले पांच विधानसभा चुनावों में बिहार ने दो मुख्यमंत्रियों को देखा है।

पिछले पांच बार से बिहार में चुनावों का क्या पैटर्न रहा है? मतदाताओं और वोट प्रतिशत का आंकड़ा कैसे बढ़ा-घटा? इस दौरान किस पार्टी को कितनी सीट मिलती रही है? किसी पार्टी का वोट प्रतिशत कम रहा किसका ज्यादा रहा? किस गठबंधन का प्रदर्शन कैसा रहा?  

जब कोई नहीं बना बिहार का सीएम

2000 में बिहार राज्य का विभाजन हुआ। बिहार से अलग होकर झारखंड एक नया राज्य बना। बिहार विभाजन के बाद फरवरी 2005 में पहली बार चुनाव हुए। इस चुनाव में कुल 5,26,87,663 मतदाता वोट डालने के लिए पात्र थे। इनमें से 46.5 फीसदी ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। जो पिछले तीन चुनाव के मुकाबले बहुत कम था।

जब चुनाव नतीजे आए तो किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। चुनाव से पहले तक सत्ता में रही  राजद को 25.1 फीसदी वोट मिले। उसे 75 सीटों से संतोष करना पड़ा। जो बहुमत के 122 के आंकड़े से बहुत कम था। नीतीश कुमा रकी जदयू को 14.6 फीसदी वोट के साथ 55 सीटें मिलीं। भाजपा को 37 और कांग्रेस 10 सीटों पर जीत मिली। इनका वोट शेयर क्रमश: 11 और 5 फीसदी रहा। राम विलास पासवान की लोजपा को 12.6 फीसदी वोट के साथ 29 सीटों पर जीत मिली।

एनडीए (जदयू + भाजपा) सबसे बड़ा गठबंधन था लेकिन उसे भी बहुमत से कम सीटें मिलीं। रामविलास पासवान की लोजपा “किंगमेकर” बन गई यानी उसके समर्थन से ही सरकार बन सकती थी। कई हफ्ते तक जोड़ तोड़ की कोशिश होती रही, लेकिन कोई दल या गठबंधन बहुमत के आंकड़े को नहीं जुटा सका। राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा और अक्तूबर 2005 में एक बार फिर चुनाव हुए।

अक्तूबर 2005: एनडीए सरकार में नीतीश बने मुख्यमंत्री

अक्तूबर 2005 में फिर से राज्य में चुनाव हुए। इस चुनाव में कुल 5,13,85,891 मतदाता वोट देने के लिए पात्र थे। इसमें से 45.8 फीसदी ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। चुनाव नतीजे आए तो एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिला। सबसे ज्यादा 88 सीटें जीतकर जदयू सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। जदयू को 20.46 प्रतिशत वोट मिले थे। वहीं गठबंधन में उसकी साथी भाजपा को 15.65 प्रतिशत वोट को साथ 55 सीटों पर जीत मिली। राजद को 54 और कांग्रेस को नौ सीटों पर संतोष करना पड़ा था। राजद भले ही तीसरे नंबर पर रही लेकिन उनका वोट शेयर सभी दलों में सबसे ज्यादा 23.45 फीसदी था। लोजपा को कांग्रेस से एक ज्यादा यानी 10 सीटें मिली थी। बाकी सीटें अन्य के खाते में गई थीं।

जीत के बाद भाजपा और जदयू ने मिलकर सरकार बनाई। दोनों को कुल 143 सीटें मिली थीं। जदयू के नीतीश कुमार राज्य के मुख्यमंत्री बने।

2010: नीतीश कुमार फिर बने मुख्यमंत्री, पर बहुत कुछ बदलता गया

2010 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर एनडीए को जीत मिली। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। जदयू सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इस चुनाव में कुल 5,51,20,656 मतदाता थे। इमने से 52.67 प्रतिशत ने वोट दिया। चुनाव नतीजे आए तो जदयू ने 141 सीटों पर चुनाव लड़कर 115 (22.58%) सीटों पर जीत दर्ज की। वहीं, भाजपा को 16.49 प्रतिशत वोट शेयर के साथ कुल 102 में से 91 सीटों पर जीत मिली। एनडीए गठबंधन ने 206 सीटों पर जीत के साथ जोरदार वापसी की। नीतीश कुमार को एक बार फिर मुख्यमंत्री बने।

इस चुनाव में राजद और लोजपा साथ थे। इसमें राजद को 22 सीटों पर और लोजपा को केवल तीन सीटों पर जीत मिली। राजद को 18.84 और लोजपा को 6.74 प्रतिशत वोट से संतोष करना पड़ा।

नतीजों के बाद चार साल तक तो नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री के पद पर काम किया। लेकिन 2014 के आम चुनावों के समय बिहार में बड़े सियासी बदलाव हुए। प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा ने नरेंद्र मोदी का नाम सामने रखा। इससे नीतीश नाराज हो गए और एनडीए से रिश्ता तोड़कर राजद और कांग्रेस के समर्थन से सत्ता में बने रहे। हालांकि, 2014 का लोकसभा चुनाव नीतीश ने इन दलों से भी अलग लड़ा। राज्य की 40 में से 38 सीटों पर जदयू ने उम्मीदवार उतारे पर उसे बड़ी हार मिली। पार्टी सिर्फ दो सीटें जीत पाई। नीतीश कुमार ने इस खराब प्रदर्शन की जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी। जीतन राम मांझी को बिहार का नया मुख्यमंत्री बनाया गया। मांझी के मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश और मांझी के रिश्ते बिगड़ने लगे। अंतत: फरवरी 2015 में मांझी को हटाकर नीतीश फिर से मुख्यमंत्री बन गए।

2015: 20 साल बाद नीतीश-लालू साथ 

2015 के चुनाव में दो दशक के बाद नीतीश कुमार और लालू यादव साथ चुनाव लड़े। जदयू राजद और कांग्रेस ने मिलकर महागठबंधन बनाया। इस चुनाव में वोट डालने के लिए पात्र 6,70,56,820 मतदाताओं में से 56.66 फीसदी ने मतदान किया। नतीजे आए तो महागठबंधन को बड़ी जीत मिली। राजद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही बनाए गए। राजद को 18.35 फीसदी वोट शेयर के साथ कुल 80 सीटों पर जीत मिली। वहीं, उसकी साथी जदयू को 16.83 फिसदी वोट के साथ 71 सीटों पर जीत मिली। महागठबंधन की एक और साथी कांग्रेस को 27 सीटें मिलीं। इस तरह ये महागठबंधन 178 सीटें जीतने में सफल रहा। एनडीए की बात करें तो भाजपा को 53 सीटें 24.42 फीसदी वोट मिले। एनडीए में शामिल लोजपा को दो, रालोसपा को दो और हम को केवल एक सीट मिली। इस तरह एनडीए केवल 58 सीटों पर सिमट गया।

इतने बड़े बहुमत के बाद भी नीतीश कुमार ने पांच साल में दो बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। 2015 में शपथ लेने के 20 महीने बाद ही लालू परिवार पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण नीतीश कुमार ने  2017 में महागठबंधन का साथ छोड़कर एनडीए का दामन फिर से थाम लिया। इसके बाद नीतीश कुमार ने एनडीए के साथ सरकार बनाकर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

2020: नीतीश जीते पर पाला बदल जारी रहा 

2020 के विधानसभा चुनाव में  कुल  7,06,01,372 मतदाताओं में से 58.7 प्रतिशत ने वोट डाला। नतीजों में राजद 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई। राजद को 23.11 फीसदी वोट मिले। वहीं, दूसरे नंबर पर भाजपा को 19.46 वोट प्रतिशत के साथ 74 सीटें मिलीं थी। जदयू को 43 सीटों के साथ 15.39 वोट शेयर पर संतोष करना पड़ा था। कांग्रेस को 19 सीटें और 9.48 वोट प्रतिशत वोट मिले।

महागबंधन में शामिल वाम दलों, कांग्रेस और राजद को मिलाकर 110 सीटें मिलीं। जो बहुमत से कम थीं। 125 सीटें जीतकर एनडीए की एक बार फिर सरकार बनाई। भाजपा से कम सीटें जीतने के बाद भी नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बने।

2022 के आते-आते भाजपा के कई नेताओं ने नीतीश के खिलाफ बयान दिया, इससे नीतीश कुमार को लगा कि भाजपा जदयू को कमजोर करने की कोशिश कर रही है। आरसीपी सिंह जो जदयू के वरिष्ट नेता थे, उन्हें भाजपा ने केंद्र में मंत्री बना दिया। जदयू ने आरसीपी सिंह को पार्टी से बाहर कर दिया। जदयू को लगने लगा भाजपा पार्टी को तोड़ने की कोशिश कर रही है। इस सियासी उठापटक के बीच नीतीश ने एक बार फिर पाला बदला और 2022 में महगठबंधन के साथ आ गए। नीतीश ने इस्तीफा दिया और महागठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री के तौर पर फिर से शपथ ली। हालांकि, ये साथ भी ज्यादा दिन नहीं चला और जनवरी 2024 में फिर नीतीश का मन बदला और उन्होंने एनडीए में वापसी कर ली।

बिहार में अब तक कितने मुख्यमंत्री हुए

बिहार में 17 बार गठित हुई विधानसभा में अब तक कुल 23 चेहरे मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। 1952 में बिहार में पहली बार चुनाव हुए थे। पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह ने अपना कार्यकाल पूरा किया। दूसरी बार भी मुख्यमंत्री बने पर कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। इसके बाद 1990 तक यहां एक भी मुख्यमंत्री अपना पांच वर्षों का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। लालू प्रसाद यादव 1990 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने और अपना पांच वर्षों का कार्यकाल पूरा किया। इसके बाद 2005 में मुख्यमंत्री बने नीतीश ने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। नीतीश के नौ कार्यकाल में सिर्फ यही इकलौता कार्यकाल है जो निर्बाध रूप से चला।

सबसे कम वक्त के मुख्यमंत्री कौन?

बिहार में सत्ता परिवर्तन शुरू से होता रहा है। 1960 के दशक में तो कई मुख्यमंत्री ऐसे रहे जो कुछ दिन, कुछ हफ्ते या कुछ महीने महीने ही पद पर रह सके। पहली, 10वीं और 14वी विधानसभा को छोड़ दिया जाए तो ऐसी कोई विधानसभा नहीं हुई जिसमें एक से ज्यादा मुख्यमंत्री न रहे हों। 16वीं और 17वीं विधानसभा में मुख्यमंत्री का चेहरा तो एक ही रहा पर उसी चेहरे ने एक से ज्यादा बार शपथ ली। 17 बार हुए विधानसभा चुनाव में बिहार में अब तक 23 चेहरे कुल मिलाकर 39 बार मुख्यमंत्री शपथ ले चुके हैं। इसके बीच में कुल सात बार प्रदेश में राष्ट्रपति शासन भी लगा। इसमें से सबसे कब समय तक पद पर रहने वाले मुख्यमंत्रियों का बात करें तो इसमें तीन नाम है। ये सभी 20 दिन से भी कम समय के लिए पद पर रहे।

सतीश प्रसाद सिंह- बिहार के छठे मुख्यमंत्री बने सतीश प्रसाद सिंह केवल चार दिन के लिए बिहार के सीएम रहे। वह परबत्ता सीट से जीतकर 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे।  1962 में उन्होंने परबत्ता विधानसभा सीट से स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर अपनी जमीन बेचकर चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। 1967 में संसोपा के टिकट पर जीतकर विधानसभा पहुंचे। चुनाव के बाद कई दलों ने मिलकर सरकार बनाई।  जन क्रांति दल के महामाया प्रसाद सिन्हा बिहार के पांचवें मुख्यमंत्री बने। बीपी मंडल सरकार में मंत्री पद चाहते थे, लेकिन लोहिया इसके सख्त खिलाफ रहे। आखिरकार बीपी मंडल संसोपा से अलग हुए और अपना अलग शोषित दल बना लिया। सतीश प्रसाद सिंह ने भी विरोध शुरू किया। इसका फायदा बीपी मंडल को हुआ। सतीश प्रसाद सिंह और बीपी मंडल ने जोड़तोड़ के जरिए संयुक्त विधायक दल सरकार से करीब 20-30 नेताओं को तोड़ भी लिया। आखिरकार 1968 में विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश हुआ। सीएम महामाया गठबंधन को अपने साथ नहीं रख पाए और सरकार गिर गई।

शोषित दल के बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल ने अपने करीबी सतीश प्रसाद सिंह का नाम अंतरिम तौर पर आगे कर दिया, ताकि जब बीपी मंडल कहें तब एसपी सिंह इस्तीफा दे दें और मंडल बिहार के सीएम बन सकें।  सांसद बीपी मंडल को 29 जनवरी को विधान परिषद भेजा गया और 1 फरवरी 1968 को बिहार में बीपी मंडल के नेतृत्व में सरकार बन गई। सतीश प्रसाद सिंह इस सरकार में मंत्री बने। इस तरह बिहार में चार दिन के मुख्यमंत्री की कहानी का अंत हुआ।

नीतीश कुमार- बिहार के सबसे लंबे और सबसे ज्यादा बार सीएम रहने वाले नीतीश कुमार भी सबसे कम दिनों तक सीएम रहने वालों की कतार में भी शामिल हैं। साल 2000 में पहली बार नीतीश कुमार केवल सात दिन के लिए मुख्यमंत्री पद पर रहे। फरवरी 2000 में बिहार में चुनाव हुए तब बिहार और झारखंड एक ही थे। नतीजों में राजद को 124 सीटें मिली, लेकिन यह बहुमत से कम थी। भजपा को 67 समता पार्टी को 34 सीटें मिली और कांग्रेस को 23 सीटें मिली। इसके बाद भाजपा और समता पार्टी ने एक साथ आकर सरकार बनाने का दावा किया। नीतीश कुमार एनडीए सरकार में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लेकिन विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान सरकार बहुमत नहीं जुटा पाई और नीतीश कुमार को सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी।

भोला पासवान शास्त्री- भोला पासवान ने तीन बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन उनके इस तीनों कार्यकाल को मिला भी दें तो भी वे एक वर्ष पूरा नहीं कर पाए। उनका दूसरा काल केवल  22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 तक यानी 12 दिनों का ही था। जो की उनके दो और कार्यकालों में सबसे छोटा था।

1968 में मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री 99 दिन पद पर रहे थे। उनके इस्तीफे के बाद बिहार में अगले आठ महीने राष्ट्रपति शासन लगा रहा। इसके बाद चुनाव हुए तो फिर से किसी दल को बहुमत नहीं मिला। कांग्रेस के हरिहर सिंह ने 116 दिन सरकार चलाई। उनसे हटने के बाद राज्यपाल ने विपक्ष के तत्कालीन नेता लोकतांत्रिक कांग्रेस के भोला पासवान शास्त्री को सरकार गठन के लिए आमंत्रित किया। शास्त्री ने बिना मौका गंवाए सभी कांग्रेस विरोधी दलों को एकजुट किया। लोकतांत्रिक कांग्रेस दल की अगली सरकार के लिए संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा), प्रजातंत्र सोशलिस्ट पार्टी (प्रसोपा), भाकपा, जनसंघ, शोषित दल के समर्थन से भोला पासवान को फिर मुख्यमंत्री चुना गया। सरकार के अंदर आपसी असहमती के कारण 12 दिन में ही 1 जुलाई 1969 को भोला पासवान मंत्रिमंडल ने इस्तीफा दे दिया।

किस मुख्यमंत्री का कार्यकाल सबसे सबसे लंबा रहा? 

नीतीश कुमार- अब तक नौ बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके नीतीश कुमार अब तक के सबसे लंबे समय तक सीएम रहे हैं। 2005 में नीतीश कुमार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। उनके मुख्यमंत्री बने रहने का यह सिलसिला 2014 तक बरकरार रहा। इस समय पर आठ वर्षों से भी ज्यादा समय तक के लिए मुख्यमंत्री रहे। 2014 के आम चुनावों के पहले नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया। वह राजद और कांग्रेस के साथ चले गए।

2014 के आम चुनावों में पार्टी को हार मिली, इसके बाद नीतीश कुमार ने पद से इस्तीफा दे दिया। उनकी जगह जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया गया। 2015 विधानसभा चुनाव से ऐन पहले उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में वापसी की। 2015 से अब तक पिछले नौ वर्षों में नीतीश कुमार छह बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। 2015 2015 में मांझी को हटाकर नीतीश मुख्यंत्री बने। नवंबर में विधानसभा चुनाव के बाद उन्होंने फिर से इस पद की शपथ ली। 2017 में भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद नीतीश ने महागठबंधन का साथ छोड़ दिया और एनडीए में वापस आ गए।

2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए को जीत मिली। एक बार फिर नीतीश कुमार सीएम बने। अगस्त 2022 में, कुमार ने एनडीए छोड़ दिया और महागठबंधन में फिर से शामिल हो गए। जनवरी 2024 में, नीतीश कुमार ने एक बार फिर महागठबंधन छोड़ दिया और एनडीए में शामिल हो गए। कुल मिलाकर नीतीश इस पद पर 19 साल से ज्यादा वक्त तक रह चुके हैं।

श्री कृष्ण सिंह- बिहार के सबसे लंबे समय तक सीएम बनने वालों में नीतीश कुमार के बाद श्री कृष्ण सिंह का नाम आता है। वह एक ऐसे राजनेता थे जो आजादी के पहले से बिहार के प्रीमियर रहे। 1937 में, जब अंग्रेजों ने धीरे-धीरे राज्यों की सत्ता में भारतीयों को जगह देना शुरू किया तो बिहार में कांग्रेस सत्ता में आई। श्रीकृष्ण सिन्हा इस प्रांत के प्रीमियर बने। उन्होंने 20 जुलाई 1937 को पटना में, भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत, अपने कैबिनेट का गठन किया। कृष्ण सिन्हा ने 1937 से 1952 तक राज्य के प्रीमियर रहे। 1952 से 1961 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। वह 1961 तक यानी वह नौ वर्ष बिहार के मुख्यमंत्री पद पर रहे।

बिहार के अब तक के सबसे युवा सीएम कौन हैं?

सतीश प्रसाद सिंह- सबसे कम समय तक के लिए सीएम रहने के साथ-साथ, सतीश प्रसाद का नाम बिहार सबसे युवा मुख्यमंत्री के तौर पर लिया जाता है। वह मात्र 32 वर्ष की उम्र में मुख्यमंत्री बने थे। खगड़िया जिले के परबत्ता प्रखंड में स्थित कोरचक्का गांव में 1 जनवरी 1936 को जमीनदार परिवार में इनका जन्म हुआ था। मात्र 26 वर्ष की उम्र में उन्होंने 1962 में अपने जिले में आने वाली परबत्ता विधानसभा सीट से विधायकी का चुनाव लड़ने की ठानी। पहली बार उन्हें चुनाव में कांग्रेस की लक्ष्मी देवी के हाथों हार का सामना करना पड़ा। इस सीट पर 1964 में लक्ष्मी देवी के निधन के बाद फिर उपचुनाव भी हुए। सतीश प्रसाद सिंह ने फिर जमीन का एक टुकड़ा बेचकर चुनाव लड़ा। इस बार निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर और फिर हारे। दो हार ने उनके हौसले को नहीं तोड़ा। बताया जाता है कि वे अगले चुनाव तक परबत्ता में ही टिके रहे। 1967 में जब बिहार में विधानसभा चुनाव हुए तो सतीश प्रसाद सिंह को परबत्ता सीट से संसोपा ने टिकट पर जीते। इसके बाद वह 1968 में चार दिनों के मुख्यमंत्री भी बने। उस वक्त उनकी उम्र 32 साल थी।

कर्पुरी ठाकुर- सबसे युवा मुख्यमंत्रियों  में सूची दूसरे स्थान पर कर्पूरी ठाकुर हैं। वह 46 वर्ष की उम्र में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। जनहित के कार्यों के कारण जनमानस उन्हें ‘जननायक’ कह कर पुकारता है। वह 22 दिसंबर 1970 को बिहार के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने हिंदी को राजभाषा बनाया और वृद्धावस्था पेंशन शुरू की।

बिहार के सबसे  उम्रदराज मुख्यमंत्री कौन रहे हैं?

नीतीश कुमार-  2024 में जब नीतीश ने नौवीं बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उस वक्त  उनकी उम्र 72 वर्ष थी।

सबसे ज्यादा बार मुख्यमंत्री रहने वाले चेहरे भी नीतीश

नीतीश कुमार- नौ बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। 2000 के बाद एक बाद राबड़ी देवी और एक बार जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री बने। वह 19 वर्ष से भी ज्यादा समय से बिहार की शीर्ष कुर्सी पर विराजमान हैं। इनके अलावा राबड़ी देवी, जगन्नाथ मिश्र और भोला पासवान शास्त्री तीन-तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी।

राबड़ी देवी बिहार की अकेली महिला मुख्यमंत्री

बिहार में अब तक सिर्फ एक महिला मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठी है। राबड़ी देवी ने तीन बार इस पद की शपथ ली। पहली बार 25 जुलाई 1997 से 11 फरवरी 1999 तक वह 1 साल, 201 दिन तक मुख्यमंत्री रहीं।  9 मार्च 1999 से 2 मार्च 2000 तक वह 359 दिन के लिए दूसरी बार मुख्यमंत्री बनीं।  उनका तीसरा और आखिरी कार्यकाल 11 मार्च 2000 से 6 मार्च 2005 तक रहा। राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री बनने का कहानी भी काफी दिलचस्प है। 1996 में लालू का नाम चारा घोटाले में सामने आया। इसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद लालू यादव ने राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। उनके पहले कार्यकाल के दौरान बिहार में दो बड़े जातीय नरसंहार हुए। इसके चलते केंद्र सरकार ने बिहार में राषट्रपति शासन लगा दिया। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने भी इसे मंजूरी दी। राबड़ी देवी सत्ता ने हट गईं, लेकिन कांग्रेस ने राज्य सभा में इसके विरोध में वोट किया। इसी के साथ राज्य सभा में यह आदेश पास नहीं हो सका। इसके बाद 9 मार्च 1999 को राबड़ी देवी एक बार फिर मुख्यमंत्री बनीं।

2000 के बिहर चुनावों में राजद को बहुमत नहीं मिला। एनडीए ने सरकार बनाते हुए नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाए। इसी के साथ नीतीश कुमार को सात दिन बाद ही मुख्यमंत्री पद की कुर्सी छोड़नी पड़ी। 11 मार्च 2000 को एक बार फिर राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री बनीं।

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पटना। बिहार में 243 विधानसभा सीटों के लिए दो चरणों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने एनडीए को फिर से सत्ता की चाभी सौंप दी है। चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, अभी तक की मतगणना में बीजेपी 81 और जेडीयू 80 सीटों पर आगे चल रही है। वहीं, आरजेडी महज 33 और […]

UB India News14 नव॰
अबकी बार किसका बिहार? रुझानों में फिर NDA सरकार, महागठबंधन का बुरा हाल, कहां से कौन आगे-पीछे?
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अबकी बार किसका बिहार? रुझानों में फिर NDA सरकार, महागठबंधन का बुरा हाल, कहां से कौन आगे-पीछे?

Bihar Election Result ECI LIVE Updates: बिहार विधानसभा चुनाव रिजल्ट 2025 की तस्वीर साफ होने लगी है. बिहार में एनडीए की आंधी में महागठबंधन हांफता नजर आ रहा है. बिहार चुनाव के नतीजे एनडीए के पक्ष में जाते दिख रहे हैं. बिहार की 243 सीटों पर वोटों की गिनती जारी है. बिहार चुनाव रिजल्ट के […]

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